राहुल गांधी आज भारत में विपक्ष की सबसे बड़ी आवाज़ हैं। इसका मतलब है कि राहुल लोकतंत्र की सबसे बड़ी, मुखर और मजबूत आवाज़ हैं।
भले ही सत्ता तक पहुँचने का रास्ता लोकतंत्र के माध्यम से तय किया जाता हो, जबकि इस बात पर वर्तमान समय में बहुत संदेह है, लेकिन सत्ता ख़ुद में लोकतांत्रिक व्यवहार पसंद नहीं करती और जब सत्ता नरेंद्र मोदी जैसे नेताओं के हाथ में होती है तब लोकतंत्र का क्षरण हर दिन चरघातांकीय यानी एक्सपोनेंशियल रफ़्तार से होता है। स्पष्ट है कि ऐसे में सत्ता/सरकार को लोकतंत्र का सही मायने में प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता है। संसदीय व्यवस्था में लोकतंत्र का असली प्रतिनिधि सिर्फ़ और सिर्फ़ विपक्ष ही हो सकता है और आज की तारीख़ में राहुल गांधी ही विपक्ष हैं।
राहुल गांधी विपक्ष का एक ऐसा चेहरा हैं, जिनके ऊपर एक भी दाग नहीं हैं। इसके अलावा नरेंद्र मोदी सरकार के 12 सालों के तमाम प्रयास भी राहुल गांधी को किसी भी मामले में दाग़दार साबित नहीं कर सके हैं। मैं राहुल गांधी की चुनावी सफलताओं और असफलताओं का हिसाब नहीं लगाना चाहती हूँ, मैं तो बस इतना जानती हूँ कि भारत का लोकतंत्र एक अप्रत्याशित संकट से गुज़र रहा है। और हमेशा सत्ता में बने रहने की चाह रखने वाली पार्टी और उसकी सरकार जिसे ‘न’ सुनना पसंद नहीं है, जिसे निष्पक्ष मीडिया देखकर कंजक्टिवाइटिस हो जाता है, जिसे सड़कों पर प्रदर्शन और जुलूस देखकर ‘देश संकट में’ है का विचार आने लगता है, जिसे ऐसी यूनिवर्सिटीज पसंद नहीं हैं जहाँ सत्ता के ख़िलाफ़ नारेबाजी होती है, जिसे ऐसे बुद्धिजीवी पसंद नहीं जो सरकार पर/से सवाल करते हैं, ऐसी सरकार और उसके द्वारा बनाये गए अलोकतांत्रिक माहौल में जो नेता सरकार को मुंहतोड़ जवाब दे रहा है और लोकतंत्र बना रह सकता है, ऐसी आशा ख़त्म नहीं होने दे रहा है, मेरे लिए ये बहुत अहम बात है।
मोदी सरकार और आरएसएस जिस बात से सबसे ज़्यादा सहमे हुए हैं वो है राहुल गांधी की निर्भीकता और उनका बढ़ता हुआ राष्ट्रव्यापी ‘कनेक्ट’। जहाँ राहुल गांधी न ही संसद में बोलने और जवाब-तलब से डरते हैं और न ही ‘किसी भी किस्म के मीडिया’ से बातचीत करने में। वहीं बीजेपी और आरएसएस में ऐसा कोई नेता ही नहीं है (वर्तमान प्रधानमंत्री समेत इस पद के भावी उम्मीदवार) जो ऐसा कर सकता हो। बीजेपी/आरएसएस का भारतीय संविधान के साथ एक तीक्ष्ण संघर्ष है, जिसे वो लगातार छिपाने की कोशिश में रहते हैं। राहुल गांधी की आइडियोलॉजी और संविधान की मूल आत्मा में कोई विरोधाभास न होने के कारण राहुल गांधी को किसी भी किस्म का दिखावा करने की जरूरत नहीं है।
आरएसएस, बीजेपी की रणनीति
आरएसएस और भाजपा के तमाम लोग लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को देश के लिए ख़तरा बता रहे हैं, उन्हें बिना किसी सबूत के ‘बाहरी ताकतों’ से जोड़ा जा रहा है। मेरी नजर में यह सब बीजेपी/आरएसएस की व्यक्तिगत फैंटेसी मात्र है इसके अतिरिक्त कुछ और नहीं। असलियत तो यह है कि राहुल गांधी उन लोगों के लिए ख़तरा बन गए हैं जो भारत के लोककल्याणकारी चरित्र को नष्ट करके इसे एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलाना चाहते हैं। राहुल उस विचार के ख़िलाफ़ अडिग होकर खड़े हैं जो 12 सालों में अपनी सभी अक्षमताओं के बावजूद लगातार चुनाव जीतना जारी रखना चाहती है फिर चाहे इसके लिए संवैधानिक संस्थाओं का चीरहरण ही क्यों ना करना पड़े। और ऐन-केन-प्रकारेण 2047 तक सत्ता में बने रहने के आरएसएस के ख़्वाब के सामने विपक्ष के नेता राहुल गाँधी सबसे बड़ी चुनौती बनकर डटे हैं।
राहुल गांधी ने आरएसएस के अब तक के सबसे बड़े प्रोजेक्ट- जिसके तहत नरेंद्र मोदी को वाया अन्ना आंदोलन, प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया गया, अरबों खर्च करके बनाये गए मोदी की विकास पुरुष की छवि, लाल आँखों वाली छवि, ‘देश नहीं झुकने दूँगा’ की छवि आदि को बहुत ही सामान्य तथ्यों से नेस्तनाबूद करने का काम किया है। राहुल गांधी ने यह काम देश की संसद में कर दिखाया।
पीएम मोदी को देश की सुरक्षा के सामान्य सवाल पूछकर ही इतना असहज कर दिया कि अब मोदी सदन में राहुल गांधी के सामने आने से कतराने लगे हैं।
ट्रेड-डील, एपस्टीन फाइल्स पर फँसी बीजेपी?
ऐसा लग रहा है कि मोदी सरकार के लिए हालात बेकाबू होते जा रहे हैं। एक तरफ़ प्रेसिडेंट ट्रम्प पीएम मोदी को दबाव में रखकर ट्रेड-डील करवाने में सफल हो गये, एपस्टीन फाइल्स और गलवान घटना से संबंधित दस्तावेज सामने आ गए और दूसरी तरफ़ राहुल गांधी ने मोदी सरकार को इन मुद्दों पर सवाल पूछकर उत्तर-विहीन कर दिया है। इसलिए राहुल गांधी को संसद से बाहर करना मोदी सरकार की अब सबसे पहली प्राथमिकता बन गई है।
मोदी सरकार राहुल गांधी के ऊपर एक रुपया के भ्रष्टाचार भी साबित करने में विफल रही है इसलिए अब बचकाने काम करने में लग गई है। बीजेपी ने अपने ही एक सांसद के माध्यम से राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ सब्सटेंटिव मोशन लाने की तैयारी की। इस मोशन/प्रस्ताव की खास बात यह होती है कि यह इस तरह डिज़ाइन किया जाता है कि अपने आप में ‘पूर्ण’ हो। इसका उद्देश्य सदन का बहुमत मिलने के बाद किसी खास फ़ैसले को अंजाम देना होता है। उदाहरण के लिए- राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद लाए जाने वाला ‘धन्यवाद प्रस्ताव’; संसद के किसी अधिकारी को सदन से निष्कासित करने के उद्देश्य से लाया जाने वाला प्रस्ताव, उदाहरण के लिए ओम बिरला के लिए लाया गया ‘अविश्वास प्रस्ताव’ भी इसी श्रेणी में आयेगा। राहुल गांधी के मामले में इस प्रस्ताव का उद्देश्य राहुल की लोकसभा सदस्यता समाप्त करना है। प्रस्ताव में इसका कारण यह बताया गया कि राहुल गांधी ने पूर्व आर्मी चीफ एम एम नरवणे की किताब के पब्लिशिंग स्टेटस को लेकर सदन को गुमराह किया है।
ये क्यों नहीं कहते कि किताब में ग़लत लिखा है?
हास्यास्पद बात तो यह है कि प्रस्ताव में यह नहीं कहा गया कि किताब में जो कुछ लिखा है वो ग़लत है, बस तकलीफ़ इतनी है कि राहुल गांधी ने इस किताब के कंटेंट का ज़िक्र संसद में क्यों कर दिया। इस किताब में कुछ ऐसी बातें हैं जिनका संबंध भारत-चीन बॉर्डर पर जून, 2020 में हुई गलवान की घटना, उसके बाद चीन का आक्रमक रवैया और नरेंद्र मोदी की फैसला लेने संबंधी अक्षमता से जुड़ा हुआ है। संसद के सामने आते ही मोदी के नाम पर जो मिथक गढ़ा गया था वो अब बहुत तेजी से टूट रहा है। इस ‘डैमेज’ को ‘कंट्रोल’ करने के लिए अब संसद की कार्यवाही को भी ‘कंट्रोल’ किए जाने की योजना बन रही है जोकि राहुल गांधी के लोकसभा में रहते कभी सफल नहीं हो सकेगी इसलिए राहुल गांधी मोदी सरकार के प्राइम टारगेट हैं। लेकिन बीजेपी और मोदी यह समझने में भूल कर रहे हैं, जोकि बहुत स्वाभाविक है, कि राहुल गांधी एक ‘उभयचर’ यानी एम्फीबियन हैं जो सड़क में भी उतना तेज लड़ सकता है, और देश की आवाज बुलंद कर सकता है, चुनौती बन सकता है जितना संसद के भीतर! राहुल गांधी ने किताब की कॉपी दिखाई। (फाइल फोटो)
राहुल को संसद से बाहर करने का प्रयास पहले भी हुआ
राहुल गांधी को संसद से बाहर करने की यह पहली कोशिश नहीं है। इसके पहले भी बीजेपी ‘असफलतापूर्वक’ यह काम कर चुकी है। राहुल गांधी की सदस्यता निलंबन का मामला ट्रायल कोर्ट, हाई कोर्ट होते हुए जब अगस्त 2023 में देश की सबसे बड़ी अदालत में पहुँचा तो तीन जजों की पीठ ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों के ‘विवेक’ पर गहरे सवाल उठाए। SC ने कहा कि ट्रायल जज ने अधिकतम दो वर्ष की सज़ा तो सुनाई (जिससे संसद सदस्यता चली जाये) लेकिन इसके लिए एक भी कारण दर्ज नहीं किया। इसके अलावा SC, ने यह भी कहा कि गुजरात हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की सजा पर रोक लगाने से मना करने के लिए सैकड़ों पन्नों का फैसला लिखा लेकिन ‘अधिकतम सजा’ देने के पीछे के कारणों के अभाव को ‘नजरअंदाज’ कर दिया। पता नहीं ‘किसके लोग थे’ जो SC का फैसला आने के बाद ग़म में आ गए और कोर्ट के फैसले को पलटवाने के लिए फिर न्यायालय जा पहुँचे जिन्हें अंततः सुप्रीम कोर्ट द्वारा जुर्माना लगाकर भगाया गया। ‘सब्सटेंटिव मोशन’ भी ऐसा ही एक प्रयास है ताकि राहुल गांधी के तेवर को मोदी जी के पास से हटाया जा सके। जिससे संसद को एक बड़े पीएमओ की तरह चलाया जा सके। राहुल गांधी की अनुपस्थिति में संसद को लोकतंत्र के स्तंभ के तौर पर नहीं, सत्ता के सुविधा अनुरूप चलाये जाने की योजना है जिससे पीएम मोदी को ‘असहजता’ न हो!बीजेपी के नेता संसद के भीतर असभ्य भाषा इस्तेमाल करने और बुली करने के लिए जाने जाते हैं। पिछली लोकसभा में रमेश बिधूड़ी नाम के बीजेपी सांसद ने जिस तरह खुलेआम अमर्यादित गाली-गलौज की थी वो इसका क्लासिक उदाहरण है। अब यही काम निशिकांत दुबे कर रहे हैं।
नेहरू-इंदिरा निशाने पर क्यों?
वह भारत में सीआईए के एजेंट्स रहे ब्यूरोक्रेट्स द्वारा लिखी गई किताबों को आधार बनाकर ‘आयरन लेडी’ इंदिरा गांधी का चरित्र हनन कर रहे हैं। वर्तमान पर बातचीत करने में अपंग हो चुकी भाजपा सिर्फ़ और सिर्फ़ नेहरू और इंदिरा गांधी के समय के भारत की घटनाओं का ज़िक्र कर पाती है। असभ्य लोगों को संसद में बोलने के लिए पर्याप्त समय और फुटेज दिया जाता है पर नेता प्रतिपक्ष को बोलने से रोकने का हर प्रयास (सफल, असफल) किया जाता है। इसी बात से आहत होकर विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला के ख़िलाफ़ ‘अविश्वास प्रस्ताव’ पेश कर दिया है। यानी अब जबतक इस प्रस्ताव पर निर्णय नहीं हो जाता ओम बिड़ला अध्यक्ष की कुर्सी पर नहीं बैठ सकेंगे। यदि वो चाहें तो सदन में आम सांसद की तरह बैठ सकते हैं लेकिन शर्म के मारे ओम बिड़ला ने संसद ना आने का फ़ैसला किया और इसे अपने लिए ‘नैतिक स्टैंड’ की तरह पेश किया।
पूरा सम्मान बरकरार रखते हुए मैं कहना चाहूँगी कि इस देश की संसद का सबसे ज़्यादा नुकसान लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला ने किया है। यह लोकसभा अध्यक्ष की ‘ड्यूटी’ है कि वो अनुच्छेद 93 के तहत संविधान में दिए गए लोकसभा उपाध्यक्ष के चुनाव के लिए नोटिस जारी करें ताकि चुनाव हो सके। परंपरानुसार, उपाध्यक्ष विपक्षी दल से होता है और अध्यक्ष की अनुपस्थिति में महत्वपूर्ण फैसले सिर्फ़ उपाध्यक्ष ही कर सकता है। लेकिन ओम बिड़ला जो 17वीं लोकसभा में भी अध्यक्ष थे और वर्तमान लोकसभा में भी अध्यक्ष हैं। उन्होंने न पिछली बार कोई उपाध्यक्ष बनाने की प्रक्रिया शुरू की और न अभी तक। भारत की संसद में यह पहली बार है जब ऐसा हुआ है। अब चूँकि ओम बिड़ला के ख़िलाफ़ ‘अविश्वास प्रस्ताव’ है तो सदन के अहम फ़ैसलों के लिए उपाध्यक्ष होना चाहिए था लेकिन वो नहीं हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि अगर संसद में किसी संसद सदस्य की सदस्यता पर सवाल उठ जाये तो संसद कुछ नहीं कर पाएगी, अगर संसद को संयुक्त अधिवेशन की जरूरत पड़ जाये तो संसद अपंग बनी रहेगी, अगर सरकार कोई विधेयक लाना चाहे जिसमें ‘धन विधेयक’ का निर्धारण करना हो तो देश इस कानून से तब तक वंचित रहेगा जब तक ओम बिड़ला जी पर से ‘अविश्वास प्रस्ताव’ के बादल न छट जाएँ! मतलब यह कि एक हद तक देश की विधायी प्रक्रिया को ओम बिड़ला जी ने बंधक बना लिया है। उन्हें यह करने का हक किसने दिया?
हो सकता है कि ओम बिड़ला सबसे ज़्यादा समय तक लोकसभा अध्यक्ष का बलराम जाखड़ का रिकॉर्ड तोड़ने का गहरा स्वप्न पाले हों लेकिन मेरी नज़र में वो इस देश के सबसे कम विश्वसनीय और देश की विधायी प्रक्रिया को सर्वाधिक नुकसान पहुँचने वाले अध्यक्ष के रूप में जाने जायेंगे। रही बात राहुल गांधी की तो वो देश की ऐसी आवाज़ है जिसे अब रोकना लगभग असंभव है। किसी ‘मोशन’ के माध्यम से राहुल गांधी की राष्ट्रीय गतिशीलता को चुनौती देना अब संभव नहीं है, बिके हुए मीडिया से राहुल को बदनाम करना अब आसान नहीं! सवाल अब सिर्फ़ ये है कि आख़िर कब तक अक्षम नरेंद्र मोदी सरकार राहुल गांधी के सामने टिक पाती है!