पटना में ‘अर्थशिला’ सांस्कृतिक केंद्र के परिसर में था। ‘मार्च टुवर्ड्स फ्रीडम’ प्रदर्शनी देख रहा था। युवा मित्र अमृत राज ने बतलाया कि शाम को एक बांग्ला फ़िल्म दिखलाई जानेवाली है।फ़िल्म के निर्देशक का नाम सुना हुआ नहीं था। इसमें गलती मेरी है। पिछले दशकों में बांग्ला फ़िल्मों से संपर्क छूट गया है। एक वक्त था जब पटना के सिनेमा घरों में मॉर्निंग शो में नई बांग्ला फ़िल्में दिखलाई जाती थीं। “सिने सोसाइटी” भी बांग्ला फ़िल्में दिखलाती थी। धीरे धीरे यह सब ख़त्म हो गया। पटना में अच्छी ख़ासी आबादी बांग्ला भाषियों की है।लेकिन लगता है, उनका हिंदीकरण हो चुका है। बांग्ला रंगमंच भी समाप्त हो गया। सिनेमा घरों का चरित्र भी बदल गया। फिर पटना से दिल्ली आने के बाद फ़िल्म समारोहों के अलावा कहीं बांग्ला फ़िल्म देखने की सुविधा भी नहीं मिली।
प्रदर्शनी के दौरान ही निर्देशक रंजन घोष से मुलाक़ात हुई। इतने नौजवान कि निर्देशक मानने में कठिनाई हुई। उनके साथ अभिनेता आर्यून घोष से भी भेंट हुई।वे और भी तरुण! उन्होंने अपनी फ़िल्म ‘अदम्य’ देखने का न्योता दिया। यह भी बतलाया कि फ़िल्म का एक आधार कवि सुकांत भट्टाचार्य की कविता ‘दियासलाई की काठी’ है। सुकांत मेरे पहले कवि रहे हैं। यह उनका जन्मशती वर्ष भी है। मेरी उत्सुकता बढ़ गई कि आख़िर इस एक कविता का फ़िल्म में कैसे इस्तेमाल किया गया होगा।
‘अर्थशिला’ की सबसे ऊपर की मंजिल के छोटे कक्ष में फ़िल्म दिखलाई जानेवाली थी। कोई चालीसेक दर्शक रहे होंगे।मुझे कुछ निराशा हुई क्योंकि पटना में तो अच्छी ख़ासी आबादी बांग्ला भाषियों की है। ख़ैर! फ़िल्म देखनी थी।
फ़िल्म की कथा बहुत छोटी है। एक युवा क्रांतिकारी पलाश एक भ्रष्ट राजनेता को गोली मारने की कोशिश करता है जब वह एक जनसभा को संबोधित कर रहा है। निशाना चूक जाता है। हत्यारे की खोज शुरू होती है। पलाश ख़ुद को बचाने को भागता है।अपने दल के नेता के आदेश के मुताबिक़ वह छिपनेवाली जगह पर पहुँचता है। पूरी फ़िल्म पलाश के छिपने और चिपटे हुए बचे रहने की जुगत लगाते रहने की कहानी है। आख़िरकार वह पकड़ा जाता है। पुलिस से घिर जाने के बाद वह आत्महत्या कर लेता है। फ़िल्म का अंत एक गोली की आवाज़ से होता है। इस बार गोली निशाना नहीं चूकती। एक दूसरी ‘क्रांतिकारी’ युवती ने उस बच गए नेता को मार डाला है।
फ़िल्म की आरंभिक भाग में ही सुकांत की कविता का पृष्ठभूमि में पाठ होता है। नौजवान क्रांतिकारी पलाश ही वह दियासलाई की काठी है जो भक से जल उठती है।उसकी आयु कम है जैसे वह काठी देखने में छोटी है लेकिन उसके सीने में आग छिपी हुई है।
फ़िल्म में दृश्य ही दृश्य हैं। संवाद बहुत कम। कैमरे की निगाह पलाश पर टिकी हुई है।नाटकीय उत्तेजना के क्षण भी कम हैं।घटनाएँ बहुत कम घटती हैं। वह झोंपड़ी जिसमें पलाश छिपकर दिन गुजारता है, वह तालाब जिसमें वह नहाता और तैरता है, वह जंगल जिसके बीच मंदिर और उसके बग़ल की उसकी गोपनीय शरण स्थली है, उसकी मामूली दिनचर्या के दृश्य जिनमें कोई रोमांस नहीं है। बीच बीच में बहुत ही बेसिक फ़ोन पर अपने दल के नेता से निर्देश या सूचना। एक जगह लोग दिखलाई पड़ते हैं जब वह एक चाय की दुकान पर चाय के लिए जाता है। वहाँ कुछ गुंडे आकर दुकान पर काम कर रहे बच्चे से गुंडागर्दी करते हैं।वह ख़ामोशी से देखता है। उन गुंडों की निगाह उस पर पड़ती है। वह उस इलाक़े के लिए नया है। उनके भीतर संदेह पैदा होता है। उसकी झोपड़ी के बारे में उन्हें मालूम होता है।
गुंडे झोपड़ी पर हमला करते हैं और वह उनसे बचकर भागता है। आगे की फ़िल्म उसके बचने के दूसरे दौर की कहानी है। इसमें हम जंगल से पानी में पहुँचते हैं। पलाश का संपर्क अपने दल से छूट जाता है। बल्कि यह संकेत मिलता है कि उसका दल अब उससे संपर्क नहीं रखना चाहता। वह भागते भागते एक नाव में छिपता है। वह नाव नदी में निकल पड़ती है। मछुआरे मछली पकड़ने निकले हैं और वे हफ़्तों पानी में रहने वाले हैं। वे उसे पनाह देते हैं। कहते हैं कि जब नाव लौटेगी, वे उसे दूसरी नाव पर बिठा देंगे जो उसे उसके गंतव्य तक पहुँचा देगी। लेकिन वह उन्हें चकमा देकर नदी में कूद पड़ता है।
किसी तरह वह किनारे पहुँचता है, लेकिन पाता है कि वह चारों तरफ़ से पुलिस से घिर गया है। बचने का कोई उपाय नहीं है। वह ‘क्रांति ज़िंदाबाद’ का नारा लगाते हुए चाकू से अपनी नस काट लेता है।
फ़िल्म क्या पलाश की वीरता की कहानी कहती है? या उस वीरता की व्यर्थता की? उसका पूरा श्रम, ऊर्जा, बुद्धि सिर्फ़ छिपने में, बचे रहने में लगती है। यही उसका काम हो जाता है। जिस जनता के लिए वह दुःसाहस कर रहा है, वह उसे हत्यारे के तौर पर जानती है। वह उस जनता से भी बच रहा है क्योंकि वह पुलिस द्वारा प्रचारित उसके स्केच से उसका मिलान करके पकड़वा दे सकती है। वह मात्र शासन से नहीं, जनता से भी छिप रहा है। जब गरीब चायवाले के साथ गुंडे मारपीट करते हैं, वह चुपचाप देखने के अलावा कुछ नहीं कर सकता क्योंकि उस झंझट में पड़ने से उसकी पहचान उजागर होने का ख़तरा है।
उसका दल भी उससे संपर्क कम करता है क्योंकि अगर वह पकड़ा गया तो पुलिस उसके ज़रिए उन तक पहुँच सकती है। पलाश नितांत एकाकी हो जाता है।लेकिन क्या वह इसके लिए दल की शिकायत कर सकता है? क्या उसने ख़ुद अपने क्रांतिकारी मित्र को छोड़ नहीं दिया था जब एक दूसरे मिशन में वे घिर गए थे और पुलिस ने उस मित्र को पकड़ लिया था? क्या वह ख़ुद उस वक्त उसे अकेला छोड़कर भाग नहीं निकला था? वह मारा गया मित्र उसका पीछा नहीं छोड़ता।पूछता रहता है, वह उसे छोड़कर क्यों भागा? क्या यह वीरता थी या कायरता?
फ़िल्म में वीरता की यह बहस पृष्ठभूमि में चलती रहती है। एक भूमिगत क्रांतिकारी का जीवन आख़िर क्या है? उसका उस जनता से क्या संबंध है, जिसकी मुक्ति के लिए उसने अपना जीवन दाँव पर लगा दिया है? फ़िल्म के अंत में पलाश की गोली से बच गए राजनेता के मारे जाने की खबर मिलती है एक गोली की आवाज़ से। फ़िल्म जहाँ ख़त्म होती है, हम अनुमान कर सकते हैं कि पलाश की तरह की एक दूसरी ‘क्रांतिकारी’ के बचने के जीवन की कहानी शुरू हो रही है।
फ़िल्म का मौन इन सवालों को उनकी पूरी कठिनाई में उजागर करता है। फ़िल्म में पानी का विस्तार,दलदली कछार का अछोरपन, और उसे पार करने की पलाश की जद्दोजहद के फ़िल्मांकन में एक निर्ममता है और सादगी भी। फ़िल्म की इस विस्तृत खामोशी को अभिनेता आर्यून घोष ने बड़े ही संयम के साथ व्यक्त किया है। पलाश की असुरक्षा, उसके बचने के जीवट, भीतर के द्वंद्व को उन्होंने कुशलता के साथ अभिनीत किया है।तक़रीबन दो घंटे की इस प्रायः घटनाविहीन फ़िल्म को उन्होंने अकेले रोचक बनाए रखा है।
फ़िल्म के शीर्षक में एक विडंबना है।अदम्य है मनुष्य में अन्याय के विरुद्ध विद्रोह। लेकिन वह कौन-सी दिशा ले? कैसे व्यक्त हो? पलाश की इस एकाकी वीरगाथा से अनजान जनता के लिए उसकी मौत खबर बन भी पाती है या नहीं? क्या वह समझ पाती है कि उसने कुछ अपना खो दिया है? या वह मात्र उसकी माँ के लिए एक ख़ालीपन है?
फ़िल्म ख़ुद को शाब्दिक मुखरता और रिटॉरिक के ख़तरे से बचा लेती है।और उस भावुकता से भी जो एक क्रांतिकारी की ऐसी मौत के साथ जुड़ी होती है। फ़िल्म गोली की आवाज़ और एक स्त्री स्वर में उस नारे के साथ ख़त्म होती है जो पलाश के मुँह से सुना जा चुका है। क्या दर्शक के मन में इस बार वर्ग शत्रु का संहार करनेवाली पलाश की इस क्रांतिकारी मित्र की कहानी की कल्पना शुरू होती है? क्या यह बदला था, क्या यह नए सिरे से एक जीवन के अंत की शुरुआत है? हिंसा, शहादत, कायरता, वीरता एक ही जीवन में कितने घुले मिले होते हैं!