धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा हो गया है लेकिन उससे बड़ी ख़बर यह है कि नरेंद्र मोदी की प्रतिमा चूर चूर कर दी गई है। इस्तीफ़ा भले ही धर्मेंद्र प्रधान का हुआ हो लेकिन आंदोलनकारियों के नारे, पोस्टर, मीम के निशाने पर सिर्फ़ एक आदमी था: नरेंद्र मोदी। जिस पीढ़ी के बारे में यह ग़लतफ़हमी है कि उसे कोई राजनीतिक समझ नहीं, उसे कोई भ्रम न था कि इस सरकार में कोई मंत्री महत्त्वपूर्ण नहीं, सरकार का मतलब है नरेंद्र मोदी। इसलिए प्रधान का इस्तीफ़ा लेने का मतलब था मोदी को झुकने को मजबूर करना। जंतर मंतर पर घूमते हुए, नारों और पोस्टरों से यह साफ़ था कि निशाना सिर्फ़ और सिर्फ़ नरेंद्र मोदी पर था। युवा विद्रोह ने इस सरकार के एकमात्र चेहरे नरेंद्र मोदी की बड़ी मेहनत से गढ़ी गई छवि के परखचे उड़ा दिए हैं।

ये पोस्टर, नारे और गाने किसी संगठित योजना के तहत नहीं बनाए गए थे। गत्तों पर, साधारण काग़ज़ पर पेन या मार्कर से हर किसी ने अपने नारे लिखे थे। बाक़ी विरोध प्रदर्शनों की तरह यहाँ नारे छापकर बँटवा नहीं दिए गए थे और लोग उन्हें निष्क्रिय भाव से प्रदर्शित भर नहीं कर रहे थे। हर किसी ने अपनी कल्पनाशीलता का इस्तेमाल किया था। नौजवान ए आई से पोस्टर बनाकर उसका प्रिंट आउट ब्लिंकिट से मँगवा रहे थे। छोटे- छोटे समूह तुरंत गाना बनाकर गा रहे थे। सबकी थीम एक थी: नरेंद्र मोदी। इन सबमें नौजवान मोदी का मखौल बना रहे थे, उसकी खिल्ली उड़ा रहे थे। इस एक महीने में नरेंद्र मोदी को इस युवा पीढ़ी ने एक दयनीय मीम में बदल कर रख दिया।
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देखना मुश्किल न था कि नौजवान जिस एक चीज़ से ख़फ़ा था, वह था मोदी सरकार का घमंड। वे मोदी के इस दंभ को चूर चूर कर देने की ज़िद पर अड़ गए थे। 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों पर जब पुलिस ने बुरी तरह डंडे बरसाए, उन्हें दुश्मनों की तरह मारा तो नौजवानों ने यह समझा कि ये डंडे और पैलेट के छर्रे मोदी के हैं। वे डरकर भागने की जगह अपने ज़ख्मों और ख़ाली पैरों के साथ वापस जंतर-मंतर लौट आए। उनकी ज़िद एक ही थी कि वे मोदी को अपने मंत्री का इस्तीफ़ा लेने पर मजबूर कर देंगे।

मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी का असर

नौजवानों का यह उभार अपने अपमान का बदला लेने की नीयत से पैदा हुआ था। भारत के सर्वोच न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने अपनी एक ग़ैर ज़िम्मेदार और असंवेदनशील टिप्पणी में बेरोज़गार नौजवानों को कॉकरोच कहा था। न्यायालय ने पिछले सालों में सरकार के विभाग की तरह ही काम किया है इसलिए माना गया कि उनकी यह टिप्पणी नौजवानों के ख़िलाफ़ मोदी सरकार की ही टिप्पणी है।

कॉकरोच जनता पार्टी इस अपमान का जवाब थी। जल्दी ही उसे नीट इम्तहान में धाँधली से मौक़ा मिला कि वह उसके बहाने इस सरकार को जवाबदेही के लिए मजबूर करे। मोदी सरकार निश्चिन्त थी कि उसने भारतीय जनतंत्र को क़ाबू कर लिया है।

चुनाव आयोग के ज़रिए मतदाता सूची में भारी संख्या में हर फेर करके चुनाव नतीजों को अनुकूल करना और विपक्षी दलों को तोड़कर संसद में बहुमत बनाने में वह इस कदर मशगूल थी कि ज़मीन के नीचे नौजवानों की खदबदाती बेचैनी को देखने की उसे फुर्सत न थी। ये नौजवान वे थे जो हर तरफ़ दरवाज़ा बंद देख रहे थे। भारत में कोई उनकी तरफ़ ध्यान देने वाला न था।

इन नौजवानों की बात कोई नहीं कर रहा था। जिनके पास बोलने के साधन और क्षमता थी वे राष्ट्र की महानता का गुणगान कर रहे थे लेकिन इन नौजवानों की तरफ़ देखनेवाला भी कोई न था। इसलिए अपनी बात वे अपने फ़ोन के ज़रिए कर रहे थे। इंस्टाग्राम उनकी दुनिया थी और मखौल उनकी भाषा। मोदी और उनकी पार्टी की यह समझ थी कि उन्होंने भारत के बहुसंख्यक हिंदुओं का हिंदुत्वकरण कर दिया है और उन्हें मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत, हिंसा का नशा देने के अलावा और कुछ करने की ज़रूरत नहीं है।
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सोनम वांगचुक का अनशन

जंतर मंतर पर नौजवानों की तरफ़ से जब सोनम वांगचुक ने उपवास शुरू किया तो अपनी आदत के मुताबिक़ सरकार ने चुप्पी साध ली। उनके स्वास्थ्य के बिगड़ते जाने पर भी सरकार की खामोशी ने देश भर में नौजवानों में भारी क्रोध पैदा किया। उसके बाद मोदी सरकार ने वांगचुक को जबरन उठा लिया। उसे भ्रम था कि उसकी पकड़ भारत के समाज पर इतनी पक्की है कि उसके किसी कदम का समाज में कोई विरोध न होगा। लेकिन यह उसकी ख़ुशफ़हमी थी। सोनम वांगचुक के साथ किए गए बर्ताव को नौजवानों ने अपना अपमान माना और जंतर मंतर पर जैसे नौजवानों का सैलाब उमड़ आया।

20 तारीख़ के संसद मार्च के बारे में भी सरकार की ग़लतफ़हमी थी कि वह उसे क़ाबू कर लेगी। लेकिन जनता के ज्वार से वह लड़खड़ा गई। इस सरकार को एक ही भाषा आती है: आवाज़ को दबाने और लोगों को कुचलने की। नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ शाहीन बाग आंदोलन और किसान आंदोलन में उसने दमन का रास्ता ही चुना था। इस बार भी उसने वही किया। लेकिन नौजवान उससे पीछे नहीं हटे। वे डंडे और बंदूक़ के आगे अड़ गए।

नौजवानों ने हिंसा नहीं की। उन्होंने अपने हथियार, यानी फ़ोन के ज़रिए नरेंद्र मोदी की छवि की धज्जी उड़ाना शुरू किया। मोदी को अपनी छवि से ज़्यादा किसी से प्यार नहीं। इस छवि को दरकते देख मोदी घबराहट में उस मैदान में कूद पड़े जिसके खेल के नियम वे नहीं जानते। नौजवान उन्हें इंस्टाग्राम के मैदान में घसीट लाए। इस गुमान में कि वे लफ़्फ़ाजी के उस्ताद हैं मोदी ने इंस्टाग्राम पर नौजवानों को फ़्रेंड्स कहकर वीडियो बनाया। चारों तरफ़ से जवाब आया, हम तुम्हारे फ़्रेंड नहीं।
नरेंद्र मोदी को इस हमले ने बुरी तरह हिला दिया है। इसे फैलने से रोकना ज़रूरी था, इसके पहले कि यह चक्रवात में बदल जाए और उन्हें उखाड़ फेंके। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा मोदी के ख़िलाफ़ घिन के इस ज्वार को रोकने की एक बदहवास कोशिश है।

अभी जंतर मंतर ख़ाली हो गया है। लेकिन मोदी के ख़िलाफ़ नौजवानों का यह अभियान उनके अकेले कमरों में भी जारी रहेगा। नौजवानों ने नरेंद्र मोदी का ठस्सा तोड़ दिया है। यह भारतीय जनतंत्र के लिए अच्छी ख़बर है।