वाराणसी में ईद। यह शहर पीएम मोदी का लोकसभा क्षेत्र है।
‘ईद मुबारक! उम्मीद मुबारक!’,एक अख़बार की सुर्ख़ी है। ‘दबे तरीक़े से लेकिन शांतिपूर्वक ईद संपन्न!’ ‘कड़े पहरे, सी सी टी वी ड्रोन की निगरानी में ईद’, ‘हर रास्ते पर सुरक्षा बलों की तैनाती और बैरेकेडिंग’, ‘अमन के लिए लोगों ने पुलिस पर बरसाए फूल’।
‘आपका हम पर विश्वास ही है हमारी ईदी।’ दिल्ली पुलिस ने अपना एक वीडियो जारी किया जिसमें शांतिपूर्वक ईद गुजर जाने की खबरों का कोलाज है।मुसलमान पुलिस के शुक्रगुज़ार हैं कि उसकी कड़ी निगरानी के चलते वे नमाज़ पढ़ पाए।
ईद की नमाज़ पढ़कर लौट रहे मुसलमानों पर फूल बरसाते हुए हिंदुओं की तस्वीरें भी लोगों ने एक दूसरे को भेजीं। ‘यही अपना असली हिंदुस्तान है।’ लोगों ने इसके जवाब में उत्साह दिखलाया। एक तस्वीर ईद मनाने निकली एक बच्ची की देखी जो पुलिसवालों को फूल दे रही है।
यह सब कुछ बदले हुए भारत की तस्वीरें हैं।
इन सारी सकारात्मक खबरों में जो खबर दब गई, वह है बनारस के तरतला इलाक़े की। इस बार लोगों ने सेवई नहीं बनाई , नए कपड़े नहीं ख़रीदे। ‘आज के पहले कभी ईद पर इतनी खामोशी नहीं देखी गई।’ 59 साल के मोहम्मद सलाम ने रिपोर्टर को बतलाया। वे मोहम्मद समीर के पिता हैं। समीर उन 14 लड़कों में शामिल है जिन्हें गंगा पर नाव पर इफ़्तार करने के जुर्म में जेल भेज दिया गया है। पूरे इलाक़े में रंज और ग़म है।
पुलिस ने यह कार्रवाई भारतीय जनता पार्टी के युवा संगठन के एक पदाधिकारी की शिकायत पर की। मुसलमान लड़कों को जेल भेजने को वह इस कदर आमादा थी कि उसने उन पर लगाए गए शुरुआती आरोप ही बदल दिए। जुर्म सिर्फ़ यह न था कि उन्होंने गंगा पर इफ़्तार की और मांसाहारी भोजन किया बल्कि उससे संगीन जुर्म यह था कि उन्होंने वह नाव मल्लाह से ज़बर्दस्ती छीनी थी।पुलिस ने मल्लाह को खोजकर यह इल्ज़ाम शिकायत में जुड़वाया जिससे उन लड़कों का जेल जाना सुनिश्चित किया जा सके।
कुछ यही हाल उत्तर प्रदेश की श्रावस्ती के सिरसिया का है। वहाँ 4 नौजवान ईद के एक दिन पहले गिरफ़्तार कर लिए गए। उन्होंने पानी के एक सोते के क़रीब इफ़्तार की दावत की थी। उसके निकट स्थित मंदिर के पुजारी ने शिकायत दर्ज करवाई कि उन्होंने इफ़्तार के बाद बचा खुचा जूठा खाना उस सोते में फेंक दिया जिससे उसका पानी अपवित्र हो गया। मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए उस पानी का इस्तेमाल होता था। पुलिस ने न सिर्फ़ चुस्ती से शिकायत को एफ़ आई आर में बदला, बल्कि 4 लड़कों को जेल भी भेज दिया।
जगह-जगह से समाचार मिला कि पुलिस ने ईद की नमाज़ पढ़ने पर रोक लगाने की कोशिश की। ऐसी एक खबर तो कांग्रेस शासित तेलंगाना की है।
कांग्रेस शासित प्रदेश कर्नाटक के गंगावती से खबर आई कि पुलिस ने ईद के दिन 54 किलो मांस बरामद किया। ‘हिंदू जागरण वेदिके’ का इल्ज़ाम है कि यह गोमांस है। वह इस कार्रवाई से संतुष्ट नहीं है क्योंकि उसके मुताबिक़ जगह-जगह गोमांस बिक रहा है।मांस की जाँच हो रही है और मुजरिमों की तलाश भी की जा रही है।
गोमांस की छोड़िए, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कुछ इलाक़ों से खबर आई कि ईद के दो दिन पहले से मांस की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया गया है क्योंकि पवित्र नवरात्रि शुरू हो गई है। लोग चाहें तो कह सकते हैं कि यह तो मीठी ईद है, गोश्त की इसमें अनिवार्यता तो नहीं है। मुसलमान गोश्त की ज़िद क्यों कर रहे हैं?कुछ साल पहले इस मामले में सबसे बड़ी अदालत का तर्क याद आ गया कि प्रोटीन के लिए मांस ही क्यों, बहुत सारी और सारी चीज़ें खाई जा सकती हैं। गोश्त की जगह दाल खाइए!
मुसलमानों को अब हिंदू बताने लगे हैं कि उन्हें क्या खाना चाहिए, क्या पहनना चाहिए और कैसे अपने त्योहार मनाने चाहिए।
राष्ट्रीय सव्यंसेवक संघ के एक पदाधिकारी ने इस मौक़े पर कहा कि मुसलमान बहुल देशों में भी सड़क पर नमाज़ नहीं पढ़ी जाती।वे चाहते हैं कि भारत के मुसलमान उन देशों के मुसलमानों के तरह तमीज़दार बनें। आरएसएस कहता है कि वह हिंदुओं का संगठन है, लेकिन वह चिंतित मुसलमानों के लिए रहता है। हिंदू घंटों मंदिरों से बेसुरे भजन लाउडस्पीकर पर बजाते रहें, पूजा के पंडाल से सड़क रोक लें, कांवड़ यात्रा में सड़कों पर क़ब्ज़ा कर लें, रामनवमी में तलवार के साथ मस्जिदों के आगे नृत्य करें, उन पर चढ़कर भगवा झंडा लगाएँ, आरएसएस को कोई उज्र नहीं।हिंदू त्योहार कैसे मनाएँ, इसपर उसकी कोई राय नहीं है।
ईद के दिन देहरादून से दिल्ली के रास्ते में रुड़की कुछ देर रुकना था।एक नौजवान मित्र से ईद मिलने का वादा था। कार जब ‘मुसलमान इलाक़े’ में पहुँची तो मिठाई की दुकानों, बच्चों के खेलने के सामान से सड़क तंग होने लगी।नए, रंग-बिरंगे कपड़े पहने लड़के, लड़कियाँ, औरत, मर्द, बच्चे, बच्चियाँ आ-जा रहे थे। ईद की रौनक़ थी।काश! कोई प्रेमचंद होता जो इस ईद की तस्वीर खींचता।
कार की रफ़्तार कछुए की हो गई लेकिन हमें बेचैनी नहीं हुई। “आज तो मुसलमान चमक रहे हैं!” ड्राइवर ने टिप्पणी की। मैं अंदाज़ लगाने लगा कि इसमें शिकायत तो नहीं! ‘ईद पर मुसलमानों को तो चमकना ही चाहिए’, मैंने जवाबी टिप्पणी की और तुरंत सोचा कि यह ग़ैर ज़रूरी जवाब था।
यही ईद का सामान्य दृश्य होना चाहिए। यही हुआ करता था। मुसलमान नहीं चाहते कि उनके त्योहार में उन पर फूल बरसाया जाए।उन्हें ईद की नमाज़ से लौटते हुए पानी की बोतल दी जाए, यह वे नहीं चाहते। वे नहीं चाहते कि पुलिस उनकी ईदगाह की चौकसी करे, कि उनकी गली में हिंदुओं को आने-जाने से रोके।वे नहीं चाहते कि उनका पर्व त्योहार अतिरिक्त चर्चा का विषय बने।
उनके दादा,नाना, नानी जिस तरह ईद मनाते आए थे; जैसे 2014 के पहले ईद मनाई जाती थे, आज के मुसलमान उसी तरह ईद मनाना चाहते हैं। वे नहीं चाहते कि पुलिस और उदारमना हिंदुओं की निगरानी में, उनके पर्दे में वे ईद मनाएँ, कि ईद के दिन उन्हें अल्लाह के अलावा किसी और का भी शुक्रिया अदा करना पड़े। वे यह ज़रूर चाहते हैं कि ईद की उनकी ख़ुशी में उनके हिंदू पड़ोसी भी शरीक हों। यह नहीं कि उनके दस्तरख़्वान की जाँच पड़ताल की जाए। क्या अब इसकी आशंका नहीं कि कोई उसकी तस्वीर खींचकर गोमांस परोसे जाने का आरोप लगा दे? क्या ऐसी आशंका अतिरंजित रह गई है?
ऐसी अतिरंजित आशंका इसलिए होती है कि अब हिंदुओं में ऐसे संगठन हर जगह पाए जाते हैं जो मुसलमानों की निगरानी कर रहे हैं। उनका कौन पड़ोसी, कौन पुराना मित्र इनमें से किस संगठन से जुड़ गया है, यह कैसे पता किया जा सकता है?
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हालात निश्चय ही ग़ैरमामूली हैं। इस वक्त का शब्द है, चौकसी, सावधानी। ख़ासकर मुसलमानों के लिए। उन्हें अपनी ख़ुशी का कोई वीडियो नहीं बनाना चाहिए: उनकी ख़ुशी को अपराध में बदल देने को ढेर सारे संगठन, गिरोह चारों तरफ़ घूम रहे हैं। अपने उल्लास को उन्हें बाहर व्यक्त नहीं करना चाहिए:उससे ‘हिंदू’ भावनाएँ आहत की जा सकती हैं।
क्यों अब मुसलमान निश्चिंत नहीं रह गए हैं? इस ईद का सबसे मुख्य प्रश्न यही है। यह ईद एक बार फिर हिंदुओं के लिए आत्ममंथन का अवसर है। आख़िर उन्होंने बजरंग दल, हिंदू जागरण वेदिके, हिंदू रक्षा दल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठनों को क्यों प्रश्रय दिया है और उन्हें क्यों सत्ता सुपुर्द कर दी है? क्यों अब ये संगठन इतने ताक़तवर हो गए हैं कि उन्होंने मुसलमानों का जीना हराम कर दिया है?
ईद गुजर गई है। वकील मित्र हर घंटे फ़ोन पूछ रही हैं कि सब ठीक न? ‘ईद मुबारक!’ का जवाब एक दोस्त देता है, ‘ख़ैर मुबारक!’
मैं जवाब पढ़ता हूँ। ख़ैर कहाँ है?