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गाँधी की हत्या में गाँधी की ज़िम्मेदारी

गोडसे को हत्या-स्थल से पकड़ा गया था। उसने ख़ुद अपना जुर्म क़बूल किया। इस वजह से इस पर शक करना संभव नहीं था कि वह गाँधी की हत्या नहीं करना चाहता था। लेकिन चालाकी से यह कहा गया कि जिस गोली से गाँधी मारे गए, वह गोडसे की नहीं थी। गोडसे ने अपना अपराध स्वीकार किया। इसे बहुत सारे लोग उसके साहस के रूप में पेश करना चाहते हैं। इस तरह कि क्या वह भगत सिंह की तरह ही बहादुर नहीं जो बम फेंककर भागे नहीं बल्कि वीरता से गिरफ़्तारी दी और मृत्यु का वरण किया?
अपूर्वानंद

गाँधी फिर लौट आए हैं। इस बार अपने हत्यारे के साए में। हरिशंकर परसाई ने बहुत साल पहले एक लेखक की अंतर्दृष्टि से गाँधी की इस गति का अनुमान कर लिया था। उन्होंने लिखा था - ‘एक समय आएगा जब पूछा जाएगा : आखिर गाँधी कौन था? जवाब मिलेगा : अरे, वही जिसे गोडसेजी ने मारा था।’ ऐसा अनेक लोगों का ख्याल है कि गाँधी का जीवन अनेक पापों का इतिहास है और आज वे लोग सत्ता में हैं।अपने जीवन के अंतिम चरण में उनके पाप सीमा पार कर गए। जैसे कृष्ण ने शिशुपाल के सौ गुनाह बर्दाश्त किए लेकिन जब वह उससे आगे बढ़ गया तब उनका चक्र उनके हाथ से छूट गया और शिशुपाल वध हुआ। गोडसे को कृष्ण और गाँधी को शिशुपाल मानने वालों की कमी नहीं!
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इस समझ के कारण नाथूराम गोडसे को आदर से देखने वालों की कभी कमी नहीं रही है। लेकिन गोडसे को हत्यारा कहा जाना बुरा लगता है। इसलिए यह सवाल भी किया जाता रहा है कि क्या गाँधी की हत्या नाथूराम गोडसे ने की थी? इस बात को लेकर एक अफ़वाह बचपन से सुनता आया था। कोई 40 बाद उसी अफ़वाह को अपनी तब की उम्र के आज के बच्चे के मुँह से सुनूँगा, यह सोचा न था।

गाँधी के हत्या स्थल पर दो साल पहले स्कूली बच्चों से बात हो रही थी। एक ने पूछा, ‘क्या यह सच है कि गोडसे ने नहीं, वास्तव में नेहरू ने झाड़ी में छिपकर गोली चलाई थी, जिससे गाँधी मारे गए!’ यह बात उसे घर में बताई गई थी।
हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने अपना क़ीमती वक़्त एक अर्ज़ी पर विचार करने में ख़र्च किया। अर्जी में कहा गया था कि गाँधी की हत्या की नए सिरे से जाँच होनी चाहिए क्योंकि अर्जी के मुताबिक़ उनकी मौत गोडसे की तीन गोलियों से नहीं, चौथी गोली से हुई थी। यह बात और है कि आख़िरकार अदालत ने इस अर्ज़ी को ख़ारिज कर दिया। लेकिन क्या इस चर्चा को समाज से ख़ारिज किया जा सकता है?
गोडसे को हत्या-स्थल से पकड़ा गया था। उसने ख़ुद अपना जुर्म क़बूल किया। इस वजह से इस पर शक करना संभव नहीं था कि वह गाँधी की हत्या नहीं करना चाहता था। लेकिन चालाकी से यह कहा गया कि जिस गोली से गाँधी मारे गए, वह गोडसे की नहीं थी।
गोडसे ने अपना अपराध स्वीकार किया। इसे बहुत सारे लोग उसके साहस के रूप में पेश करना चाहते हैं। क्या वह भगत सिंह की तरह ही बहादुर नहीं जो बम फेंककर भागे नहीं बल्कि वीरता से गिरफ़्तारी दी और मृत्यु का वरण किया?
जो यह कहते हैं कि गोडसे को गाँधी पर इसलिए क्रोध था कि वह भारत का विभाजन नहीं रोक पाए और उन्होंने पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये दिलवाए, वे लोग इसका कोई जवाब नहीं देना चाहते कि 1948 से पहले क्यों गोडसे ने दो बार गाँधी को मारने की कोशिश की थी?
गोडसे ने गाँधी की हत्या की लेकिन इस बात के पक्के सबूत हैं कि इस साज़िश में विनायक दामोदर सावरकर की अहम भूमिका थी। गाँधी से सावरकर की प्रतिद्वंद्विता बहुत पुरानी थी। सावरकर एक षड्यंत्रकारी थे, नौजवानों को उकसा कर हिंसा करवाना उनका पुराना काम था, गोडसे सिर्फ़ उनका सबसे नया शिष्य था जिसके हाथों वह गाँधी की हत्या करवाना चाहते थे।

चूँकि भारत में उस वक़्त क़ानून का शासन था, वह आज की तरह जन भावना के कारण किसी को फाँसी पर चढ़ा नहीं सकता था। सावरकर के ख़िलाफ़ हुई जाँच में पर्याप्त सबूत थे कि उन्हें गाँधी की हत्या के षड्यंत्र का पता था, इसे उनका आशीर्वाद प्राप्त था लेकिन इस साज़िश को क़ानूनी ऐतबार से पूरी तरह सिद्ध होना था। चूँकि यह राजफाश करने वाला सरकारी गवाह बन गया था, सिर्फ़ उसका साक्ष्य सावरकर का अपराध साबित करने के लिए काफ़ी न था। उसके साक्ष्य को एक स्वतन्त्र गवाही से पक्का किया जाना ज़रूरी था। इसी अभाव के कारण सावरकर बच गए।

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जो लोग सावरकर को वीर कहते हैं उन्हें याद रखना चाहिए कि गाँधी की हत्या के पूरे मुक़दमे के दौरान उन्होंने अपने शिष्य गोडसे और अन्य अभियुक्तों की तरफ़ आँख उठाकर भी नहीं देखा। इस तरह उन्होंने अदालत में अपने आचरण से साबित करना चाहा कि उनका इन सबसे कोई रिश्ता ही नहीं है। इससे उनके शिष्यों को, जिन्हें उन्होंने गाँधी की हत्या के अभियान में विजयी होने का आशीर्वाद दिया था, दुःख भी पहुँचा। जैसे, नाथूराम के भाई गोपाल गोडसे को इस बात से कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी उनसे किसी संबंध से इनकार किया। इनके इस आचरण को  कायरतापूर्ण चतुराई कहा जा सकता है, वीरता का इससे दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है।लेकिन हम वापस गाँधी की हत्या पर लौट आएँ। इसे और गोडसे को मानवीय तरीक़े से देखने की वकालत भी की जाती रही है। 
मैंने लोगों को कहते सुना है कि आख़िर गोडसे अत्यंत शिक्षित व्यक्ति थे, विचारक थे, तो गाँधी की हत्या जैसे निर्णय के पीछे के कारण को समझना ज़रूरी है। मानो यह अपराध न हो, एक सामाजिक-राष्ट्रीय कर्तव्य हो!
किसी भी क़त्ल में दो पक्ष होते हैं। एक क़ातिल और एक मकतूल। क़ातिल मारता है और मकतूल मारा जाता है। इसमें दो क्रियाएँ शामिल हैं - मारने की और मारे जाने की। क़त्ल को आजतक जुर्म माना जाता है, इसलिए अगर अगर यह मालूम करना हो कि इनमें जुर्म किसका था तो कैसे तय करेंगे।
मामूली अक्ल के लोग यह कहेंगे कि जुर्म तो क़ातिल का था। लेकिन जो ग़ैर मामूली दिमाग के मालिक हैं वे यह बताएँगे कि इसमें दोनों का जुर्म बराबर है। जो मारा गया, आख़िर उसने ख़ुद को बचाने की जुगत क्यों नहीं की? क्यों वह इस कदर कमजोर और मारे जाने के वक़्त असुरक्षित था कि क़ातिल के वार से खुद को बचा न सका? बल्कि उसकी यह कमी उसके मारे जाने की वजह थी, न कि क़ातिल का उसे मारने का फ़ैसला और कृत्य। इसके आगे यह भी कहा जा सकता है कि मरने वाला अधिक अपराधी है क्योंकि उसने न बचकर एक व्यक्ति को हत्यारा बना दिया।

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अक़सर हत्या हो जाने के बाद हत्यारे के बारे में मानवीय कहानियाँ लिखी जाती हैं। जैसे कि - हालाँकि वह मर्द था लेकिन बचपन में उसे गुड़िया से खेलने का शौक था, वह रात को सोने से पहले दूध ही पीता था और बकरे की ही क्यों न हो, बलि देखते हुए उसे उलटी आ जाती थी। कई हत्यारे संगीत के भी शौक़ीन बताए जाते हैं।

हिटलर ने यहूदियों के क़त्ल का हुक्म दिया होगा, यह उसके वायलिन प्रेम को देखते हुए कठिन माना जाता है। प्रायः हत्यारों के इरादे की खोज करते हुए लोग उनका मनोविश्लेषण करते हैं। किसी निजी ग्रंथि की तलाश की जाती है जिसने उसे हत्या की ओर प्रवृत्त किया।
एक और तरीक़ा है हत्याओं पर बात करने का, जो स्त्रियों के साथ बलात्कार का औचित्य खोजते हुए भी इस्तेमाल किया जाता है। वह यह कि जिसकी हत्या की गयी, ज़रूर उसने हत्या के लिए उकसाया होगा। वरना एक अहिंसक व्यक्ति हत्या कैसे कर सकता है! इस तर्क का भारत में एकाधिक बार इस्तेमाल किया गया है।

ग्राहम स्टेंस और उनके बेटों की हत्या के लिए दारा सिंह को फाँसी से राहत देने के निर्णय में भी उच्चतम न्यायालय ने यही तर्क दिया था। दारा सिंह का यह ख्याल था कि स्टेंस धर्म परिवर्तन का कार्य कर रहे थे जिसके कारण उसने उनकी और उनके बेटों की हत्या की। वह, दरअसल एक सामाजिक क्षोभ को ही व्यक्त कर रहा था! 

यही तर्क पुणे में एक मुसलमान नौजवान मोहसिन ख़ान के हत्यारे को जमानत देने के लिए अदालत ने इस्तेमाल किया, ‘मारे गए शख़्स की ग़लती सिर्फ़ यही थी कि वह दूसरे धर्म का था। मैं इस बात को आवेदक/अभियुक्त के पक्ष में एक दलील मानती हूँ। इसके अलावा,आवेदकों/अभियुक्तों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और लगता है कि धर्म के नाम पर वे (यानी मोहसिन के धर्म के कारण) उत्तेजित हो गए और उन्होंने यह क़त्ल किया।”

यानी हत्यारों को इस हत्या के लिए मोहसिन के मुसलमान होने ने उकसाया। वे बेचारे, जिन्होंने जीवन में किसी को नहीं मारा, मोहसिन के चलते अपराधी बन गए। तो जुर्म किसका है?

इसी तर्क के अनुसार अब भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के बयानों के माध्यम से यह आग्रह किया जा रहा है कि गोडसे के साथ न्यायपूर्ण विचार होना चाहिए। 30 जनवरी,1948 को बिड़ला भवन में हुई गाँधी की हत्या में गाँधी की ही ज़िम्मेदारी तय की जानी चाहिए और गोडसे को इतिहास में हत्यारे की जगह सही नाम से पुकारा जाना चाहिए।
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