आइसा नेता नेहा बोरा को सड़क पर घसीटती पुलिस
नेहा बोरा ने दिल्ली पुलिस के ‘पीस-बॉण्ड’ पर दस्तख़त करने से इनकार करके भारत की जनता का बहुत उपकार किया है। उनकी इस ना के बाद इस पर बहस शुरू हो गई है कि आख़िर शांति कैसे कहते हैं। सिर्फ़ यही नहीं, बल्कि यह भी कि जनतंत्र किसे कहते हैं।
पुलिस या राज्य की शांति की जो परिभाषा है, क्या वह जनता की हितकारी शांति है? या सरकार अपने लिए शांति चाहती है? जब जनता का सुख चैन छिन जाए, जब उसकी आँखों से नींद उड़ जाए तो वह क्या करे? जब उसकी गुहार न सुनी जाए तो क्या वह चीखे नहीं? क्या वह यह न कहे कि मुझे किसी तरह शांति नहीं है और उसकी वजह है सरकार के फ़ैसले, उसकी कारगुज़ारियाँ? सरकार को मालूम है कि जनता क्यों बेचैन है। लेकिन वह चाहती नहीं कि यह सब कुछ दुनिया में उजागर हो। वह किसी तरह का कोई विघ्न नहीं चाहती।
तो क्या जनता सरकार के चैन के लिए अपने होंठ सिल ले? क्या वह अपने अधिकार की माँग न करे? उसके लिए आवाज़ न उठाए क्योंकि सरकार के काम में ख़लल पैदा होता है?
नेहा बोरा ने एक बुनियादी सवाल उठाया है कि जनतंत्र में किसकी शांति का मोल ज़्यादा है। अगर जनता को शांति न हो तो सरकार क्यों चैन से रहे? सरकार जनता को कहती है कि चूँकि उसने ही उसे चुना है तो 5 साल तक वह उसे शांति से, जो वह चाहती है, करने दे। बीच में कुछ न बोले। उसे सिर्फ़ बूथ में वोट के ज़रिए बोलने का हक़ है।
वोट देना अभिव्यक्ति है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि दो वोटों के बीच जनता बोल ही नहीं सकती। जनतंत्र यह नहीं है। जनतंत्र लगातार जनता की सक्रियता से ही निर्मित होता है। वह जो सरकार चुनती है, उसके काम पर नज़र रखना, उसे परखना, ग़लत लगने पर सवाल उठाना और सवाल न सुने जाने पर अपना विरोध ज़ाहिर करना, यह जनता का काम है। इस तरह वह जनतंत्र को चुनी हुई राजशाही में बदलने से रोकती है।
‘पीस बॉण्ड’ के ज़रिए सरकार जनता का मुँह बंद करना चाहती है। वह दो चुनावों या वोटों के बीच उसके हाथ-पाँव और मुँह बंद कर देना चाहती है। सरकार के पास तो पुलिस का बल है, उसके पास लाठी और गोली है, जनता के पास सिर्फ़ उसकी आवाज़ है। लेकिन इस आवाज़ में इतनी ताक़त है कि सरकार को हिला दे।इसलिए सरकार जनता से वादा चाहती है कि वह चुप रहेगी।
नेहा बोरा ने इसे मानने से इनकार कर दिया है। यह समझना हमारे लिए ज़रूरी है कि जनता अपनी ख़ुदमुख़्तारी इस तरह के इनकार से ही हासिल करती है।नेहा ने साफ़ कहा, “ यह शांति सरकार के लिए नहीं हो सकती। असहमति जताने का अधिकार जारी रहेगा।”
असहमति का अधिकार ही जनतंत्र का प्राण है। जिस सरकार को जनता की असहमति से ख़तरा मालूम होने लगे, उसे बने रहने का अधिकार नहीं। -अपूर्वानंद
अपने कॉलम वक्त बेवक्त में 26 अक्टूबर 2026 को लिखा
सरकार ख़तरे मेंहो न हो, नेहा बोरा ज़रूर ख़तरे में हैं। पिछले हफ़्ते पुलिस की नोटिस का जवाब देने जब वह दिल्ली के मंदिर मार्ग थाने पहुँचीं तो गुंडों का एक गिरोह नेहा पर हमला करने की नीयत से थाने के सामने इकट्ठा था। वे गुंडे लगातार नेहा के ख़िलाफ़ नारे लगा रहे थे । देखना मुश्किल नहीं था कि पुलिस उन गुंडों के प्रति कितनी सहिष्णु थी। उन्हें हटाने का कोई प्रयास पुलिस की तरफ़ से नहीं किया जा रहा था। पुलिस तर्क दे सकती है कि वे गुंडे अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग कर रहे थे। उन्हें अपनी बात कहने के लिए संगठित होने का संवैधानिक अधिकार है और पुलिस इस अधिकार का उल्लंघन कैसे कर सकती है?
कहने की ज़रूरत नहीं कि इस भीड़ के बीच से पैदल नेहा का थाने में जाना ख़ासा जोखिम भरा काम था। उन पर हमला हो सकता था। पुलिस इस भीड़ को नियंत्रित करने का कोई प्रयास नहीं कर रही थी। मालूम हुआ कि जब नेहा के साथियों ने पुलिस को धमकी दी कि अगर यह भीड़ इकट्ठा रही तो अनादर नहीं जाएँगी और उन्हें इस बता को लेकर अदालत जाना होगा। इससे मजबूर होकर पुलिस को बेमन से भीड़ को किनारे करना पड़ा। नेहा जो पैदल ही आई थी, आख़िरकार अपने वकील की गाड़ी में भीतर जा सकीं। अब उस गाड़ी की तस्वीर दिखा कर पूछा जा रहा है कि नेहा लाखों की गाड़ी में कैसे चलती हैं?
यह विडंबना की बात ही है कि नेहा पुलिस के पास गई थीं वे काग़ज़ात लेने जिनसे मालूम हो सके कि पुलिस ने उनपर शांति भंग करने का आरोप किस आधार पर लगाया लगाया है और क्यों उन्हें एक शांति-बॉण्ड भरने को कहा है।जब नेहा ने पूछा कि आख़िर उन्होंने शांति कैसे भंग की थी तो पुलिस के कहा कि वे नारे लगा रही थीं जिससे माहौल ख़राब हो रहा था और उन्होंने भीड़ इकट्ठा कर रखी थी। यह सब पुलिस द्वारा लागू निषेधाज्ञा का उल्लंघन था। उन्होंने पहले भी कई बार सरकार विरोधी प्रदर्शन किए हैं जिनसे शांति भंग हुई है। इसलिए अब पुलिस उनसे एक बॉण्ड भरने को कह रही है कि वे आगे शांति भंग नहीं करेंगी।
नारे लगाती हुई नेहा को पुलिस ने प्रदर्शन स्थल से उठाया और रात भर बंद रखा। उन्हें कहा गया कि वे शांति बॉण्ड भर दें और चली जाएँ। नेहा ने यह करने से इनकार किया और इसे अदालत में चुनौती दी। नेहा का कहना है कि पुलिस मनमाने तरीक़े से आरोप नहीं लगा सकती कि वे शांति भंग कर रही थीं या उनके आगे की कार्रवाई से शांति भंग होने की आशंका है। क्या बॉण्ड भरने को कहने के पहले उसने कोई जाँच की थी? क्या उसके पास कोई सबूत है जिससे उसकी आशंका का आधार मालूम हो सके?
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अदालत ने पुलिस को कहा है कि वह नेहा को इससे संबंधित काग़ज़ात मुहैया करवाए। इस सबसे अलग नेहा ने दुहराया है कि वे कभी भी शांति बॉण्ड नहीं भरेंगी। लेकिन वे किसी को जाना से मारने की धमकी नहीं दे रहीं, वे किसी हिंसा का उकसावा नहीं कर रहीं। वे जब जब समूह में इकट्ठा हुई हैं, उनके साथ पुलिस ने ज़ोर ज़बरदस्ती की है, उन्होंने या अनेक साथियों से हताह नहीं उठाया है। उनके न बंद होने वाले नारों से अगर सरकार को असुविधा हो रही है तो उसे नेहा की माँग पर कान देना चाहिए, न कि नेहा का मुँह बंद करने के लिए अपनी पुलिस की ताक़त और अपने गुंडों के ज़ोर का सहारा लेना चाहिए।