यूपी के शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय
“रेन रेन गो अवे, लिटल जॉनी वांट्स टू प्ले”: इस ‘नर्सरी राइम’ पर उत्तर प्रदेश के शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ख़फा हैं। इसे स्कूली किताब से हटा देना चाहिए क्योंकि उनके मुताबिक़ यह भारतीय संस्कृति विरोधी है। इस कविता में सिर्फ़ जॉनी के खेलने के लिए बारिश को भगाने की बात की जा रही है।बताइए, एक बच्चे के खेलने के लिए उस बारिश को जाने को कहा जा रहा है जो सबका भला करती है, जो खेती के लिए ज़रूरी है।
मंत्री के मुताबिक़ इसमें स्वार्थपरता की शिक्षा दी जा रही है। यह ‘स्वांतः सुखाय’ के सिद्धांत के मुताबिक़ लिखी गई है। ‘स्वांतः सुखाय’ भारतीय संस्कृति नहीं है।भारतीय संस्कृति है: “सर्वजन सुखाय”। इसलिए एक जॉनी के खेलने के लिए सबको सुख पहुँचनेवाली बारिश को भगाने की बात करनेवाली इस कविता की स्कूली किताब में कोई जगह नहीं क्योंकि इससे बच्चों को ग़लत मूल्यों की शिक्षा मिलती है।
वैसे, भारतीय संस्कृति का ही पद है:”स्वांतः सुखाय!” यह कोई हॉब्स में तो लिखा नहीं। दूसरे आज के भारतीयतावादियों के सबसे बड़े कवि ने रघुनाथ गाथा तो स्वांतः सुखाय ही लिखी थी!
इसके पहले ठेके पर काम करनेवाले अध्यापकों को संबोधित करते हुए उन्होंने ‘जॉनी जॉनी:यस पापा,ईटिंग शुगर:नो पापा’ वाली नर्सरी राइम पर भी आपत्ति जताई।इस कविता में जॉनी चीनी खाकर अपने पिता से झूठ बोल रहा है कि उसने चीनी नहीं खाई है। यह बच्चों को झूठ बोलना सिखाती है, जो भारतीय संस्कृति के ख़िलाफ़ है।उनमें ग़लत संस्कार डालती है।
आप यह न समझें कि मंत्री महोदय अध्यापकों को देखकर बहक गए। इस सभा के बाद पत्रकारों को भी उन्होंने यह समझाया कि बारिश को सिर्फ़ जॉनी के खेलने के लिए जाने को कहनेवाली कविता क्यों भारतीय संस्कार के ख़िलाफ़ है।
फिर कोई चाहे तो मंत्री तो एक भारतीय गीत ‘मैया मोही, मैं नहिं माखन खायो’ सुनाकर पूछ सकता है कि इसमें तो कृष्ण ही झूठ बोल रहे हैं!
मंत्री महोदय की गंभीर वार्ता देखकर लोग दाँतों तले उँगली दबा रहे हैं कि क्या मूर्खता इस हद तक जा सकती है और कुछ लोग यह कह रहे हैं कि अपनी मूर्खता का ऐसा सार्वजनिक प्रदर्शन करने के लिए ख़ासा आत्मविश्वास चाहिए।
कुछ लोग इसे नज़रअंदाज़ करने को कह रहे हैं क्योंकि मंत्री तो राजनेता होता है और राजनेता की बात तो बस जुमलेबाजी होती है। ऐसे उदारचेता लोग सलाह देंगे कि मंत्री की असल बात है ‘सर्वजन सुखाय’ के मूल्य और भारतीय संस्कार की पैरवी। हमें उनकी बात में से सार ले लेना चाहिए और थोथा उड़ा देना चाहिए।
लेकिन मैं यह कहना चाहता हूँ कि मंत्री का यह यह वक्तव्य अकेले उनका नहीं है और इसे हमें उतनी ही गंभीरता से लेना चाहिए जितनी गंभीरता से वे इस ‘अभारतीय’ अंग्रेज़ी कविता की आलोचना कर रहे हैं।कुछ साल पहले मैंने ठीक इसी तरह की बात दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में अंबेडकर यूनिवर्सिटी की कुलपति डॉक्टर अनु सिंह लाठर से सुनी थी। औपनिवेशीकरण के विरुद्ध बौद्धिक अभियान के तहत आयोजित एक गोष्ठी में कुलपति महोदया ने मंत्री महोदय की तरह ही एक नर्सरी राइम सुनाई: “जैक एंड जिल, वेंट अप द हिल तो फ़ेच अ पेल ऑफ़ वॉटर।” फिर उन्होंने कहा कि पानी लाने के लिए पहाड़ पर क्यों जाना चाहिए! पानी तो नीचे मिलता है, ऊपर नहीं। यह कविता विज्ञान विरोधी है, अतार्किक है।जैक का सिर इसी लिए फूट गया!
कुलपति महोदया के अनुसार कविता ग़लत, अतार्किक बात बतलाती है। इस तरह की कविताओं को पढ़ा-पढ़ाकर भारतीयों के दिमाग़ का उपनिवेशीकरण कर दिया गया है। उसे इससे मुक्ति के लिए भारतीय नर्सरी राइम की तरह जाना चाहिए। फिर जैक एंड जिल की जगह उन्होंने हमें ‘मछली जल की रानी है, जीवन उसका पानी है” जैसी राइम याद करने को कहा। इसमें पर्यावरण के प्रति संवेदना है, प्राणी के प्रति सहानुभूति है।
मंत्री महोदय ने भी ‘रेन रेन गो अवे’ की जगह ‘काले मेघा पानी दे, पानी दे गुड़धानी दे’ जैसी नर्सरी राइम पढ़ने और पढ़ाने की सलाह दी थी।उसमें बारिश भागने नहीं,उसे बुलाने की बात है!
मंत्री की ‘मूर्खता’ और अंबेडकर यूनिवर्सिटी की कुलपति की ‘बुद्धिमत्ता’ में क्या अंतर है? मैंने जब अपने एक मित्र से दोनों की चर्चा की और आश्चर्य व्यक्त किया कि अंग्रेज़ी नर्सरी राइम के बारे में दोनों एक तरह की हास्यास्पद बात कैसे कर रहे हैं तो उन्होंने मुझे कहा कि आप यह कैसे भूल गए वे दोनों की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नामक नर्सरी के पौधे हैं।
क्या इस बात को हमें हँसी में उड़ा देना चाहिए? ध्यान रहे,मंत्री की राय से पाठ्यपुस्तक की सामग्री तय हो सकती है और कुलपति की राय का असर विश्वविद्यालय के शिक्षण पर पड़ सकता है।उनकी मूर्खता समाज में मूर्खता का प्रसार कर सकती है।
उत्तर प्रदेश के शिक्षा मंत्री की प्रेस वार्ता और अंबेडकर यूनिवर्सिटी की कुलपति के अध्यक्षीय वक्तव्य को सुनकर नेहरू की यह बात पुख़्ता हो जाती है कि सांप्रदायिकता लोगों का दिमाग़ पिलपिला कर देती है। उसका मूर्खता से सीधा रिश्ता है।
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उत्तर प्रदेश के मंत्री के वक्तव्य में सांप्रदायिकता और मूर्खता यह रिश्ता स्पष्ट न था।लेकिन अंबेडकर यूनिवर्सिटी की कुलपति ने अपने वक्तव्य को आगे बढ़ाते हुए साफ़ कर दिया कि यह मूर्खता सांप्रदायिक दिमाग़ में ही पनप सकती है।अंग्रेज़ी राइम की अपनी तर्कपूर्ण आलोचना के बाद उन्होंने हमें समझाया कि औपनिवेशिकता का समय अंग्रेजों के बहुत पहले शुरू होता है जब मुग़लों ने तलवार के ज़ोर से हिंदुस्तान पर क़ब्ज़ा कर लिया। यह औपनिवेशिकता की सांप्रदायिक व्याख्या है और विद्वत् समूह में कोई इसे बोलते समय हज़ार बार सोचेगा। लेकिन कुलपति के पास दोनों चीज़ें थीं: एक मूर्खता का आत्मविश्वास और दूसरा सांप्रदायिक सत्ता का बल।
जो हो, जिन अध्यापकों को मंत्री महोदय बच्चों में भारतीय मूल्य भरने का उपदेश दे रहे थे उनकी मासिक तनख़्वाह 10 हज़ार रुपए से बढ़ाकर 18 हज़ार करने की घोषणा भी उन्होंने की। इसी 18 हज़ार में अध्यापक को बच्चों में इस भारतीयतावादी मूर्खता का प्रसार करना है!