पश्चिम बंगाल के प्रमुख बंगाली समाचार पत्र आनंदबाजार पत्रिका के पत्रकारों के खिलाफ दर्ज एफआईआर और उसके कार्यालय के बाहर हुए गेरुआ कपड़ा पहने लोगों के विरोध प्रदर्शन से बवाल खड़ा हो गया है। गेरुआ कपड़ा पहने लोगों के एक समूह ने मंगलवार को कोलकाता स्थित अखबार के कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया और इमारत की सफेद दीवारों के कुछ हिस्सों पर गेरुआ रंग से रंग दिया। प्रदर्शनकारियों ने अखबार के खिलाफ नारेबाजी भी की।

यह विरोध जादवपुर विश्वविद्यालय में हुई हिंसक झड़पों पर प्रकाशित एक खबर के शीर्षक 'गेरुआ गुंडागर्दी' को लेकर किया गया। इस शीर्षक पर आपत्ति जताते हुए अखबार के संपादकीय विभाग के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है। इस कार्रवाई की पत्रकार संगठनों ने कड़ी आलोचना करते हुए एफआईआर तुरंत वापस लेने की मांग की है।

इस विवाद की शुरुआत 19 और 20 अगस्त को जादवपुर विश्वविद्यालय में हुई झड़पों के बाद तब हुई जब आनंदबाजार पत्रिका ने इस घटना पर दो खबरें प्रकाशित कीं। इन ख़बरों के शीर्षक में 'गेरुआ गुंडागर्दी' शब्द का इस्तेमाल किया गया था। इसी शब्द को लेकर विवाद शुरू हुआ।
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार 27 अगस्त को शास्त्री महाराज नामक एक हिंदू संत ने कोलकाता के बोबाजार थाने में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में कहा गया कि 'गेरुआ गुंडागर्दी' शब्द का इस्तेमाल जानबूझकर हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और समाज में अशांति फैलाने के उद्देश्य से किया गया। इसके आधार पर 28 अगस्त को पुलिस ने आनंदबाजार पत्रिका के संपादकीय विभाग के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली।

किन पत्रकारों पर दर्ज हुई FIR?

पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार एफआईआर में आनंदबाजार पत्रिका की संपादक ईशानी दत्ता रॉय, चीफ रिपोर्टर सोमा मुखर्जी और संपादकीय टीम के अन्य सदस्यों के नाम शामिल किए गए हैं। शिकायत में मांग की गई है कि पुलिस यह जाँच करे कि विवादित शब्द का सुझाव किसने दिया, शीर्षक किसने मंजूर किया और संपादन प्रक्रिया में कौन-कौन शामिल था। शिकायतकर्ता का आरोप है कि इन लोगों ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से यह शब्द इस्तेमाल किया।

इसके बाद गेरुआ कपड़े पहने कई लोग मंगलवार दोपहर आनंदबाजार पत्रिका के कार्यालय के बाहर पहुंचे। प्रदर्शनकारियों ने 'आनंदबाजार पत्रिका हाय-हाय' और 'भगवा का अपमान हिंदुस्तान नहीं सहेगा' जैसे नारे लगाए। इसके बाद उन्होंने अखबार दफ्तर की दीवारों पर भगवा रंग पोत दिया। हालाँकि कुछ घंटों बाद अखबार प्रबंधन ने दीवारों को दोबारा सफेद रंग से रंगवा दिया।

पुलिस पर उठे सवाल

इस घटना के कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। वीडियो में देखा जा सकता है कि जब प्रदर्शनकारी दीवारों पर रंग पोत रहे थे और नारे लगा रहे थे, तब कई पुलिसकर्मी मौके पर मौजूद थे। हालांकि पुलिस ने इस घटना को लेकर अब तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। यह भी साफ़ नहीं है कि दीवारों पर रंग पोतने वाले लोगों के खिलाफ कोई मामला दर्ज किया गया है या नहीं।

टीएमसी विधायक ने की निंदा

तृणमूल कांग्रेस के विधायक कुणाल घोष ने इस घटना की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि किसी समाचार पत्र की संपादकीय नीति या खबर से असहमति हो सकती है और उसके खिलाफ लोकतांत्रिक तरीके से विरोध भी किया जा सकता है। लेकिन ताकत के बल पर किसी मीडिया संस्थान के दफ्तर पर इस तरह हमला करना सही नहीं है। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाएं पश्चिम बंगाल की छवि को नुकसान पहुंचाती हैं।

मुख्यमंत्री की चेतावनी के बाद बढ़ा विवाद

एफआईआर दर्ज होने से पहले 28 अगस्त को जादवपुर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने आनंदबाजार पत्रिका से 24 घंटे के भीतर 'गेरुआ गुंडागर्दी' शीर्षक के लिए माफी मांगने को कहा था। उन्होंने यह भी कहा था कि यदि अखबार माफी नहीं मांगता तो भगवा पहनने वाले लोग विरोध प्रदर्शन करेंगे। हालाँकि अखबार ने माफी जारी नहीं की। इसके बाद कार्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन हुआ।

प्रेस संगठन ने जताई चिंता

इंडियन विमेंस प्रेस कॉर्प्स यानी IWPC और प्रेस एसोसिएशन ने संयुक्त बयान जारी कर पत्रकारों के खिलाफ दर्ज एफआईआर की कड़ी निंदा की है। दोनों संगठनों ने कहा कि पत्रकारों का काम तथ्यों को सामने लाना है। कई बार रिपोर्टिंग या इस्तेमाल किए गए शब्द कुछ लोगों को पसंद नहीं आते, लेकिन यही स्वतंत्र पत्रकारिता और लोकतंत्र की बुनियाद है। बयान में कहा गया कि पत्रकारों के खिलाफ लगातार एफआईआर दर्ज होना बेहद चिंताजनक है।
संगठनों के अनुसार, इससे पत्रकारों को अपराधी की तरह पेश किया जाता है और स्वतंत्र प्रेस की भूमिका कमजोर होती है।

पत्रकारों को निशाना बनाने का आरोप

प्रेस संगठनों ने शिकायत में यह मांग किए जाने पर भी आपत्ति जताई कि विवादित शब्द का सुझाव किसने दिया, उसे किसने मंजूर किया और शीर्षक तय करने में कौन-कौन शामिल था। उनका कहना है कि इस तरह संपादकीय प्रक्रिया में शामिल पत्रकारों और संपादकों की पहचान मांगना सीधे तौर पर पत्रकारों को निशाना बनाने जैसा है। संगठनों ने इसे स्वतंत्र पत्रकारिता पर दबाव बनाने की कोशिश बताया।

FIR वापस लेने की मांग

इंडियन विमेंस प्रेस कॉर्प्स और प्रेस एसोसिएशन ने राज्य सरकार और पुलिस से अपील की है कि पत्रकारों को डराने या उनकी आवाज दबाने के लिए एफआईआर जैसे कानूनी साधनों का इस्तेमाल न किया जाए। पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार दोनों संगठनों ने मांग की कि आनंदबाजार पत्रिका के पत्रकारों और संपादकीय टीम के खिलाफ दर्ज एफआईआर तुरंत वापस ली जाए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता का संरक्षण जरूरी है, न कि उसे कानूनी कार्रवाई के जरिए दबाने की कोशिश।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहस

इस पूरे घटनाक्रम के बाद एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मीडिया की स्वतंत्रता और पत्रकारों के खिलाफ दर्ज होने वाले मामलों को लेकर बहस तेज हो गई है। एक ओर शिकायतकर्ता और प्रदर्शनकारी 'गेरुआ गुंडागर्दी' शब्द को धार्मिक भावनाओं का अपमान बता रहे हैं, वहीं पत्रकार संगठन इसे संपादकीय स्वतंत्रता का मामला मानते हुए एफआईआर को प्रेस की आजादी पर हमला बता रहे हैं।