चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल के डायमंड हार्बर से पांच वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर दिया है, जिनमें एक अतिरिक्त एसपी और एसडीपीओ शामिल हैं। हालांकि बंगाल में तमाम पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति चुनाव आयोग ने की थी।
चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के दौरान निष्पक्षता और तटस्थता बनाए रखने में गंभीर विफलता के आरोप में पाँच वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। साथ ही इन अधिकारियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही भी शुरू कर दी गई है। आयोग की इस कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं। ये कार्रवाई बीजेपी प्रत्याशियों की शिकायत पर की गई है। दूसरी तरफ तृणूल कांग्रेस ने जिन अफसरों की शिकायत आयोग में की, उन अफसरों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। चुनाव के दौरान ही चुनाव आयोग ने राज्य का डीजीपी बदलने से लेकर एसएचओ को हटाने की कार्रवाई कर चुका है। अगले चरण का मतदान 29 अप्रैल को है। इससे बाकी पुलिस अधिकारियों को एक संदेश चला गया है।
जिन अधिकारियों को निलंबित किया गया है, उनके नाम: संदीप गराई, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (एडीशनल एसपी), डायमंड हार्बर, सजल मंडल, सहायक पुलिस अधीक्षक (एसडीपीओ), डायमंड हार्बर, मौसम चक्रवर्ती, इंस्पेक्टर इंचार्ज, डायमंड हार्बर पुलिस स्टेशन, अजय बाग, इंस्पेक्टर इंचार्ज, फलता पुलिस स्टेशन, शुभेच्छा बाग, ऑफिसर इंचार्ज, उस्ती पुलिस स्टेशन। पुलिस अधिकारी ईशानी पॉल को चेतावनी दी गई है।
सभी निलंबित अधिकारी दक्षिण 24 परगना जिले के डायमंड हार्बर क्षेत्र से संबद्ध हैं, जो चुनावी संवेदनशीलता के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है। चुनाव आयोग ने स्पष्ट रूप से कहा है कि इन अधिकारियों ने “गंभीर कदाचार” किया और “तटस्थता बनाए रखने में पूरी तरह विफल” रहे, जो मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट (एमसीसी) का सीधा उल्लंघन है। सूत्रों ने बताया कि बीजेपी के प्रत्याशियों ने इन पुलिस अधिकारियों की शिकायत की थी। टीएमसी ने कहा- पुलिस अधिकारी जब बीजेपी की सलाह को मानने से इंकार करने लगे तो उन पर कार्रवाई की गई।
क्यों मायने रखती है यह कार्रवाई?
चुनाव आयोग द्वारा इस स्तर की सामूहिक निलंबन की कार्रवाई नई नहीं है, लेकिन इसका वक्त और क्षेत्र विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 अभी चल रहे हैं या अपने निर्णायक चरण में हैं, और राज्य का चुनावी इतिहास राजनीतिक हिंसा, बूथ कैप्चरिंग तथा प्रशासनिक पक्षपात की घटनाओं से भरा पड़ा है। ऐसे में पुलिस अधिकारियों की तटस्थता लोकतंत्र की सबसे मजबूत कड़ी होती है। यदि ये अधिकारी मतदान केंद्रों पर, उम्मीदवारों की सुरक्षा में या शिकायत निपटान में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाते हैं, तो पूरे चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो जाते हैं। लेकिन बीजेपी प्रत्याशियों की शिकायत पर एक्शन लेना सवाल उठा रहा है।
डायमंड हार्बर जैसे क्षेत्र में एक साथ पाँच अधिकारियों का निलंबन बता रहा है कि आयोग ने स्थानीय स्तर पर व्यवस्थागत समस्या का आकलन नहीं कर पाया। टीएमसी का आरोप है कि बीजेपी प्रत्याशियों ने जिन पुलिस अधिकारियों के नाम आयोग को दिए थे, उनकी तैनाती ईसीआई ने की थी। लेकिन उनमें से जब कुछ पुलिस अधिकारियों ने बीजेपी के मनचाहे फरमान को मानने से मना किया तो उन पर कार्रवाई की गई।
अगले चरण के चुनाव में काम करेगा आयोग का यह एक्शन
इस घटना का प्रभाव केवल इन पाँच अधिकारियों तक सीमित नहीं रहेगा। पूरे राज्य के पुलिस बल पर यह एक चेतावनी का काम करेगा कि चुनाव आयोग की नजर हर जगह है। खासकर दक्षिण 24 परगना जैसे जिलों में, जहाँ विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच तीखी प्रतिद्वंद्विता है, यह कार्रवाई मतदाताओं के बीच विश्वास बढ़ाएगी कि चुनाव निष्पक्ष होंगे। साथ ही, विपक्षी दल और चुनाव पर्यवेक्षक अब और मजबूती से शिकायतें दर्ज करा सकेंगे, क्योंकि आयोग ने साबित कर दिया है कि वह सबूतों पर तुरंत कार्रवाई करता है। इस एक्शन से अगले चरण में ड्यूटी पर तैनात पुलिस अधिकारियों को संदेश चला गया है। यानी मतदान का अगला दौर और भी विवादित होने वाला है।
सवाल तो और भी हैं। क्या ये अधिकारी किसी विशेष राजनीतिक दबाव में थे? क्या स्थानीय स्तर पर कोई बड़ा “प्रभाव” काम कर रहा था? चुनाव आयोग को अपनी जाँच रिपोर्ट में इन पहलुओं को भी स्पष्ट करना चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके। कुल मिलाकर, यह निलंबन पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 को “स्वच्छ और निष्पक्ष” बनाने की दिशा में कितना मजबूत कदम है, इसका पता 29 अप्रैल को चल जाएगा।
दो विवादित आदेश से सबक नहीं सीखा आयोग ने
चुनाव आयोग बंगाल के मामले में सबसे ज्यादा बदनाम हो रहा है। कलकत्ता हाईकोर्ट ने उसके दो विवादित आदेशों पर रोक लगा दी। आयोग ने बाइक चलाने वालों और उनके पीछे बैठने वाली सवारी पर बैन लगाते हुए कई तुगलकी आदेश जारी किए। हाईकोर्ट ने आदेश पर रोक लगाते हुए पूछा है कि आखिर बाइक मूवमेंट ठप करने से क्या हासिल हो जाएगा। हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग की 800 विवादित लोगों की सूची तो भी रद्द कर दिया। आयोग ने बंगाल में 800 लोगों के नाम जारी किए थे, जिनकी वजह से चुनाव में परेशानी हो सकती थी। हाईकोर्ट ने कहा कि भारत में कोई शख्स गलत है या सही, इसका फैसला चुनाव आयोग कैसे कर सकता है। उसने आयोग के आदेश को निलंबित कर दिया है।