टीएमसी नेता डेरेक ओब्रायन, ऋतब्रत बनर्जी ने कहा है कि 'यदि मिड-डे मील से अंडे को हटा दिया जाता है तो हम इस कदम का पुरज़ोर विरोध करेंगे।' इस्कॉन के खाना परोसने के विवाद पर शुभेंदु अधिकारी ने कहा है- 'इस्कॉन खाना खिलाएगा, हरे कृष्ण बोलने की ज़रूरत नहीं।'
शुभेंदु अधिकारी और डेरेक ओब्रायन
पश्चिम बंगाल में मिड-डे मील योजना में बदलाव के बीजेपी सरकार के फ़ैसले पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। मिड-डे मील के मेन्यू से अंडा हटाए जाने की ख़बरों को लेकर विपक्ष ने शुभेंदु सरकार पर बंगाल के लोगों पर शाकाहार थोपने का आरोप लगाया है। टीएमसी के नेता डेरेक ओब्रायन ने कहा है कि बंगाल इसको खारिज करता है। टीएमसी के बागी गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने भी कहा है कि यदि मिड-डे-मील से अंडा हटाया जाता है तो वह पूरजोर विरोध करेंगे।
ऋतब्रत बनर्जी ने एएनआई से कहा, '...जब प्रोटीन की बात आती है तो खाने से अंडा हटाना सही नहीं है, क्योंकि यह प्रोटीन का एक अहम स्रोत है। बंगाल में लोग पारंपरिक रूप से मांसाहारी खाना खाते हैं। अगर इन्हें हटा दिया जाता है तो सिर्फ़ शाकाहारी खाना ही परोसा जाएगा, जो बंगाल की खान-पान की परंपराओं के अनुकूल नहीं है। हम इस कदम का कड़ा विरोध करते हैं।'
यह विवाद तब खड़ा हुआ जब राज्य की बीजेपी सरकार ने कोलकाता के सरकारी स्कूलों में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर इस्कॉन के सहयोग से पका हुआ शाकाहारी भोजन देने की योजना बनाई। इस प्रस्ताव के तहत मिड-डे मील के मेन्यू से अंडा हटाया जा सकता है। इसी मुद्दे पर विपक्षी तृणमूल कांग्रेस ने बीजेपी पर बंगाल की खान-पान की परंपरा पर हमला करने और बच्चों पर शाकाहार थोपने का आरोप लगाया है।
'बीजेपी विरोधियों पर अंडे फेंकती है, बच्चों से छीन रही'
राज्यसभा सांसद डेरेक ओब्रायन ने भी सोशल मीडिया पर सरकार को घेरा। उन्होंने लिखा कि बीजेपी विरोधियों पर अंडे फेंकने की राजनीति करती है, लेकिन बच्चों से अंडे छीन रही है। उन्होंने कहा, 'चुनाव प्रचार के दौरान मछली खाने के तमाशे के बाद गुजरात जिमखाना का असली चेहरा सामने आ गया है। बंगाल में नई बीजेपी सरकार काम कर रही है। विरोधियों पर अंडे फेंके जाते हैं, लेकिन मिड-डे मील से अंडे हटाकर बच्चों को पोषण से वंचित किया जा रहा है। शाकाहार थोपा जा रहा है। बंगाल इसे नकारता है।'चुनावों के दौरान तो बीजेपी ने कुछ और कहा था
पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान भी तृणमूल कांग्रेस ने बीजेपी पर आरोप लगाया था कि यदि वह सत्ता में आई तो बंगाल की खान-पान की परंपरा और संस्कृति बदल देगी और राज्य को 'शाकाहारी राज्य' बनाने की कोशिश करेगी। उस समय बीजेपी ने इन आरोपों को खारिज किया था। कई बीजेपी नेताओं ने सार्वजनिक रूप से मछली खाकर यह दिखाने की कोशिश भी की थी कि पार्टी बंगाल की खान-पान संस्कृति के खिलाफ नहीं है।
बजट में हुई मिड डे मील में बदलाव की घोषणा
राज्य के वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने विधानसभा में बीजेपी सरकार का पहला बजट पेश करते हुए मिड-डे मील योजना में बदलाव की घोषणा की। उन्होंने कहा कि नई योजना के तहत कोलकाता नगर निगम क्षेत्र के स्कूलों में इस्कॉन द्वारा तैयार भोजन दिया जाएगा। प्राथमिक विद्यालयों के लिए प्रति छात्र भोजन सामग्री की लागत 6.78 रुपये से बढ़ाकर 10 रुपये कर दी गई है। योजना को लागू करने के लिए इस्कॉन को रसोईघर और वितरण व्यवस्था तैयार करनी होगी, इसलिए इसे शुरू होने में एक-दो महीने लग सकते हैं।'हरे कृष्ण' कहने को कोई मजबूर नहीं करेगा: शुभेंदु
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने विधानसभा में इस फैसले का बचाव करते हुए कहा कि लोगों को इस्कॉन के नाम से डरने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा, "हम मिड-डे मील बनाने की जिम्मेदारी इस्कॉन को दे रहे हैं। अगर किसी को आपत्ति है तो 'हरे कृष्ण' मत कहिए, कोई मजबूर नहीं करेगा। लेकिन बच्चों को अच्छा और शुद्ध भोजन मिलेगा।"स्कूल शिक्षा मंत्री दीपक बर्मन ने भी अंडा हटाने के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि शाकाहारी भोजन से भी बच्चों को सभी आवश्यक पोषक तत्व मिल सकते हैं। उन्होंने कहा, 'दुनिया में करोड़ों लोग पूरी तरह शाकाहारी हैं और स्वस्थ जीवन जीते हैं। यह कहना गलत है कि बच्चों के पोषण के लिए अंडा जरूरी है।'
इस्कॉन ने क्या कहा?
इस्कॉन के उपाध्यक्ष राधारमण दास ने कहा है कि संगठन पिछले 20 से 22 वर्षों से देश के विभिन्न राज्यों में मिड-डे मील कार्यक्रम चला रहा है। उनके अनुसार वर्तमान में इस्कॉन 8 राज्यों के 20 से अधिक शहरों में लगभग 12 लाख छात्रों को भोजन उपलब्ध कराता है। उन्होंने कहा कि अभी अंतिम मेन्यू तय नहीं हुआ है, लेकिन इसमें स्थानीय स्वाद का ध्यान रखा जाएगा।
दास ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, 'यह मेरे संज्ञान में आया है कि कुछ लोग कोलकाता में मध्याह्न भोजन के लिए निम्नलिखित प्रस्तावित मेन्यू साझा कर रहे हैं। हालांकि, मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि ऐसे किसी भी मेन्यू को अंतिम रूप नहीं दिया गया है, और यह सूची हमारे द्वारा जारी नहीं की गई है। एक बार मेन्यू को अंतिम रूप देने के बाद हम एक आधिकारिक घोषणा करेंगे। कृपया इस गलत जानकारी को साझा करने से बचें।' एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार दास ने कहा, 'यह कहना गलत है कि केवल अंडा या मांस ही बंगाली भोजन का हिस्सा है। भोजन में चावल, दाल, खिचड़ी, सब्जी, सोया और राजमा जैसी चीजें होंगी, जिनमें पर्याप्त प्रोटीन होता है।'
शिक्षकों और स्कूलों की चिंता
इस योजना को लेकर शिक्षकों और स्कूल प्रबंधन के बीच भी चिंताएँ हैं। महेशतला स्थित नेताजी सुभाष प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक ने बताया कि जिस दिन अंडा दिया जाता था, उस दिन छात्रों की उपस्थिति सबसे अधिक रहती थी। उन्होंने कहा, 'बच्चों को अंडा बहुत पसंद है। मिड-डे मील में अंडा मिलने से स्कूल आने के लिए भी प्रोत्साहन मिलता है।' द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार एक सरकारी शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि यह केवल भोजन बदलने का मामला नहीं बल्कि खान-पान की आदतों को बदलने की कोशिश जैसा दिखाई देता है। उनका कहना है कि कई गरीब परिवारों के बच्चों को घर पर नियमित रूप से अंडा या अन्य प्रोटीनयुक्त भोजन नहीं मिलता, इसलिए स्कूल का अंडा उनके पोषण का महत्वपूर्ण स्रोत है।स्थानीय रसोइयों की नौकरी पर भी खतरा
नई व्यवस्था का एक और पहलू स्थानीय महिलाओं की आजीविका से जुड़ा है। अब तक अधिकांश स्कूलों में स्थानीय महिलाओं को रसोइया के रूप में नियुक्त किया जाता था, जिन्हें हर महीने लगभग 2000 रुपये मानदेय मिलता था। यदि भोजन केंद्रीकृत रसोईघरों से आने लगेगा, तो इन महिलाओं की रोजगार सुरक्षा पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं।
बहरहाल, मिड-डे मील योजना में प्रस्तावित बदलाव ने पश्चिम बंगाल में नई बहस छेड़ दी है। एक ओर सरकार इसे स्वच्छता और पोषण सुधार का कदम बता रही है, वहीं विपक्ष और शिक्षकों का एक वर्ग इसे बंगाल की खानप-पान की संस्कृति और बच्चों के पोषण पर असर डालने वाला फैसला मान रहा है। फिलहाल योजना केवल कोलकाता क्षेत्र तक सीमित है, लेकिन यदि इसे पूरे राज्य में लागू किया गया तो यह आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकता है।