पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट की एसआईआर प्रक्रिया में एडजुडिकेशन यानी जाँच के बाद संदेह दूर होने का दावा किया गया था, लेकिन इससे हालात और उलझने लगे हैं। अंडर एडजुडिकेशन यानी जाँच के अधीन रखे गए हाई कोर्ट के पूर्व जज, बीएलओ से लेकर डॉक्टर, वकील, पुलिसकर्मी तक के नाम काटे जाने की रिपोर्टें आ रही हैं। हाई कोर्ट के पूर्व जज के नाम काटे जाने के मामले में विवाद होने पर भले ही उनका नाम जोड़ दिया गया हो, लेकिन क्या बाक़ी मामलों में ऐसा है? क्या नाम काटे गए लोगों को ट्रिब्यूनल में सुनवाई को मौक़ा मिल रहा है? यदि अब तक ट्रिब्यूनल ही नहीं बना है तो क्या लाखों लोग मतदाता सूची और वोट देने के अधिकार से वंचित नहीं हो जाएँगे?
ये सवाल इसलिए खड़े हो रहे हैं कि राज्य में अंडर एडजुडिकेशन रहे मतदाताओं के बड़े पैमाने पर नाम कटने के मामले सामने आए हैं। राज्य में कुल 60 लाख से ज्यादा मामले ‘अंडर एडजुडिकेशन’ यानी जांच के अधीन थे। 705 न्यायिक अधिकारियों की टीम ने अब तक 37 लाख मामलों का फ़ैसला कर लिया है। दो सप्लीमेंट्री लिस्ट जारी हो चुकी हैं। चुनाव आयोग ने यह साफ़ नहीं किया है कि अब तक कितने नाम हटा दिए गए हैं, लेकिन मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अब तक पूरे राज्य में 15 लाख से ज्यादा नाम हटाए जा चुके हैं। राज्य में सबसे ज़्यादा मुर्शिदाबाद में 11 लाख और मालदा में 8.28 लाख मामले जांच के अधीन थे।
ताज़ा ख़बरें
मालदा और मुर्शिदाबाद जिलों में डॉक्टर, वकील, पुलिस अधिकारी, बीएसएफ जवान, प्रोफेसर और आम किसान-मजदूरों के नाम भी वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं। प्रभावित लोग कह रहे हैं कि वे पीढ़ियों से यहां रह रहे हैं, सबूत दिए फिर भी नाम नहीं जुड़े।

मालदा जिले का मामला

मालदा जिले के कालियाचक ब्लॉक के बहादुरपुर कबीराजतला गांव में बूथ नंबर 3 में 444 नामों की जांच हुई, जिनमें से 327 नाम काट दिए गए। बूथ नंबर 4 में 527 में से 422 नाम हटा दिए गए। द इंडियन एक्सप्रेस ने इन गाँवों में जाकर मतदाता सूची से हटाए गए लोगों की पड़ताल की है।
रिपोर्ट के अनुसार यासीन महालदार मालदा जिला अदालत में 2002 से वकील हैं। उसी साल पिछली बार वोटर लिस्ट की समीक्षा हुई थी। उनके पिता और उनका नाम 2002 की लिस्ट में था। उनका कहना है कि इस बार सुनवाई में उन्होंने वकील आईडी कार्ड, जमीन के कागजात और पढ़ाई के सर्टिफिकेट दिखाए। लेकिन सप्लीमेंट्री लिस्ट आने पर उनका नाम नहीं था। अजीब बात यह कि उनके बेटे का नाम लिस्ट में है।
पश्चिम बंगाल से और ख़बरें
यासीन ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, 'हम यहां पीढ़ियों से रह रहे हैं। अब ट्रिब्यूनल बनने चाहिए थे, लेकिन अभी तक नहीं बने। लिस्ट पब्लिश होने के 15 दिन में अपील करनी है, जिसमें से 7 दिन निकल चुके हैं। लाखों लोगों की अपील इतने कम समय में निपटाना नामुमकिन है। इससे लाखों वाजिब वोटर चुनाव से बाहर हो जाएंगे। यह गैरकानूनी और असंवैधानिक है।'
स्थानीय बाजार में भी ऐसे ही मामले आ रहे रहे हैं। मैनुल महालदार सिलमपुर-1 ग्राम पंचायत के चुने हुए सदस्य हैं। उनके माता-पिता और छह भाइयों सहित उनका नाम भी कट गया। जनवरी में सुनवाई हुई थी, सब दस्तावेज दिए, फिर भी नाम हटा दिए गए। नजमुन नहर खातून भी सिलमपुर-1 पंचायत की सदस्य हैं। उनका नाम 2002 में ‘लिली बीबी’ के रूप में दर्ज था। उन्होंने कोर्ट का एफिडेविट और पंचायत दस्तावेज देकर साबित किया कि दोनों नाम एक ही व्यक्ति के हैं। घर में पांच वोटर थे, सिर्फ उनका नाम कटा, बच्चों के नाम बने रहे। वे कहती हैं, 'गांव में सैकड़ों नाम जानबूझकर काटे गए हैं। पूरा गांव प्रभावित है।'

मुर्शिदाबाद जिले का हाल

मुर्शिदाबाद के सूती विधानसभा क्षेत्र के देबीपुर इलाके में भी यही स्थिति है। बूथ 111 में 591 जाँच वाले मामलों में से 291 नाम कटे। बूथ 112 में 361 में से 207 नाम हटाए गए। यहां एक ही परिवार के दो डॉक्टर, एक वकील, बंगाल पुलिस के असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर, सरकारी कॉलेज के अंग्रेजी के प्रोफेसर और बीएसएफ जवान के नाम भी कट गए।
सर्वाधिक पढ़ी गयी ख़बरें
रिपोर्टों के अनुसार एक फार्मासिस्ट खैरुल आलम कहते हैं, 'मेरे दो भाई और एक बहन डॉक्टर हैं। एक चाइल्ड स्पेशलिस्ट, एक गाइनोकोलॉजिस्ट और एक इंटर्नशिप कर रहा है। उन्होंने डॉक्टर रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट, माध्यमिक एडमिट कार्ड, बर्थ सर्टिफिकेट और 2002 का लिंकेज सब दिया। फिर भी दो डॉक्टरों के नाम कट गए।' उनकी बहन खालेदा खातून मुर्शिदाबाद मेडिकल कॉलेज में गाइनोकोलॉजिस्ट हैं। वह कहती हैं, 'मैंने सब दस्तावेज दिए। अब मैं वोटर नहीं हूं। कोई वजह नहीं बताई गई। मैं ट्रिब्यूनल में चुनौती दूंगी।'

'दादा-परदादा 1952 की वोटर लिस्ट में थे'

सरकारी कॉलेज में अंग्रेजी के प्रोफेसर मोसाब अली बताते हैं, 'हमारे परिवार में 9 वोटर थे, पांच नाम कट गए। इसमें मेरी मां फातिमा बीबी भी हैं, जिनके पास वैध पासपोर्ट है। मेरा भाई जाहिद हुसैन प्रैक्टिसिंग वकील है।' जाहिद कहते हैं, 'मैं जंगीपुर कोर्ट में वकालत करता हूं। अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से संस्कृत में ग्रेजुएशन, बर्धवान से एमए, कश्मीर से बीएड और ओडिशा से एलएलबी किया है। सब सर्टिफिकेट और दस्तावेज दिए। हमारे दादा-परदादा 1952 की वोटर लिस्ट में थे। 1945 का रेजिडेंस डीड भी दिया। फिर भी पांच नाम कट गए।' बूथ 111 के रेजाउल करीम बिरभूम जिले के पनरुई पुलिस स्टेशन में सब-इंस्पेक्टर हैं। वे राज्य सरकार के कर्मचारी हैं। सब दस्तावेज दिए, फिर भी नाम कट गया। बीएसएफ जवान अब्दुल बारी के परिवार में पांच नाम कटे, जिसमें उनका खुद का भी शामिल है।
स्थानीय पंचायत सदस्य सलीम रेजा कहते हैं, 'पिछले तीन महीने हम फॉर्म भरने और सुनवाई में मदद करते रहे। सब दस्तावेज स्थानीय ईआरओ और एईआरओ को दिए। फिर भी इन दो बूथों में 50 प्रतिशत से ज्यादा मामलों में नाम काट दिए गए। यह न सिर्फ गैरकानूनी है, बल्कि सच्चे वोटरों के लिए बहुत अपमानजनक है।'

ट्रिब्यूनल ही नहीं बने तो वोट कैसे देंगे?

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 19 ट्रिब्यूनल बनने थे, जो 23 जिलों को कवर करेंगे, लेकिन अभी तक पूरी तरह सेटअप नहीं हुए। प्रभावित लोग कह रहे हैं कि समय बहुत कम बचा है। नामांकन की आखिरी तारीख नजदीक है, ऐसे में लाखों सच्चे वोटर चुनाव से बाहर हो सकते हैं।
कई गांवों में लोग चुनाव बहिष्कार की बात कर रहे हैं, जब तक इन मामलों की सुनवाई न हो। चुनाव आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया डुप्लिकेट, मृत, स्थानांतरित या संदिग्ध प्रविष्टियों को हटाने के लिए है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग दावा कर रहे हैं कि दस्तावेज देने के बावजूद उनका नाम बिना वजह काटा गया। यह मुद्दा पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले काफी गर्माया हुआ है।