पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटाने के अजीब-अजीब मामले कैसे आ रहे हैं? पूरी पड़ताल के बाद कलकत्ता हाई कोर्ट के जज नियुक्त हुए थे, लेकिन उनका नाम हटा दिया गया। एक बूथ से 340 मुस्लिम मतदाता गायब कर दिए गए। बीएलओ खुद अपना नाम नहीं बचा सका।
बंगाल मतदाता सूची से नाम काटे जाने पर विवाद
मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए जो हो रहा है, आप कल्पना भी नहीं कर सकते! हाईकोर्ट में जिन जजों की नियुक्ति से पहले उनकी पूरी जाँच होती है और कोलेजियम व राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाते हैं, उनको चुनाव आयोग के आम कर्मचारी रिजेक्ट कर रहे हैं। कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व जज शहीदुल्लाह मुंशी का नाम भी वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है। जज बनने से पहले भी उनकी जाँच हुई थी और फिर भी नाम हटाना हैरान करने वाला है। इनके अलावा बशीरहाट नॉर्थ विधानसभा क्षेत्र में एक बूथ से 340 मुस्लिम वोटरों के नाम एक साथ डिलीट कर दिए गए। इनमें उस बूथ का बूथ लेवल ऑफिसर यानी बीएलओ मोहम्मद शफीउल आलम का नाम भी शामिल है।
चुनाव से पहले वोटर लिस्ट की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। चुनाव आयोग ने 23 मार्च को एसआईआर के बाद पहली सप्लीमेंट्री वोटर लिस्ट जारी की। इसमें उन वोटरों के नाम शामिल हैं जिनके मामलों का फ़ैसला न्यायिक अधिकारियों ने किया है। ऐसे मामलों को एडजुडिकेशन यानी जाँच के अधीन रखा गया था और इसकी जाँच न्यायिक अधिकारी कर रहे थे।
पूर्व जज शहीदुल्लाह मुंशी का मामला
पूर्व जस्टिस शहीदुल्लाह मुंशी ने बताया कि उनका नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है। उनकी पत्नी सहाना और बड़े बेटे इफ्तेखार का मामला अभी भी अंडर एडजुडिकेशन है, जबकि छोटे बेटे इब्तेहाज ने नया वोटर बनने के लिए आवेदन किया है। जस्टिस मुंशी ने कहा कि जज बनने से पहले भी उनकी जांच हुई थी और कोलेजियम व राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति हुई थी। फिर भी नाम हटाना हैरान करने वाला है। उन्होंने कहा कि 60 लाख मामलों का फैसला कम समय में करना पड़ा, इसलिए प्रक्रिया 'मैकेनिकल' बनकर रह गई। कोई ध्यान से नहीं देख रहा है।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार पूर्व जज ने कहा, 'अब तक सिर्फ मेरा नाम हटाया गया है। यह बहुत शर्मनाक और दर्दनाक है। बहुत परेशानी हुई। उन्होंने मेरे सारे दस्तावेज ले लिए और कहा कि अपलोड कर देंगे, लेकिन कोई रसीद तक नहीं दी।'
पूर्व जज ने आश्चर्य जताया कि पासपोर्ट समेत सभी जरूरी दस्तावेज जमा करने के बावजूद नाम कैसे हटा दिया गया। उन्होंने कहा कि हमें अंधेरे में रखा गया, अगर बताया होता कि और दस्तावेज चाहिए तो हम दे देते। एक दस्तावेज काफी होना चाहिए था।
वे बोलबाजार क्षेत्र में वोट डालते थे, लेकिन अब एंटली शिफ्ट हो गए हैं। उन्होंने अपील करने के लिए आधिकारिक कारण का इंतजार करने की बात कही। पश्चिम बंगाल में 19 अपीलेट ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं, जहां पूर्व जजों की अध्यक्षता में सुनवाई होगी।
एक बूथ पर बीएलओ सहित 340 मतदाता हटाए
बशीरहाट नॉर्थ विधानसभा क्षेत्र के बड़ो गोबरा गांव में बूथ नंबर 5 से 340 मुस्लिम वोटरों के नाम एक साथ हटा दिए गए। ये सभी वोटर पहले अंडर एडजुडिकेशन में थे। सप्लीमेंट्री लिस्ट में इनके नाम डिलीट कर दिए गए।सबसे हैरानी की बात यह है कि इस बूथ का बीएलओ मोहम्मद शफीउल आलम का नाम भी डिलीट हो गया। इससे स्थानीय लोगों में गुस्सा भड़क गया। सौ से ज्यादा लोग बीएलओ के घर और सड़कों पर प्रदर्शन करने लगे। उन्होंने आरोप लगाया कि मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाकर नाम हटाए गए हैं।
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इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार प्रभावित वोटर काजीरुल मंडल ने कहा कि चुनाव आयोग के लिए 11 में से एक दस्तावेज काफी है, फिर भी कई लोगों ने 3-4 दस्तावेज दिए, लेकिन नाम फिर भी हटा दिए गए। बीएलओ आलम ने बताया कि उन्होंने खुद इन वोटरों को फॉर्म भरने में मदद की और दस्तावेज अपलोड किए, फिर भी नाम हटा दिए गए।
बूथ में कुल 992 वोटर थे। 38 नाम मौत या शिफ्टिंग की वजह से सामान्य रूप से हटाए गए। 358 वोटरों को सुनवाई के लिए बुलाया गया था। इनमें से 18 के मामले ड्राफ्ट लिस्ट में सुलझ गए, लेकिन बाकी 340 को डिलीट कर दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार लोगों ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग पर राजनीतिक दबाव है और यह किसी खास पार्टी के फायदे के लिए किया जा रहा है। बीएलओ आलम ने ट्रिब्यूनल में अपील करने की बात कही है।
कुल कितने नाम हटे? EC चुप
एसआईआर प्रक्रिया में पश्चिम बंगाल में 60 लाख से ज्यादा वोटरों के मामलों की जाँच हो रही थी। कुछ रिपोर्टों में कुल डिलीशन की संख्या 13 लाख, 8 लाख या 14 लाख बताई जा रही है, लेकिन चुनाव आयोग अब तक साफ आंकड़े नहीं दे रहा है।विवाद क्यों बढ़ रहा है?
- पूर्व हाई कोर्ट जज जैसे सम्मानित व्यक्ति का नाम हटना लोगों को चौंका रहा है।
- एक बूथ से इतने सारे मुस्लिम वोटरों का नाम एक साथ हटना और बीएलओ का नाम शामिल होना संदेह बढ़ा रहा है।
- दस्तावेज देने के बावजूद रसीद न मिलने और कारण न बताने की शिकायत।
- विपक्ष और प्रभावित लोग कह रहे हैं कि यह वोटरों को बाहर करने की साजिश है।
चुनाव आयोग ने कहा है कि एसआईआर का मक़सद फर्जी, डुप्लिकेट और मृत वोटरों को हटाकर लिस्ट साफ करना है। लेकिन इस प्रक्रिया में गलतियां हो रही हैं या जानबूझकर किया जा रहा है, इस पर बहस तेज हो गई है। पूर्व जज मुंशी और बशीरहाट के प्रभावित वोटर अब अपीलेट ट्रिब्यूनल में अपनी बात रखेंगे। देखना होगा कि इन मामलों में क्या फैसला होता है और चुनाव से पहले वोटर लिस्ट में कितने बदलाव होते हैं।