चुनाव आयोग (ECI) ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) कराया, जिसे अभूतपूर्व बताया गया। लेकिन अंतिम सूची जारी होते ही यह स्पष्ट हो गया कि यहाँ केवल डेटा नहीं, बल्कि उसके चारों ओर एक मजबूत दीवार भी खड़ी की गई है। ताकि जनता या कोई एजेंसी इसकी आगे कोई छानबीन न कर सके।
मतदाता सूची को मशीन-पठनीय प्रारूप (जैसे CSV या Excel) में जारी करने के बजाय स्कैन की गई PDF इमेज के रूप में अपलोड किया गया। ये फाइलें न तो सर्च की जा सकती थीं और न ही इन पर कोई सार्थक विश्लेषण संभव था। पेज का डिज़ाइन भी ऐसा रखा गया कि स्वचालित रूप से डेटा निकालना लगभग असंभव हो जाए। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब भारत Aadhaar और UPI जैसी उन्नत डिजिटल प्रणालियाँ चला सकता है, तो चुनावी डेटा को इस तरह अनुपयोगी क्यों बनाया गया। खासतौर पर ऐसे राज्य में, जहाँ राजनीतिक तनाव पहले से ही उच्च स्तर पर है।
SIR को लेकर पश्चिम बंगाल में भारी विवाद चल रहा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कई विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि कुछ विशेष समुदायों के मतदाताओं को निशाना बनाकर सूची से हटाया जा रहा है या संदिग्ध बनाया जा रहा है। मालदा में जनता ने न्यायिक अधिकारियों का गुस्से में घेराव किया तो इसे कानून व्यवस्था बिगड़ने का नाम दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार पर टिप्पणियां कीं। जबकि पूरी शासन व्यवस्था इस समय चुनाव आयोग के मातहत काम कर रही है। चुनाव ने थानेदार से लेकर डीजीपी तक बदल डाला है।
यह विवाद चुनाव आयोग तक पहुँच गया। 13 मार्च 2026 को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ पक्षपात के आरोप में महाभियोग प्रस्ताव पेश किया गया। उनकी नियुक्ति पहले से ही विवादों में रही थी, क्योंकि नए कानून के तहत चयन समिति में मुख्य न्यायाधीश के स्थान पर एक कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया था।
ऐसे माहौल में डेटा को गैर-उपयोगी प्रारूप में जारी करना पारदर्शिता को लेकर संदेह को और गहरा कर रहा है।
चुनावी प्रक्रिया में नई और विवादास्पद श्रेणी
इस पुनरीक्षण की सबसे विवादास्पद शर्त यह थी कि हर मतदाता को 2002 की मतदाता सूची से सीधे या पारिवारिक संबंध के आधार पर जोड़ा जाना अनिवार्य किया गया। मतदाताओं को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया:
  • मैप्ड (Mapped)
  • अनमैप्ड (Unmapped)
  • तार्किक विसंगति (Logical Discrepancy)
सैद्धांतिक रूप से “तार्किक विसंगति” का उद्देश्य नाम, उम्र या संबंधों में असंगतियों की पहचान करना था। लेकिन व्यवहार में यह श्रेणी अक्सर मामूली वर्तनी अंतर जैसे “मोहम्मद” बनाम “मुहम्मद” या “मंडल” की स्पेलिंग में फर्क के आधार पर लागू की गई। ऐसी विसंगति वाले मतदाताओं को भी अवांछित घोषित कर दिया गया। पुराने रिकॉर्ड की खराब स्कैनिंग ने डिजिटल मिलान को और कठिन बना दिया। 
इस तरह लगभग 1.36 करोड़ मतदाताओं को इस श्रेणी में डाल दिया गया। इनका नाम सूची से हटाया नहीं गया, लेकिन इनके मतदान अधिकार निलंबित कर दिए गए और इन्हें “विचाराधीन” (Under Adjudication) की स्थिति में रखा गया। इस प्रक्रिया के लिए कोई स्पष्ट समयसीमा भी तय नहीं की गई, जबकि चुनाव की घोषणा हो चुकी थी।
मामले की गंभीरता को देखते हुए भारत के सुप्रीम कोर्ट को कई बार हस्तक्षेप करना पड़ा। 20 फरवरी 2026 को अदालत ने अनुच्छेद 142 के तहत झारखंड और ओडिशा से न्यायिक अधिकारियों की सहायता ली। इसके बावजूद, लाखों मामलों के निपटारे के बाद भी बड़ी संख्या में नाम पूरक सूची में शामिल नहीं हो पाए।
1952 के बाद अब तक SIR 13 बार हो चुका है, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर “तार्किक विसंगति” के आधार पर मताधिकार निलंबन का यह पहला मामला है, वह भी बिना स्पष्ट सार्वजनिक स्पष्टीकरण के।

डेटा के चारों ओर बनाई गई बाधाएँ

  • जब ऑल्ट न्यूज़ ने कोलकाता के भवानीपुर और बालीगंज विधानसभा क्षेत्रों की मतदाता सूची का विश्लेषण शुरू किया, तो कई स्तरों पर कठिनाइयाँ सामने आईं:
  • सीमित पहुँच: वेबसाइट पर एक बार में सीमित क्षेत्र ही डाउनलोड किए जा सकते थे, साथ ही CAPTCHA जैसी बाधाएँ थीं।
  • अनुपयोगी प्रारूप: डेटा स्कैन की गई PDF इमेज में था, जो मशीन-पठनीय फाइलों की तुलना में बेहद भारी और विश्लेषण के लिए अनुपयुक्त था।
  • अतिरिक्त रुकावट: हर कुछ प्रविष्टियों पर “UNDER ADJUDICATION” का वॉटरमार्क लगाया गया था, जिससे टेक्स्ट पढ़ना और कठिन हो जाता था।
चुनाव आयोग का तर्क है कि मशीन-पठनीय डेटा से डेटा माइनिंग, गोपनीयता उल्लंघन और छेड़छाड़ की आशंका बढ़ती है। लेकिन सवाल यह है कि जब यही डेटा आंतरिक रूप से संरचित रूप में उपलब्ध है, तो जनता को इससे वंचित क्यों रखा जाए?ो
ऑल्ट न्यूज़ की टीम ने तकनीकी और मैन्युअल दोनों तरीकों से इन बाधाओं को पार किया।
  • सैकड़ों PDF फाइलों को डिजिटाइज़ किया गया
  • दो अलग-अलग OCR तकनीकों का उपयोग कर डेटा निकाला और सत्यापन किया गया
  • नामों के आधार पर धार्मिक पहचान का विश्लेषण किया गया, जिसमें कॉन्फिडेंस स्कोर शामिल थे
  • पूरी डेटासेट को एक सार्वजनिक इंटरैक्टिव प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराया गया
इस पूरी प्रक्रिया में लागत बेहद कम रही, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि पारदर्शिता के रास्ते में तकनीकी बाधाएँ उतनी बड़ी नहीं थीं, जितनी बताई जा रही थीं।

उठते सवाल और लोकतंत्र की परीक्षा

दो विधानसभा क्षेत्रों के विश्लेषण में पाया गया कि एक बड़ी संख्या में मतदाता “विचाराधीन” श्रेणी में थे। इनमें मुस्लिम समुदाय का अनुपात उनके कुल मतदाता प्रतिशत की तुलना में काफी अधिक था, जिससे प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं। यह विश्लेषण किसी निष्कर्ष को थोपने के लिए नहीं, बल्कि सार्वजनिक जांच और बहस को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से किया गया है। पूरी डेटासेट को सार्वजनिक किया गया है ताकि कोई भी स्वतंत्र रूप से इसकी पुष्टि कर सके।
चुनाव आयोग की जिम्मेदारी चुनाव की निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। जब डेटा को जानबूझकर जटिल और अनुपयोगी बना दिया जाता है, तो इससे लोकतंत्र में नागरिकों का विश्वास कमजोर पड़ता है।