चुनाव आयोग को 800 लोगों को 'ट्रबल मेकर' बताने वाले मामले के बाद अब वोटिंग के दिन बाइक चलाने पर रोक लगाने वाले आदेश पर कोलकाता हाई कोर्ट ने झटका दिया है। अदालत ने शुक्रवार को कहा कि चुनाव आयोग यानी ECI पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान बाइक चलाने पर पूरी तरह से रोक नहीं लगा सकता है। अदालत ने कहा कि फ्री और फेयर चुनाव के नाम पर लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर इस तरह का सख्त प्रतिबंध ठीक नहीं है। जस्टिस कृष्णा राव की एकलपीठ ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के अधीन चुनाव आयोग द्वारा लगाए गए कुछ प्रतिबंधों को बदल दिया।

क्या था चुनाव आयोग का आदेश?

20 अप्रैल को मुख्य निर्वाचन अधिकारी यानी CEO ने आदेश जारी किया था-
  • मतदान से दो दिन पहले से वोटिंग के दिन तक शाम 6 बजे से सुबह 6 बजे तक बाइक चलाना पूरी तरह बंद रहेगा।
  • सिर्फ मेडिकल इमरजेंसी या फैमिली फंक्शन में छूट रहोगी।
  • दिन में भी पिलियन राइडिंग यानी दूसरे व्यक्ति को पीछे बिठाकर चलाने पर रोक रहेगी।
  • यह आदेश पहले चरण के मतदान यानी 23 अप्रैल से पहले लागू किया गया था।
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हाई कोर्ट ने क्या कहा?

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार हाई कोर्ट ने साफ कहा, "फ्री और फेयर चुनाव के नाम पर अथॉरिटी बाइक चलाने पर पूरी रोक नहीं लगा सकती। कोर्ट को समझ नहीं आ रहा कि चुनाव आयोग ने वोटिंग के दिन से दो दिन पहले से ही बाइक चलाने पर इतना सख्त प्रतिबंध क्यों लगाया।" कोर्ट ने कहा कि बाइक रैली पर रोक लगाना ठीक है, क्योंकि इससे हिंसा रुक सकती है। लेकिन आम लोगों को बाइक चलाने से रोकना गलत है।

कोर्ट ने अब क्या-क्या इजाजत दी?

कोर्ट ने चुनाव आयोग के आदेश को कुछ बदलावों के साथ मंजूर किया-
  • मतदान से दो दिन पहले से बाइक रैली पूरी तरह बंद रहेगी।
  • मतदान से 12 घंटे पहले पिलियन राइडिंग नहीं होगी, सिवाय मेडिकल इमरजेंसी, फैमिली फंक्शन या स्कूल के बच्चों को छोड़ने/लेने जैसी जरूरी जरूरतों के।
  • मतदान के दिन वोट डालने, मेडिकल इमरजेंसी या फैमिली फंक्शन के लिए सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक फैमिली पिलियन राइडिंग की इजाजत होगी।
  • ओला, उबर, जोमैटो, स्विगी जैसी डिलीवरी सर्विस और ऑफिस जाने वाले लोगों को प्रॉपर आईडी दिखाने पर छूट रहेगी।

किसने याचिका दायर की थी?

वकील रितंकर दास ने याचिका दायर की थी। उन्होंने कहा कि वे रोज हाई कोर्ट आते हैं और टैक्सी या कार का खर्च नहीं उठा सकते। बाइक उनका मुख्य साधन है। शाम 8 बजे के बाद भी काम होता है, इसलिए यह प्रतिबंध उनके पेशे और आजीविका पर असर डालता है। पुलिस से छूट मांगना भी व्यावहारिक नहीं है।

कोर्ट ने माना कि इस तरह का प्रतिबंध मौजूदा कानून के मुताबिक नहीं है। चुनाव आयोग को अनुच्छेद 324(1) के तहत चुनाव कराने का अधिकार है, लेकिन उसे भी कानून और नियमों का पालन करना पड़ता है।

कोर्ट ने कहा कि पहले से ही पैरा मिलिट्री फोर्स और लोकल पुलिस तैनात हैं। वाहनों की चेकिंग की व्यवस्था भी है। इसलिए बाइक पर पूरी रोक लगाने की जरूरत नहीं थी।

यह फैसला पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान लोगों की सुविधा और आजीविका का अधिकार को ध्यान में रखते हुए आया है। कोर्ट ने साफ़ किया कि चुनाव शांतिपूर्ण हो, लेकिन आम जनता को अनावश्यक परेशानी नहीं होनी चाहिए। दूसरे चरण के मतदान से पहले यह फैसला काफी अहम माना जा रहा है।
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800 को 'ट्रबल मेकर' बताने वाले आदेश पर रोक

दो दिन पहले ही पहले चरण के चुनाव से पहले चुनाव आयोग की 'मनमानी' को कलकता हाई कोर्ट ने बड़ा झटका दिया था। इसने 'परेशान करने वाला' यानी trouble-maker बताने वाले चुनाव आयोग के एक विवादित आदेश पर रोक लगा दी थी। हाईकोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग किसी भी व्यक्ति को सिर्फ ट्रबल मेकर कहकर आम आदेश नहीं जारी कर सकता। यह क़ानून के ख़िलाफ़ है।

बहरहाल, ताज़ा मामला 21 अप्रैल को पश्चिम बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी के ऑफिस से जारी एक मेमो से जुड़ा है। इसमें क़रीब 800 लोगों की लिस्ट थी और उन्हें 'परेशान करने वाले' यानी ट्रबल मेकर बताया गया था। मेमो में कहा गया था कि ये लोग मतदाताओं को डराते-धमकाते हैं और चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी करते हैं। इस लिस्ट में स्थानीय पार्षद, पंचायत सदस्य, विधायक और सांसद जैसे चुने हुए प्रतिनिधि भी शामिल थे। मेमो में पुलिस को इन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था।

हाईकोर्ट का फ़ैसला

मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल और न्यायाधीश पार्थ सारथी सेन की डिवीजन बेंच ने इस मेमो पर अंतरिम रोक लगा दी। कोर्ट ने कहा, 'हमारी प्रथम दृष्टया राय है कि मुख्य चुनाव अधिकारी के ऑफिस में तैनात पुलिस ऑब्जर्वर ने गलती की है। वे किसी भी नागरिक को आँख बंद करके 'परेशान करने वाला' घोषित नहीं कर सकते।' कोर्ट ने आदेश दिया कि 21 अप्रैल वाला मेमो जून 2026 के आखिरी दिन तक या कोर्ट के अगले आदेश तक प्रभावी नहीं रहेगा।
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कोर्ट ने क्या कहा

कोर्ट ने कहा कि यह एक बड़ा संवैधानिक सवाल है, 'क्या अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग चुनाव अपराधों के लिए बने कानून के बावजूद आम निर्देश जारी कर सकता है?' कोर्ट ने कहा कि अगर कानून में कोई काम किसी खास तरीके से करने को कहा गया है, तो उसे उसी तरीके से करना होगा। अन्य तरीके नहीं अपनाए जा सकते।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के सत्येंद्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई मामले का हवाला दिया और कहा कि गिरफ्तारी कोई रूटीन काम नहीं है। यह कानूनी विवेक पर निर्भर करती है। कोर्ट ने साफ़ किया कि अनुच्छेद 21 और 22 के तहत किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता केवल क़ानून द्वारा तय प्रक्रिया से ही रोकी जा सकती है।

हाईकोर्ट ने साफ़ कहा कि यह अंतरिम आदेश किसी भी व्यक्ति के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई नहीं रोकता है। अगर लिस्ट में नाम वाले व्यक्ति कोई अपराध करते हैं तो पुलिस या प्रशासन अपने विवेक से कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि कोई भी निवारक हिरासत केवल संबंधित कानून के अनुसार ही की जा सकती है। चुनाव आयोग को चार हफ्ते में अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने को कहा गया है। इस मामले की अगली सुनवाई पांच हफ्ते बाद होगी।