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तृणमूल को रोकने के लिए बीजेपी से हाथ मिला रही है सीपीएम?

पश्चिम बंगाल में करारी हार के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) अपना वजूद बचाने के लिए क्या भारतीय जनता पार्टी से हाथ मिला रही है? दोनों पार्टियाँ बिल्कुल विपरीत ध्रुवों पर हैं और एक-दूसरे को फूटी आँखों नहीं देख सकती हैं। यह भेद व्यक्तिगत नहीं, वैचारिक और सैद्धान्तिक है। सैद्धांतिक लड़ाई सांप्रदायिकता के मुद्दे तक सीमित नहीं है, आर्थिक नीति, विदेश नीति, सामाजिक मूल्य जैसे तमाम क्षेत्रों में है। उनके बीच कोई समानता नहीं है। संसद के बाहर और भीतर दोनो एक दूसरे के ख़िलाफ़ रहे हैं और दोनों ने एक दूसरे के ख़िलाफ़ मुहिम चलाई है। फिर दोनों एक-दूसरे से हाथ मिला रही हैं, यह कोई सोच कैसे सकता है?

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पर राजनीति के बारे में पुरानी कहावत है कि यह संभावनाओं का खेल है, यानी यहाँ कुछ भी असंभव नहीं है। यह भी कहा जाता है कि राजनीति में अनजान लोग एक साथ सोते हैं। ऐसे में सीपीएम-बीजेपी जैसी अनजान ताक़तों के एक साथ आने पर कोई ताज्जुब की बात नहीं है।

CPIM joining hands with BJP to stop BJP? - Satya Hindi
इसका उदाहरण पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद हुई हिंसा और एक-दूसरे के पार्टी कार्यालयों पर कब्जा करने की होड़ हैं। कई जगहों से ऐसी ख़बरे आ रही हैं कि सीपीएम और बीजेपी ने मिल कर तृणमूल कांग्रेस के स्थानीय दफ़्तर पर कब्जा कर लिया और उसके लोगों को मारपीट कर भगा दिया।
बांग्ला भाषा की वेबसाइट ‘द वॉल’ के मुताबिक़, चुनाव नतीजे के अगले ही दिन सीपीएम ने तृणमूल के 169 दफ़्तरों पर कब्जा कर लिया। यह पूरे राज्य में अलग-अलग जगहों पर हुआ है। दक्षिण बंगाल के कूचबिहार ज़िले में दीनहाटा और भेटागुड़ी में सीपीएम ने तृणमूल के कार्यालय पर कब्जा कर लिया। बर्द्धवान के देवानदिघी, हुगली के महेश और गोघाट में ऐसा हुआ तो उत्तर 24 परगना ज़िले के दत्तपुकुर में भी ऐसा ही हुआ। बर्द्धवान के आरामबाग में भी तृणमूल के ऑफ़िस पर सीपीएम का कब्जा हो गया।

क्या है तरीका?

रिपोर्टों के मुताबिक, चुनाव नतीजों के ऐलान होने के बाद ही जिन जगहों पर बीजेपी की जीत हुई, वहाँ तृणमूल कांग्रेस के समर्थक दफ़्तर छोड़ कर भाग गए, क्योंकि पहले बीजेपी काडर के साथ उनकी मारपीट की वारदात हो चुकी थी। वे डरे हुए थे और बदला लेने के लिए होने वाले हमले से सहमे हुए थे। सीपीएम के काडर उन दफ़्तरों पर पहुँचे और तृणमुल के झंडे वगैरह हटा कर अपनी पार्टी के झंडे फहरा दिए। उन्हें बीजेपी का समर्थन हासिल था और बीजेपी के लोगों ने कह रखा था कि वे ऐसा कर सकते हैं। लेकिन यह भी सच है कि इस तरह के ज़्यादातर दफ़्तर वैसे थे, जो पहले सीपीएम के थे और पिछले विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल के लोगों ने उन पर कब्जा कर लिया था। 
दरअसल होता यह है कि ज़्यादातर मामलों में ये दफ़्तर ग़ैरक़ानूनी तरीके से कब्जा किए हुए ज़मीन पर बनाए जाते हैं। इनका कोई वैध काग़ज़ नहीं होता है। इसलिए उस पर जिस पार्टी का नियंत्रण होता है, वह उसी का होता है।

सीपीएम के वोट बीजेपी को?

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सीपीएम और बीजेपी एक दूसरे का साथ दे सकते हैं। इसके लिए इस बार के चुनाव के नतीजों पर एक नज़र डालना होगा। 2014 के लोकसभा चुनाव में सीपीएम का वोट शेयर 29 प्रतिशत और बीजेपी का 17 प्रतिशत था। इस बार के चुनाव में सीपीएम का वोट शेयर 7 प्रतिशत पर आ गिरा तो बीजेपी का बढ़ कर 40 प्रतिशत हो गया। तृणमूल का वोट शेयर 45 प्रतिशत के पास रहा। यानी सीपीएम को जो नुक़सान हुआ, वही बीजेपी का लाभ हुआ।
इसका क्या यह अर्थ है कि सीपीएम के वोटरों के एक बड़े हिस्से ने बीजेपी को वोट दिया? यह कहना मुश्किल है क्योंकि राजनीति बिल्कुल अंक गणित ही नहीं होती। लेकिन बीजेपी के लोगों ने सीपीएम को वोट दिया होगा, इसके दूसरे तर्क हैं। यह माना जाता है कि सरकारी विरोधी वोट इस बार बीजेपी को मिले क्योंकि लोगों को लगा कि वही तृणमूल का सामना कर सकती है। मुख्य विपक्षी दल सीपीएम नहीं रही, बीजेपी हो गई।

इसे मतदान के पैटर्न से भी समझा जा सकता है। बीजेपी उत्तर बंगाल के रायगंज और मालदह उत्तर के सीमावर्ती इलाक़ों ही नहीं, मेदिनीपुर और पुरुलिया जैसे वाम किलों में भी सेंध लगाने में कामयाब रही है।

वोटिंग पैटर्न के संकेत

मालदह उत्तर और रायगंज के सीमाई इलाक़ों में बांग्लादेश से आए लोगों की तादाद अधिक होने और मुसलिम आबादी की वजह से ध्रुवीकरण हुआ, जिसका फ़ायदा भगवा पार्टी को मिला, यह बात समझ में आती है। लेकिन मेदिनीपुर, पुरुलिया और तमलुक में बीजेपी की बढ़त नए समीकरण की ओर इशारा करता है। ये तीनों ही जगह सीपीएम का गढ़ रहे हैं, जहाँ उस पार्टी ने 1977 के बाद से लगातार जीत हासिल की है। इन इलाक़ों में सीपीएम एक बेहद मजबूत संगठन के रूप में जानी जाती रही है और उसकी गज़ब की पकड़ रही है। कोलकाता के नज़दीक उलबेड़िया और बशीरहाट में बीजेपी उम्मीदवारों की बढ़त से यह तो साफ़ है कि यह वोट सिर्फ़ ध्रुवीकरण का नतीजा नहीं है। ये वे इलाक़े हैं, जहाँ मजदूरों की सघन आबादी है, जहाँ तृणमूल कांग्रेस का कोई आधार हाल फिलहाल तक नहीं रहा है।
ऐसे में यदि दोनों पार्टियों के लोगों ने मिल कर तृणमूल के ऑफ़िस पर कब्जा कर लिया तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

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