पश्चिम बंगाल सरकार ने आखिरकार नया वक्फ संशोधन क़ानून स्वीकार कर लिया। महीनों तक केंद्र से टकराव और राजनीतिक तनाव के बाद ममता बनर्जी के झुकने की क्या वजह रही? विधानसभा चुनाव, कानून का असर, राजनीतिक दांव या कुछ और?
महीनों तक केंद्र के नए वक़्फ़ संशोधन अधिनियम को लागू नहीं करने की ज़िद पर अड़ी पश्चिम बंगाल की ममता सरकार ने आखिरकार घुटने टेक दिए! राज्य सरकार ने सभी जिला मजिस्ट्रेटों को सख्त निर्देश जारी कर दिया कि राज्य की क़रीब 82000 वक्फ संपत्तियों की पूरी जानकारी 5 दिसंबर 2025 तक केंद्र के पोर्टल umeedminority.gov.in पर अनिवार्य रूप से अपलोड कर दिया जाए। 5 दिसंबर तक इसे अपलोड करना ज़रूरी है और ममता को अदालत से भी राहत नहीं मिली है। वैसे, ममता सरकार का यह फ़ैसला तब आया है जब पश्चिम बंगाल में अगले कुछ महीनों में ही चुनाव होने हैं। तो क्या यह चुनाव के मद्देनज़र फ़ैसला लिया गया है? आख़िर इसके मायने क्या हैं?
इन सवालों के जवाब जानने से पहले यह जान लें कि वक़्फ़ क़ानून को लेकर ममता बनर्जी का क्या रवैया रहा है और बीजेपी ने इसपर कैसी प्रतिक्रिया दी है। वक़्फ़ क़ानून पर बंगाल सरकार के इस ताज़ा फ़ैसले को राजनीतिक हलकों में बेहद अहम माना जा रहा है क्योंकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुद अप्रैल महीने में सार्वजनिक रूप से ऐलान किया था कि 'बंगाल में वक्फ संशोधन कानून कभी लागू नहीं होने दूंगी।'
अप्रैल में ममता ने दी थी खुली चुनौती
9 अप्रैल 2025 को जैन समुदाय के एक कार्यक्रम में ममता बनर्जी ने कहा था, 'मैं बंगाल में वक्फ संशोधन कानून लागू नहीं होने दूंगी। ये लोग बाँटो और राज करो की नीति चला रहे हैं। यहाँ 33 प्रतिशत मुसलमान सदियों से रह रहे हैं। उनकी रक्षा करना मेरा फर्ज है।'
क़ानून पारित होने के बाद राज्य में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे। तृणमूल कांग्रेस ने केंद्र के खिलाफ कोर्ट भी गई थी, लेकिन राहत नहीं मिली।
अब क्या बदला?
कानून की धारा 3बी में साफ़ लिखा है कि देश भर की पंजीकृत सभी वक्फ संपत्तियों का डेटा छह महीने के अंदर यानी यानी 5 दिसंबर 2025 तक केंद्र के पोर्टल पर अपलोड करना अनिवार्य है। कानून में यह भी प्रावधान है कि अब वक्फ बोर्ड और ट्रिब्यूनल में गैर-मुस्लिम सदस्य होंगे तथा यदि कोई संपत्ति वक्फ होने का दावा करती है तो अंतिम फैसला सरकार लेगी। नये वक्फ क़ानून के प्रावधानों से सबसे ज्यादा नाराजगी तृणमूल और मुस्लिम संगठनों में थी। लेकिन कानूनी दबाव और समय सीमा खत्म होने के बीच राज्य सरकार को झुकना पड़ा।
बहरहाल, द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार गुरुवार को अल्पसंख्यक विकास एवं मदरसा शिक्षा विभाग के सचिव पी.बी. सलीम ने सभी डीएम को पत्र भेजकर आठ बिंदुओं वाली कार्ययोजना दी है।
राज्य में 8000 से ज्यादा वक्फ एस्टेट
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक पश्चिम बंगाल में 8200 से ज्यादा पंजीकृत वक्फ एस्टेट हैं और कुल वक्फ संपत्तियों की संख्या 82000 के आसपास है। इनमें मस्जिदें, मदरसे, कब्रिस्तान, ईदगाह और दुकानें, बाजार, जमीनें आदि शामिल हैं।पश्चिम बंगाल से और ख़बरें
बीजेपी ने क्या कहा?
बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने कहा है, 'महीनों तक मुस्लिम समुदाय को वक्फ अमेंडमेंट एक्ट का विरोध करने के लिए उकसाने के बाद, ममता बनर्जी आखिरकार कानून के आगे झुक गई हैं। सात महीने बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने वक्फ अमेंडमेंट एक्ट, 2025 को मान लिया है। सभी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को अब हर वक्फ प्रॉपर्टी की डिटेल्स सेंट्रल UMEED पोर्टल पर अपलोड करने का निर्देश दिया गया है। यह निर्देश माइनॉरिटी अफेयर्स और मदरसा एजुकेशन डिपार्टमेंट के सेक्रेटरी पीबी सलीम ने सभी डीएम को लिखे एक लेटर में दिया है। यानी पश्चिम बंगाल को देश के कानून और संविधान के हिसाब से चलना होगा, न कि ममता बनर्जी की रुकावट डालने की पॉलिटिक्स के हिसाब से।'बीजेपी राज्य अध्यक्ष सुकांत मजूमदार ने कहा, 'ममता बनर्जी ने महीनों तक ड्रामा किया, मुसलमानों को डराया, लेकिन कानून के सामने झुकना पड़ा। यह केंद्र सरकार की जीत है।'
तृणमूल के सामने अब क्या समस्या?
तृणमूल कांग्रेस ने अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन माना जा रहा है कि कानूनी मजबूरी और कोर्ट में हार के बाद यह कदम उठाना पड़ा। 5 दिसंबर 2025 तक केंद्र के पोर्टल पर इसको अपलोड करना अनिवार्य है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसमें राजनीतिक वजहें भी हैं।माना जा रहा है कि ममता बनर्जी मुस्लिमों को नाराज़ नहीं करना चाहती थीं और इसलिए वह इस क़ानून का विरोध कर रही थीं। लेकिन अब ममता के फ़ैसले के बाद यह कयास लगाया जा रहा है कि बहुसंख्यक हिंदुओं को भी साधे बिना क्या ममता चुनाव में जीत दर्ज कर पाएँगी? कुछ तो कयास ये भी लगा रहे हैं कि कहीं टीएमसी को हिंदू वोटों के खिसकने का डर तो नहीं सता रहा है?
हालाँकि, राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग ऐसा भी है जो मानता है कि 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले ममता बनर्जी मुस्लिम वोट बैंक में किसी भी तरह की नाराजगी नहीं चाहती थीं, लेकिन केंद्र के सख्त रुख, अदालत से निराशा हाथ लगने और समय सीमा खत्म होने की वजह से उन्हें पीछे हटना पड़ा।