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कोलकाता पुलिस ने जिस कंपनी पर छापा मारा, उसके तार नागेश्वर राव से जुड़े हैं?

कोलकाता पुलिस ने एंजेला मर्केंटाइल प्राइवेट लिमिटेड नाम की एक संदिग्ध कंपनी पर 8 फ़रवरी को फिर छापेमारी की। तीन हफ़्ते पहले भी कोलकाता पुलिस ने इस कंपनी पर छापे डाले थे। लेकिन इस कंपनी पर छापे का क्या कोई रिश्ता कोलकाता में हुई उस महाभारत से है, जब सीबीआई की भारी-भरकम टीम कोलकाता के पुलिस कमिश्नर को 'दबोचने' पहुँच गई थी? क्या इस कंपनी के तार किसी तरह से, कहीं से सीबीआई के पूर्व अंतरिम निदेशक नागेश्वर राव से भी जुड़ते है? कहीं तीन हफ़्ते पहले इस कंपनी पर पड़े छापे की खीझ उतारने के लिए ही तो नागेश्वर राव ने अपने कार्यकाल के आख़िरी दिन राजीव कुमार को 'सबक़' सिखाने के लिए अपनी टीम कोलकाता नहीं भेजी थी? उनका यह 'ऑपरेशन' तो सफल नहीं हो सका, लेकिन देश भर में इस पर बड़ा राजनीतिक हंगामा खड़ा हो गया, ममता बनर्जी धरने पर बैठ गई थीं, विपक्ष का बहुत बड़ा धड़ा एकजुट हो गया था।

मामला क्या है?

इस विवाद की जड़ में क्या यही कंपनी है? इस कंपनी पर बीते बरस ईडी और इनकम टैक्स ने भी छापा मारा था। इन छापों के दौरान कोलकाता पुलिस ने इन एजेंसियों को सुरक्षा कवच प्रदान किया था। उसके बाद बहूबाज़ार थाने में दर्ज एक मामले में कोलकाता पुलिस ने ख़ुद भी इस कंपनी पर तीन हफ़्ते पहले छापेमारी की थी।

इस कंपनी का परिचय इस तथ्य से मिलाकर पढ़ना प्रासंगिक होगा कि इसने नागेश्वर राव की पत्नी एम. संध्या को गुंटूर ज़िले में एक भूखंड ख़रीदने के लिये 25 लाख रुपये का कर्ज दिया था। नागेश्वर राव की पत्नी संध्या ने इस कंपनी को 'इन्वेस्टमेंट' के नाम पर 60 लाख रुपये दिये थे।  कोलकाता पुलिस का कहना है कि संध्या इस कंपनी से वेतन भी लेती रही थीं। ख़ुद नागेश्वर राव ने 30 अक्तूबर 2018 को एक प्रेस नोट जारी कर इस मामले में सफ़ाई दी थी।

राव ने अपने प्रेस नोट में कहा था कि एंजेला मर्केंटाइल का स्वामित्व प्रवीण अग्रवाल नाम के व्यक्ति के पास है। अग्रवाल उनके बहुत पुराने पारिवारिक मित्र हैं। गुंटूर में उनकी पत्नी संध्या ने अपने रिश्ते के भाई डॉ. के. रत्ना बाबू के साथ मिल कर 2010 में एक प्रापर्टी ख़रीदी और इसके लिए संध्या ने एंजेला मर्केंटाइल से 25 लाख रुपये उधार लिये। राव के मुताबिक़ 2011 में संध्या ने अपनी 11.17 एकड़ की पुश्तैनी ज़मीन बेची, जिसके एवज़ में उन्हें 58.62 लाख रुपये मिले। इसमें संध्या ने अपनी बचत के 1.38 लाख रुपये और मिला कर कुल 60 लाख रुपये एंजेला मर्केंटाइल को दे दिये। राव का कहना है कि इस रक़म में से एंजेला मर्केंटाइल ने 25 लाख का अपना उधार काट कर बाक़ी के 35 लाख संध्या के इन्वेस्टमेंट के तौर पर रख लिये और 2014 में कंपनी ने इस रक़म में 6,33,165 रुपये का ब्याज जोड़ कर संध्या को 41,33,165 रुपये लौटा दिये। राव का कहना है कि यह सब जानकारी सरकार के रिकॉर्ड में है और इसमें कुछ भी गड़बड़ नहीं है। 
एंजेला मर्केंटाइल पर की गई छापेमारी में बाक़ी दूसरे लेनदेन के साथ संध्या के इस लेनदेन की जाँच भी शामिल थी। बताया जाता है कि रजिस्ट्र्रार आफ कंपनीज इस कंपनी को बेनामी कंपनी समझ कर जाँच कर रहा है।

इस कंपनी पर नोटबंदी के तुरंत बाद बहुत बड़ी मात्रा में पुराने नोट्स की अदल-बदल के आरोप भी हैं।ऐसा संभव है कि राजनीतिक आक़ाओं की  आकांक्षाओं को सहलाने के नाम पर निजी खुंदक निबटाने का एडवेंचर उल्टा पड़ गया हो? राव को एंजेला मर्केंटाइल पर छापों के मामले में कोलकाता पुलिस की भूमिका पर पूरा शक था।

नागेश्वर राव अब सीबीआई के अंतरिम निदेशक नहीं हैं, वह वापस अतिरिक्त निदेशक रह गए हैं।सीबीआई समेत देश की ख़ुफ़िया और वित्तीय ख़ुफ़िया सेवाओं के वरिष्ठ लोगों के अंतरंग व्हाट्सऐप ग्रुप में पूछा जा रहा है कि जिस अफ़सर ने ज्वाइंट डायरेक्टर सीबीआई (चेन्नई ज़ोन) रहते हुए एचटीएल लिमिटेड की 400 करोड़ रुपये से ज्यादा क़ीमत की जमीन वीजीएन डेवलपर्स ग्रुप को सिंगल पार्टी टेंडर में पौने 275 करोड़ में सौंपने के मामले में सर्च तो दूर, दो बरस तक फ़ाइल की धूल तक न झड़ने दी,उसी ने अंतरिम सीबीआई निदेशक के रूप में अपनी सेवा के आख़िरी दिन एक दूसरे आई पी एस अफ़सर (पुलिस कमिश्नर ) के घर चालीस आदमी छापा मारने कैसे भेज दिए ?

नागेश्वर राव उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू के बेहद क़रीबी होने की वजह से भी मशहूर हैं। विवेकानन्द फ़ाउंडेशन और कई संघी नेताओं से उनका मेल-मिलाप भी सबको पता है। ओड़ीशा में तैनाती के दौरान उन्हें उनके संघी स्टाइल के भड़काऊ बयानों पर जवाबदेह भी होना पड़ा था।
उनके बारे में 'स्लेट क्लीन' न होने के दस्तावेज़ों की उपलब्धता के बावजूद 2016 में सेंट्रल विजिलेंस कमीशन ने उनके सीबीआई में दाखिल होने के रास्ते की सारे अड़चनों को हटा दिया था। सीबीआई में उन्हें चेन्नई ज़ोन के हेड (ज्वाइंट डायरेक्टर) का चार्ज मिला। 2017 में जब आलोक वर्मा सीबीआई डायरेक्टर बने तो उसी वर्ष मई महीने में राव साहब के कारनामे शिकायत के तौर पर उनकी मेज़ पर थे। इसमें सबसे प्रमुख शिकायत एचटीएल लिमिटेड की जमीन को वीजीेएन डेवलपर्स के हाथ बेचे जाने के प्रसंग में हुई धोखाधड़ी के मामले में सीबीआई की जाँच को ठंडे बस्ते में डाल रखने का मामला भी था।
एचटीएल लिमिटेड की ज़मीन की कहानी यह है कि तमिलनाडु सरकार के संबंधित अफ़सरों और बैंक अफ़सरों ने 2013 में जिस प्रापर्टी को केवल इकलौते टेंडर से वीजीएन डेवलपर्स को 275 करोड़ रुपये में बेचा, उसने उसी दिन आई एल एफ एस से यही ज़मीन गिरवी रखकर 280 करोड़ रुपये उठा लिये थे। सरकारी दस्तावेज़ों के अनुसार, तीन साल पहले एक सचमुच की टेंडर प्रक्रिया में एक दूसरी कंपनी ने इसी सौदे को लिये 290 करोड़ की बोली लगाकर टेंडर हासिल किया था, उसने इसके बाद मार्जिन मनी भी जमा कर दी थी, लेकिन उसे दो साल तक एन ओ सी ही जारी नहीं की गई। आख़िर वह कंपनी सौदा छोड़कर वापस चली गई। इसके बाद केवल एक टेंडर पर उसी प्रापर्टी को 15 करोड़ कम पर यानी कुल 275 करोड़ रुपये में बेच दिया गया। 
इस खुले भ्रष्टाचार के मामले में पीई से एफ़आईआर दर्ज होने में करीब दो साल लगे। 28 दिसंबर 2016 में बवाल के बवंडर बन जाने की वजह से किसी तरह एफ़आईआर दर्ज हुई।
करीब आधा दर्जन नामज़द अभियुक्तों के वजूद में होने के बावजूद नागेश्वर राव की सीबीआई ने पूरे दो वर्ष तक अपने कार्यकाल में किसी अभियुक्त के यहाँ किसी तरह की सर्च की ज़रूरत नहीं समझी। वीजीएन डेवलपर्स के प्रबंधकों द्वारा मद्रास हाईकोर्ट में एफ़आईआर खारिज किए जाने की पिटीशन पर दाखिल स्टेटस रिपोर्ट में एक 'सहयोगी पैरा' जोड़ा। इसमें लिखा गया कि घोटाले का तखमीना 115 करोड़ गलत आँका गया है, यह 55 करोड़ ही है। संयोग कहिए कि हाईकोर्ट को मामला समझ आ गया और याचिका खारिज हो गई।

सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा ने नागेश्वर राव से इस सब पर स्पष्टीकरण माँगे। राव गोलमोल जवाब देते रहे। नतीजतन आलोक वर्मा ने राव को सीबीआई से वापस ओड़ीशा कैडर में भेजने की सिफ़ारिश की। बिना सीवीसी की सहमति के वर्मा राव को उड़ीसा भले न भेज सके, पर उन्होंने राव को चेन्नई से हटाकर चंडीगढ़ भेज दिया और वीजीएन प्रकरण की जाँच सीबीआई के बैंकिंग फ्रॉड सेक्शन में बेंगलुरू ट्रांसफ़र कर दी। ये सारे तथ्य उन दो याचिकाओं का हिस्सा हैं, जिन्हें सीबीआई के उन अफ़सरों ने सुप्रीम कोर्ट में दायर किया है, जिनका तबादला आलोक वर्मा का क़रीबी मानकर अंतरिम निदेशक बनते ही राव ने अंडमान निकोबार कर दिया था।

पूर्व सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा

नागेश्वर राव पर ओड़ीशा की एक निचली अदालत में एक जायदाद संबंधी विवाद में मुक़दमा चला। बाद में रसूखदार होने के नाते वे मुद्दई से सुलह कर मुक़दमा बंद करवाने में कामयाब ज़रूर हो गये, पर मुक़दमे से यह सवाल तो उठता है कि आख़िर राव सीबीआई जैसी एजेंसी के लायक़ हैं या नहीं?

ओड़ीशा में अपने कैडर में वह अग्निशमन विभाग के आला ओहदे पर तैनात थे। वहाँ राव पर पाँच हज़ार कर्मचारियों की पीली चमकीली वर्दी की ख़रीद में तीन करोड़ रुपये की हेराफेरी का आरोप लगा था।

इधर अंतरिम निदेशक सीबीआई के दौर के अपने रोल में मनमाने ढंग से थोक में सीबीआई अफ़सरों का तबादला करने के कारण राव एक नई मुसीबत में पड़ गये। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना करते हुए सीबीआई के एक ऐसे अफ़सर का भी तबादला कर दिया था, जो बिहार के 'शेल्टर होम' मामले की जाँच के इनवेस्टीगेटिंग आफ़िसर थे और जिसकी मानीटरिंग सुप्रीम कोर्ट कर रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ दिन पहले ही राव को अवमानना का नोटिस देते समय उन पर मौखिक टिप्पणी की थी, 'आपको भगवान बचाए।'

क्या नये और दो साल के लिए सर्वशक्तिमान सीबीआई निदेशक तथ्यों का संज्ञान लेने का संवैधानिक दायित्व निभाएँगे?

शीतल पी. सिंह
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