जिन श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने मुस्लीम लीग के साथ सरकार में हिस्सा लिया था और जिन पर विपक्ष सांप्रदायिक, हिंदुत्ववादी और विभाजनकारी होने का आरोप लगाता रहा है उनको अब बंगाल की किताबों में 'आदर्श' के रूप में पढ़ाया जाएगा।
जिन श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने आज़ादी से पहले मुस्लीम लीग के साथ सरकार बनाई थी और जिन पर विपक्ष सांप्रदायिक, हिंदुत्ववादी और विभाजनकारी होने का आरोप लगाता रहा है उनको अब बंगाल की किताबों में 'आदर्श' के रूप में पढ़ाया जाएगा। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सोमवार को इसकी घोषणा की। उन्होंने कहा कि अगले शैक्षणिक सत्र से राज्य के स्कूलों के पाठ्यक्रम में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन, उनके 'राष्ट्रवादी विचारों' और पश्चिम बंगाल को भारत का हिस्सा बनाए रखने में उनकी 'भूमिका' को शामिल किया जाएगा। उन्होंने कहा कि स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक छात्रों को उनके योगदान के बारे में पढ़ाया जाना चाहिए।
हालाँकि, जिसको बीजेपी मुखर्जी का योगदान कहती है उसको विपक्ष देश को नुक़सान पहुँचाने वाली 'विभाजनकारी' विचारधारा होने का आरोप लगाता रहा है। विपक्ष क्या-क्या कहकर हमला करता रहा है, यह जानने से पहले यह जान लीजिए कि आख़िर मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने क्या कहा है। सीएम ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती के अवसर पर कोलकाता के मित्रा इंस्टीट्यूशन में आयोजित कार्यक्रम में सिलेबस में उनको शामिल करने की घोषणा की।
अगले सत्र से किताबों में शामिल होंगे मुखर्जी
मुख्यमंत्री अधिकारी ने कहा कि अगले शैक्षणिक वर्ष से पश्चिम बंगाल के इतिहास में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भूमिका, उनका 'देशभक्ति का संदेश', 'अखंड भारत के प्रति उनका दृष्टिकोण' और पश्चिम बंगाल को भारत में बनाए रखने में उनके योगदान को पाठ्यपुस्तकों में शामिल किया जाएगा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि केवल स्कूल ही नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय स्तर तक भी डॉ. मुखर्जी के विचारों और कार्यों का अध्ययन कराया जाना चाहिए और उनके योगदान को नई पीढ़ी तक पहुँचाना ज़रूरी है।
शुभेंदु अधिकारी ने बताया कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी वर्ष 1906 से 1917 तक मित्रा इंस्टीट्यूशन के छात्र रहे थे। मुख्यमंत्री ने इस स्कूल के आधुनिकीकरण की घोषणा करते हुए कहा कि इसे पीएम श्री योजना के तहत विकसित किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि अपने एक करोड़ रुपये के विधायक निधि में से 25 लाख रुपये स्कूल के विकास के लिए देंगे।
शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि राज्य सरकार अब श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सिद्धांतों और विचारों के आधार पर काम करेगी।
125 फीट ऊंची प्रतिमा, 200 करोड़ ख़र्च करेंगे
राज्य सरकार इस वर्ष डॉ. मुखर्जी की प्रतिमाओं और उनसे जुड़े अन्य कार्यों पर 200 करोड़ रुपये खर्च करेगी। मुख्यमंत्री ने बताया कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125 फीट ऊंची प्रतिमा का निर्माण न्यू टाउन स्थित इको पार्क के पास किया जाएगा। उन्होंने कहा कि प्रतिमा निर्माण का भूमि पूजन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह करेंगे।मुखर्जी पर एक समिति का गठन
मुख्यमंत्री ने बताया कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन और इतिहास को संरक्षित करने के लिए राज्य सरकार ने एक विशेष समिति का गठन किया है। समिति के अध्यक्ष खुद मुख्यमंत्री होंगे। मुख्य सचिव इसके सदस्य सचिव होंगे। समिति में राज्य सरकार के 10 अधिकारी और बाहर के 10 विशेषज्ञ सदस्य शामिल किए गए हैं।
मुखर्जी इतिहास में विवादास्पद व्यक्तित्व
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी पश्चिम बंगाल के इतिहास में एक विवादास्पद व्यक्तित्व हैं। भारतीय जनता पार्टी उन्हें बंगाल के रक्षक और राष्ट्रवादी मानती है, जबकि विपक्ष उन्हें सांप्रदायिक और विभाजनकारी बताता है। कुछ इतिहासकार कहते हैं कि उनका रुख हिंदू-केंद्रित था, जिससे हिंदू-मुस्लिम विभाजन बढ़ा। उन्होंने अखंड बंगाल योजना को 'हिंदुओं के हितों के खिलाफ' बताया। मुखर्जी ने 'एक देश, एक विधान, एक प्रधान, एक निशान' का यह नारा उन्होंने कश्मीर के संदर्भ में दिया, लेकिन यह पूरे देश के लिए था।विपक्ष आरोप लगाता रहा है कि भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बंगाल के गवर्नर को पत्र लिखकर कांग्रेस के आंदोलन को दबाने की सलाह दी, जिसे वे 'अराजकता' मानते थे। विपक्ष इसे 'स्वतंत्रता संग्राम में गद्दारी' कहता है। उनके समर्थक कहते हैं कि वे व्यवस्थित स्वतंत्रता चाहते थे, न कि अराजकता।
'मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन'
1941-43 में बंगाल में फजलुल हक की सरकार में उन्होंने हिस्सा लिया, जिसमें मुस्लिम लीग का समर्थन था। कांग्रेस इसे 'मुस्लिम लीग के साथ सांठगांठ' कहकर हमला करती है। इसके अलावा हिंदू महासभा से जुड़ाव और विभाजन के समय हिंदू हितों की वकालत को विपक्ष 'हिंदू जिन्ना' या सांप्रदायिक राजनीति कहकर हमला करता रहा है।
मुखर्जी की आलोचना इसलिए भी की जाती रही है कि उनका हिंदुत्व बहुसंख्यकवादी था, जो मुस्लिमों को अलग-थलग करता था। आरोप लगता रहा है कि विभाजन के समय उनका रुख सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने वाला था।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी पश्चिम बंगाल और भारत के इतिहास में राष्ट्रीय एकता बनाम सांप्रदायिकता की बहस के केंद्र में हैं। बीजेपी के लिए वह प्रेरणा हैं, जबकि विपक्ष के लिए विभाजन का प्रतीक।