पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने राजनीतिक समीकरण को पूरी तरह बदल दिया है। ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी की इतनी बुरी हार होगी, इसका अंदाजा राजनीतिक विश्लेषकों को भी नहीं था। ममता बनर्जी ने आरएसएस-बीजेपी की मदद से जिस कम्युनिस्ट राज को बंगाल की सत्ता से 2011 में बेदखल किया था, आज उसी संघ के राजनीतिक मुखौटे ने ममता को सत्ता से बेदखल कर दिया है। इस रिपोर्ट के लिखे जाने के समय रुझानों में बीजेपी 200 सीटों और टीएमसी 87 सीटों पर आगे थी। राज्य में बीजेपी सरकार बनना तय है।
ममता को बंगाल की सत्ता से हटाना इतना आसान नहीं था। 1 जनवरी 1998 को ममता बनर्जी ने मुकुल रॉय के साथ मिलकर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी। इसके बाद 1999 में ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी के साथ बीजेपी-नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन में शामिल होकर रेल मंत्री का पद संभाला।
सितंबर 2003 में वे फिर से एनडीए सरकार में लौटीं, हालांकि कई महीनों तक बिना विभाग के मंत्री रहीं। 2004 के आम चुनाव से ठीक पहले उन्हें कोयला और खान मंत्री बनाया गया।

आरएसएस से कम्युनिस्टों को हराने के लिए सहयोग मांगा

24 अगस्त 2001 को बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने बीजेपी को अपना “स्वाभाविक सहयोगी” बताया था। सितंबर 2003 में, पश्चिम बंगाल में सीपीआई (एम) के खिलाफ अपनी लड़ाई को तेज करने के लिए ममता बनर्जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का खुला समर्थन मांगा। उस समय वे बंगाल की सत्ता में आने की कोशिश में थीं।
उन्होंने सीपीआई (एम) पर “कम्युनिस्ट आतंकवाद” फैलाने का आरोप लगाया। उसी वर्ष दिल्ली में आरएसएस के एक कार्यक्रम में उन्होंने ‘कम्युनिस्ट आतंकवाद’ नामक पुस्तक के विमोचन समारोह में हिस्सा लिया। यह पुस्तक ‘पाञ्चजन्य’ के तत्कालीन संपादक तरुण विजय द्वारा संपादित थी। अपने संबोधन में ममता बनर्जी ने सीपीआई (एम) को “खतरनाक” और “फासीवादी” पार्टी बताया।

उसी कार्यक्रम के दौरान बीजेपी नेता बलबीर पुंज ने उन्हें “साक्षात दुर्गा” कहा, जबकि तरुण विजय ने “बंगाल की दुर्गा” के रूप में संबोधित किया। आरएसएस ने भी उनके संघर्ष को समर्थन देते हुए उन्हें इसी रूप में पेश किया।

  • मई 2011 में ममता बनर्जी की टीएमसी ने कम्युनिस्ट सरकार को हराकर बंगाल की सत्ता पर ऐतिहासिक विजय प्राप्त की।

संघ ने ममता की तारीफ की

आरएसएस-बीजेपी ने 2011 में ममता की जीत को ऐतिहासिक बताया। ममता की तारीफ शुरू हुई। 2012 में आरएसएस के मुखपत्र ‘पाञ्चजन्य’ ने ममता की सादगीपूर्ण जीवनशैली की प्रशंसा करते हुए उन्हें उन दुर्लभ नेताओं में बताया। आरएसएस ने ममता को सर्टिफिकेट भी दे दिया। अपने मुखपत्र में संघ ने लिखा- ममता ने राजनीति से धन नहीं कमाया।

2014 में बीजेपी ने अपनी रणनीति क खुलासा किया

2014 में बीजेपी केंद्र की सत्ता में आई। पश्चिम बंगाल में उसने कथित बंगलादेशी घुसपैठियों के खिलाफ अभियान शुरू किया। ममता को यह बात समझ में आ गई। उन्होंने मुस्लिम संगठनों के कार्यक्रमों आना-जाना बढ़ा दिया। केंद्र की सरकार ने बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा उठाना शुरू कर दिया। अब पूरा मामला हिन्दू बनाम मुसलमान हो गया। ममता खुद को मुसलमानों का मसीहा बताने लगीं।
2019 का आम चुनाव आते-आते ममता बनर्जी का रुख एकदम बदल गया। उन्होंने एनआरसी और सीएए का विरोध किया और बीजेपी के खिलाफ कई आंदोलनों का नेतृत्व किया। हालांकि इसी दौरान नागरिकता संशोधन विधेयक पर मतदान के समय अनुपस्थित रहे आठ सांसदों को उन्होंने दोषमुक्त कर दिया, जिससे राजनीतिक सवाल भी उठे।
27 जनवरी 2020 को बीजेपी नेता अनुराग ठाकुर द्वारा एक विवादित नारा दिए जाने के बाद, मुर्शिदाबाद में विरोध प्रदर्शन के दौरान भयानक हिंसा हुई। बंगाल में विदेशी नागरिक, बंगलादेशी घुसपैठिए जैसे मुद्दे गरम हो उठे।

उपराष्ट्रपति चुनावः ममता ने विपक्षी उम्मीदवार का विरोध किया

जुलाई 2022 में उपराष्ट्रपति चुनाव के दौरान टीएमसी ने विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा का समर्थन नहीं किया और एनडीए उम्मीदवार जगदीप धनखड़ का समर्थन किया। सितंबर 2022 में ममता बनर्जी ने यह भी कहा कि “आरएसएस में सभी लोग खराब नहीं हैं।” लेकिन उससे पहले धनखड़ जब बंगाल के राज्यपाल थे तो ममता ने आरोप लगाया कि उनकी सरकार को राज्यपाल परेशान कर रहे हैं। लेकिन बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने धनखड़ को बंगाल से उठाकर उपराष्ट्रपति बना दिया। ममता का बदलता रुख यहां भी दिखा। 

इतिहासः बीजेपी का साथ जितने दिया, वो कमज़ोर हुआ

कई राजनीतिक समीकरण शुरू में बहुत आकर्षक और सरल दिखाई देते हैं। बीजेपी एक राष्ट्रीय पार्टी है, लेकिन यह एक तथ्य भी है कि जिन क्षेत्रीय दलों ने उसका दामन थामा, उसे सत्ता से बेदखल होना पड़ा या उसकी कमज़ोरी सामने आ गई।
बिहार का उदाहरणः बंगाल से भी पहले बिहार का नतीजा ज्यादा पुराना नहीं है। बिहार में बीजेपी ने नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू के साथ गठबंधन किया। 2025 का विधानसभा चुनाव दोनों गठबंधन ने साथ लड़ा। जीतने पर नीतीश कुमार फिर से सीएम बने। लेकिन हाल ही में नीतीश पर दबाव इतना बढ़ा कि नीतीश ने सीएम पद से इस्तीफा दिया। अब राज्यसभा में हैं और बीजेपी के सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बन चुके हैं। जेडीयू बिहार में अब बुरी स्थिति में है। कभी भी टूट सकती है या बीजेपी में समाहित हो सकती है।
महाराष्ट्र का उदाहरणः महाराष्ट्र में भी ऐसा ही हुआ था। बीजेपी और शिवसेना के संबंधों में सत्ता को लेकर खटास आ गई। उद्धव बीजेपी से अलग होकर महाविकास अघाड़ी में चले गए। बीजेपी ने शिवसेना को तोड़ने की व्यहरचना रची। एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री पद का लालच मिला। उन्होंने 2022 में शिवसेना तोड़ दी। शिंदे के साथ अलग हुए विधायकों ने बीजेपी के साथ महाराष्ट्र में सरकार बनाई। देवेंद्र फडणवीस ने डिप्टी सीएम बनना स्वीकार किया। इसके बाद विधानसभा चुनाव 2024 में हुए। बीजेपी ने शिंदे गुट के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। शिंदे गुट के कई नेता बीजेपी टिकट पर चुनाव लड़ते नजर आए। सरकार फिर से बनी तो फडणवीस मुख्यमंत्री बने, शिंदे डिप्टी सीएम बने। शिंदे सेना के विधायक अक्सर बयान देते हैं कि शिंदे को अपमानित किया जा रहा है। शिंदे गुट अब महाराष्ट्र में कमज़ोर पड़ चुका है।
असम में क्या हुआः असम में असम गण परिषद (एजीपी) का हाल भी बीजेपी का हाथ थामने पर ऐसा ही हुआ। वो एजीपी जो कभी असम का प्रमुख राजनीतिक दल था, आज उसकी अपनी पहचान खत्म हो चुकी है। उसके तमाम नेता अब बीजेपी नेता कहलाते हैं। 2016 में एजीपी और बीजेपी ने गठबंधन किया था। फिर अनबन हुई। उसके बाद दोनों ने 2021 का चुनाव मिलकर लड़ा। एजीपी जो कभी असम के मुद्दे प्रमुखता से उठाती थी, आज उसका पता नहीं। हालांकि बीच में मतभेद की खबरें आती रहती हैं लेकिन एजीपी महत्वहीन हो चुकी है।

नवीन पटनायक, मायावती और पंजाब में अकाली दल कैसे कमज़ोर हुए

ओडिशा में बीजू जनता दल के नवीन पटनायक ने बीजेपी का खासा समर्थन किया। लेकिन आज ओडिशा में बीजू जनता किस हालत में है, सामने है। लोकप्रियता के बावजूद उसकी सत्ता चली गई। बसपा प्रमुख मायावती ने भी बीजेपी का समर्थन लिया। दोनों में यूपी सरकार ढाई-ढाई साल चलाने पर सहमति बनी । लेकिन जब बीजेपी का समय आया तो दोनों में मतभेद पैदा हो गए। उसके बाद भी मायावती का ग्राफ नीचे ही गिरता रहा। आज वो बीजेपी की ठीक तरह से आलोचना तक नहीं कर पातीं। इसी तरह शिरोमणि अकाली दल ने पंजाब में बीजेपी से तालमेल किया। अकाली सत्ता से बेदखल हो गए। उनमें भी दो गुट बन गए हैं। 
इन सभी घटनाओं के बीच अब ताजा चुनाव नतीजे यह संकेत देते हैं कि बंगाल में बीजेपी लगातार अपना आधार मजबूत करती रही है। चाहे यह संयोग हो या बीजेपी-आरएसएस की रणनीति. बीजेपी ने बंगाल फतह कर लिया है। ममता ने ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया तो उसकी फसल बीजेपी ने ही काटी। बीजेपी ने कई राज्यों में इस प्रयोग को किया और सफल रही।