पश्चिम बंगाल के बीजेपी अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा, "बहुत जल्द इसका नाम 'बंग' या 'बंगाल' नहीं, बल्कि 'पश्चिम बंग' होगा। हमारी सरकार पहले ही सत्र में यह बिल पेश कर रही है ताकि राज्य का नाम उसके इतिहास के अनुरूप हो और वह इसी नाम से जाना जाए।"
पश्चिम बंगाल का नाम एक बार फिर बदले जाने की चर्चा है। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा है कि राज्य का नाम अब ‘बंग’ या ‘बंगाल’ नहीं, बल्कि ‘पश्चिम बंग’ किया जाएगा। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार विधानसभा के मौजूदा सत्र या अगले चरण में नाम बदलने से संबंधित विधेयक पेश कर सकती है। इस पर टीएमसी विधायक कुणाल घोष बोले ने पत्रकारों से कहा कि राज्य का नाम ‘बांग्ला’ होना चाहिए, ममता सरकार पहले ही इस प्रस्ताव को विधानसभा से पास करा चुकी है।
बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने राज्य का नाम बदले जाने की बात तब कही जब वाराणसी में प्रस्तावित ‘पश्चिम बंग भवन’ को लेकर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल पूछा गया। इस पर समिक भट्टाचार्य ने कहा कि राज्य के नाम को उसके इतिहास से जोड़ने के लिए यह फ़ैसला लिया गया है। उन्होंने कहा कि बहुत जल्द राज्य का नाम ‘पश्चिम बंग’ होगा और बीजेपी की सरकार अपने पहले ही विधानसभा सत्र में इससे संबंधित बिल पेश करेगी। बीजेपी अध्यक्ष की घोषणा के बाद यह भी साफ हो गया है कि राज्य के नाम को लेकर बीजेपी और टीएमसी की पसंद अलग-अलग है।
नाम बदलने की इस घोषणा के साथ ही टीएमसी और बीजेपी के बीच पुराना विवाद फिर सामने आ गया है। टीएमसी विधायक कुणाल घोष ने कहा कि राज्य का नाम ‘बांग्ला’ होना चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि ममता बनर्जी सरकार के समय विधानसभा ने ‘बांग्ला’ नाम के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया था।
टीएमसी बोली- ‘नाम बांग्ला होना चाहिए’
टीएमसी विधायक कुणाल घोष ने बीजेपी के प्रस्ताव पर सवाल उठाते हुए कहा कि राज्य का नाम ‘बांग्ला’ रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कार्यकाल में पश्चिम बंगाल विधानसभा ने राज्य का नाम बदलकर ‘बांग्ला’ करने का प्रस्ताव पारित किया था। उनके मुताबिक, इस नाम पर शिक्षाविदों और इतिहासकारों से विचार-विमर्श किया गया था।कुणाल घोष ने पुराने तर्क को भी दोहराया कि ‘West Bengal’ नाम की वजह से अंग्रेजी वर्णमाला के हिसाब से राज्य का नाम सूची में काफी नीचे आता है। राष्ट्रीय स्तर की बैठकों में राज्यों को क्रम से बोलने का मौक़ा मिलने पर बंगाल की बारी अक्सर आखिर में आती थी। उनके मुताबिक, ‘बांग्ला’ नाम रखने से राज्य को बैठकों में पहले बोलने का अवसर मिल सकता था और राज्य अपने मुद्दे जल्दी उठा सकता था।
‘चुनाव से पहले सोनार बांग्ला, अब बांग्ला क्यों नहीं?’
कुणाल घोष ने बीजेपी पर राजनीतिक सवाल भी उठाया। उन्होंने कहा कि चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी नेताओं ने ‘सोनार बांग्ला’ बनाने का नारा दिया था, न कि 'सोनार पश्चिम बंग'। उन्होंने सवाल किया कि अगर चुनाव से पहले ‘सोनार बांग्ला’ कहा जा रहा था तो चुनाव के बाद ‘बांग्ला’ नाम स्वीकार्य क्यों नहीं है। कुणाल घोष ने यह भी कहा कि ‘पश्चिम’ शब्द तभी अर्थपूर्ण होता है जब उसके साथ ‘पूर्व’ भी हो। उनके तर्क के मुताबिक, अगर राज्य का कोई ‘पूर्व बंग’ नहीं है तो ‘पश्चिम बंग’ नाम रखने का औचित्य क्या है।
नाम बदलने की बहस नई नहीं है
पश्चिम बंगाल का नाम बदलने की कोशिशें करीब ढाई दशक पुरानी हैं। 1999 में ज्योति बसु के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार ने राज्य का नाम ‘पश्चिम बंग’ करने के पक्ष में विधानसभा में प्रस्ताव अपनाया था। उस समय ‘बांग्ला’ नाम रखने को लेकर भी चर्चा हुई थी। बाद में ‘बांग्ला’ नाम के प्रस्ताव को भी आगे बढ़ाया गया। लेकिन राजनीतिक सहमति और केंद्र की मंजूरी नहीं मिलने के कारण नाम बदलने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।उस दौर में मुख्य तर्क यह था कि औपनिवेशिक दौर से चले आ रहे ‘West Bengal’ नाम को बदलकर ऐसा नाम रखा जाए जो राज्य की बंगाली पहचान और इतिहास को अधिक स्पष्ट रूप से दर्शाए।
ममता सरकार ने भी किया था प्रयास
2011 में टीएमसी के सत्ता में आने के बाद नाम बदलने का मुद्दा फिर सामने आया। ममता बनर्जी सरकार ने शुरुआत में ‘पश्चिम बंग’ नाम का प्रस्ताव रखा था। इसका एक प्रमुख तर्क यही था कि अंग्रेजी वर्णमाला में ‘West Bengal’ नाम राज्यों की सूची में काफी नीचे आता है और राष्ट्रीय बैठकों में राज्य के प्रतिनिधियों को अपनी बात रखने के लिए अक्सर लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है। उस समय हुई सर्वदलीय बैठक में भी नाम बदलने के प्रस्ताव को समर्थन मिला था। लेकिन केंद्र सरकार से इसे मंजूरी नहीं मिली।2016 में तीन अलग-अलग नामों का प्रस्ताव
2016 में ममता बनर्जी सरकार ने नाम बदलने की प्रक्रिया को फिर आगे बढ़ाया। उस समय अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग नाम रखने का प्रस्ताव था। इसके तहत बंगाली में ‘बांग्ला’, अंग्रेजी में ‘Bengal’ और हिंदी में ‘बंगाल’ नाम रखने की बात कही गई थी। बाद में 2018 में पश्चिम बंगाल विधानसभा ने सर्वसम्मति से राज्य का नाम केवल ‘बांग्ला’ रखने का प्रस्ताव पारित किया। लेकिन यह प्रस्ताव भी केंद्र सरकार की मंजूरी हासिल नहीं कर सका।
केंद्र ने संवैधानिक संशोधन की जरूरत बताई थी
राज्य का नाम बदलने के लिए केंद्र की मंजूरी जरूरी है। 2018 में ‘बांग्ला’ नाम के प्रस्ताव पर केंद्र की ओर से संवैधानिक संशोधन की जरूरत का मुद्दा उठाया गया था। इसके अलावा बीजेपी के कुछ नेताओं ने ‘बांग्ला’ नाम को पड़ोसी देश बांग्लादेश से मिलता-जुलता होने को लेकर भी आपत्ति जताई थी। इस वजह से विधानसभा से प्रस्ताव पारित होने के बावजूद नाम बदलने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी।