पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर दायर अपीलों के निपटारे की रफ्तार पर सवाल खड़े हो रहे हैं। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को दिए हलफनामे में बताया है कि SIR से जुड़े 38,20,683 अपीलें दायर की गई हैं, लेकिन इनमें से अब तक सिर्फ 1,02,231 मामलों का निपटारा हुआ है। यानी 37,18,452 अपीलें अभी लंबित हैं।
यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही चुनावी सूची से नाम हटाए जाने या जोड़े जाने से जुड़े मामलों की सुनवाई समयबद्ध तरीके से करने पर जोर दे चुका है।

सुप्रीम कोर्ट में क्या बताया चुनाव आयोग ने?

चुनाव आयोग ने अपने जवाबी हलफनामे में कहा कि पश्चिम बंगाल की SIR प्रक्रिया से जुड़े आदेशों के खिलाफ कुल 38.20 लाख से अधिक अपीलें दायर हुई हैं। इनमें:
  • कुल अपीलें: 38,20,683
  • निपटाए गए मामले: 1,02,231
  • लंबित मामले: 37,18,452
हालांकि आयोग के हलफनामे में यह अलग-अलग नहीं बताया गया है कि इनमें कितनी अपीलें उन मतदाताओं ने की हैं जिनके नाम मतदाता सूची से हटाए गए और कितनी अपीलें मतदाता सूची में किसी नाम को शामिल किए जाने के खिलाफ हैं। यही वह बिंदु है जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी चुनाव आयोग से विस्तृत जानकारी मांगी थी।
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किस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई?

यह मामला पश्चिम बंगाल कांग्रेस की SIR समिति के अध्यक्ष प्रसेनजीत बोस की याचिका से जुड़ा है। 17 जुलाई को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं, ने याचिका पर चुनाव आयोग से जवाब मांगा था। याचिका में उन मतदाताओं के दावों और आपत्तियों का विधानसभा क्षेत्रवार आंकड़ा उपलब्ध कराने की मांग की गई थी, जिनके नाम SIR के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए थे।

58 लाख से ज्यादा मतदाता हुए थे बाहर

याचिकाकर्ता प्रसेनजीत बोस के मुताबिक, SIR की enumeration प्रक्रिया के दौरान पश्चिम बंगाल में 58 लाख से ज्यादा मतदाताओं को बाहर कर दिया गया था। 
इसके बाद दावे और आपत्तियां दाखिल करने की प्रक्रिया में:
  • Form 6 और Form 6A के जरिए करीब 9.64 लाख नाम जोड़ने के आवेदन आए।
  • Form 7 के जरिए 99 हजार से ज्यादा नाम हटाने के आवेदन आए।
  • लेकिन 28 फरवरी को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में करीब 1.82 लाख नए नाम ही जोड़े गए, ऐसा याचिका में दावा किया गया था।
यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि ये आंकड़े याचिकाकर्ता द्वारा अदालत में रखे गए दावे हैं, जबकि चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में अपीलों और Form 6 आवेदनों से जुड़े अलग आंकड़े प्रस्तुत किए हैं।

34.13 लाख Form 6 आवेदन

चुनाव आयोग द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, 17 दिसंबर 2025 से 7 अगस्त 2026 के बीच 34.13 लाख Form 6 आवेदन दाखिल किए गए।
Form 6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए किया जाता है। इसमें पहली बार मतदाता बनने वाले लोगों के साथ-साथ वे लोग भी शामिल हैं जिनके नाम SIR के ड्राफ्ट चरण में हट गए थे और उन्होंने दोबारा नाम शामिल कराने के लिए आवेदन किया।

सुप्रीम कोर्ट ने समयबद्ध सुनवाई पर दिया जोर

सुप्रीम कोर्ट ने 25 अगस्त को चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि वह मतदाता सूची से नाम हटाने या शामिल करने के खिलाफ दाखिल अपीलों की स्थिति—कितने मामले लंबित हैं और कितने निपटाए गए हैं—का आंकड़ा अदालत को दे। अदालत ने यह भी पूछा था कि लंबित मामलों को तेजी से निपटाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं और क्या अतिरिक्त अपीलीय ट्रिब्यूनलों की जरूरत है। इससे पहले 24 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि जिन मतदाताओं के नाम हटाए जाने के खिलाफ तत्काल सुनवाई की जरूरत है और जो अपनी अर्जेंसी साबित कर सकते हैं, उनकी अपीलों पर ट्रिब्यूनल आउट-ऑफ-टर्न सुनवाई करें।

700 न्यायिक अधिकारियों की तैनाती

SIR के बाद दावों और आपत्तियों की भारी संख्या को देखते हुए पश्चिम बंगाल और पड़ोसी राज्यों ओडिशा तथा झारखंड से करीब 700 न्यायिक अधिकारियों को इस प्रक्रिया से जुड़े मामलों से निपटने के लिए लगाया गया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल गठित किए। इन ट्रिब्यूनलों की अध्यक्षता हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और न्यायाधीशों को दी गई है।

इतनी बड़ी संख्या में अपीलें क्यों महत्वपूर्ण हैं?

37.18 लाख अपीलों का लंबित होना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ये सीधे मतदाता सूची में किसी व्यक्ति के नाम के शामिल होने या बाहर किए जाने से संबंधित हैं। हालांकि, मौजूदा चुनाव आयोग के हलफनामे में यह स्पष्ट नहीं है कि लंबित 37,18,452 मामलों में कितने मामले नाम हटाए जाने के खिलाफ हैं और कितने नाम जोड़े जाने के खिलाफ। इसलिए सिर्फ लंबित मामलों की कुल संख्या से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कितने मतदाताओं के नाम वास्तव में गलत तरीके से हटाए गए हैं। इन मामलों की वैधता का फैसला संबंधित अपीलीय ट्रिब्यूनलों को करना है।

SIR और नागरिकता को लेकर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

SIR विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट पहले यह स्पष्ट कर चुका है कि मतदाता सूची से किसी व्यक्ति का नाम हट जाना अपने आप उसकी नागरिकता खत्म नहीं करता। अदालत ने यह भी कहा था कि मतदाता सूची से बाहर किए जाने को नागरिकता निर्धारित करने की प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा जा सकता। अदालत के सामने यह मुद्दा भी आया था कि SIR से नाम बाहर होने के बाद कुछ लोगों को सरकारी योजनाओं और अन्य दस्तावेजों से संबंधित परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि, इन प्रभावों और संबंधित दावों पर अलग-अलग मामलों में न्यायिक विचार चल रहा है।

अब सबसे बड़ा सवाल: 37 लाख से ज्यादा मामलों का निपटारा कब?

चुनाव आयोग के ताजा आंकड़े पश्चिम बंगाल SIR से जुड़ी अपील प्रक्रिया के सामने मौजूद बड़े बैकलॉग को दिखाते हैं। 38.20 लाख अपीलों में सिर्फ 1.02 लाख के निपटारे और 37.18 लाख के लंबित रहने से अब ट्रिब्यूनलों की क्षमता और मामलों के समयबद्ध निपटारे का सवाल महत्वपूर्ण हो गया है।
सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस प्रक्रिया को तेज करने, लंबित मामलों की स्थिति बताने और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त व्यवस्था करने को लेकर चुनाव आयोग से जवाब मांग चुका है। अब आगे की सुनवाई में अदालत इस बात पर भी गौर कर सकती है कि इतने बड़े लंबित मामलों को किस तरह और कितनी तेजी से निपटाया जा सकता है।