गुजरात की भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सरकार ने पूर्व भारतीय क्रिकेटर और लोकसभा सांसद यूसुफ पठान को वडोदरा में एक विवादित जमीन आवंटित करने की मंजूरी दे दी है। लगभग 20.53 करोड़ रुपये बाजार मूल्य वाले इस प्लॉट का विवाद पिछले 14 वर्षों से चला आ रहा है। प्रस्ताव के मुताबिक, कुल 978 वर्ग मीटर जमीन में से 500 वर्ग मीटर हिस्सा पठान को आवासीय इस्तेमाल के लिए मुफ्त दिया जाएगा, जबकि बाकी 478 वर्ग मीटर जमीन बाजार मूल्य के निर्धारित आकलन का 55 प्रतिशत भुगतान करने पर आवंटित की जाएगी।
इस फैसले ने राजनीतिक हलकों में भी सवाल खड़े किए हैं, क्योंकि यह घटनाक्रम यूसुफ पठान के ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) से अलग होने और नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) के साथ जुड़ने के कुछ महीनों बाद सामने आया है।

क्या है गुजरात सरकार का फैसला?

वडोदरा के तंडलजा इलाके में स्थित यह प्लॉट वडोदरा नगर निगम (VMC) की जमीन है। गुजरात सरकार ने इस जमीन को यूसुफ पठान के पक्ष में आवंटित करने की मंजूरी दी है। हालांकि, जमीन पर अंतिम अधिकार और कब्जा सौंपने की प्रक्रिया नगर निगम की निर्धारित मंजूरियों और शर्तों पर निर्भर करेगी। यह मूल्यांकन वडोदरा अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी (VUDA) की मूल्यांकन समिति द्वारा तय दर पर आधारित है। हालांकि, पठान को कितना भुगतान करना होगा और आवंटन किन शर्तों के तहत होगा, यह अभी अंतिम रूप से तय होना बाकी है।
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2012 में शुरू हुआ था जमीन का विवाद

यूसुफ पठान और वडोदरा नगर निगम के बीच विवाद की शुरुआत साल 2012 में हुई थी। पठान ने नगर निगम को आवेदन देकर अपने बंगले से लगी 978 वर्ग मीटर जमीन 99 साल की लीज पर देने की मांग की थी। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर होने के कारण सुरक्षा संबंधी चिंताओं का हवाला दिया था। 
नगर निगम की स्थायी समिति और सामान्य बोर्ड में इस प्रस्ताव पर विचार किया गया। उस समय जमीन की कीमत 57,270 रुपये प्रति वर्ग मीटर तय की गई थी। इस हिसाब से पूरी जमीन की कीमत करीब 5.6 करोड़ रुपये बैठती थी।
नगर निगम ने प्रस्ताव को आगे बढ़ाया, लेकिन जमीन सार्वजनिक नीलामी के बिना आवंटित की जा रही थी। इसलिए गुजरात सरकार की मंजूरी जरूरी थी।
जून 2014 में राज्य सरकार ने इस आवंटन प्रस्ताव को खारिज कर दिया। इसके बाद नगर निगम ने आरोप लगाया कि मंजूरी नहीं मिलने के बावजूद पठान ने जमीन पर बाड़ लगाकर उस पर कब्जा कर लिया। यह आरोपित कब्जा और जमीन का आवंटन ही आगे चलकर लंबे कानूनी विवाद की वजह बना।

2024 में लोकसभा चुनाव के बाद मिला था अतिक्रमण हटाने का नोटिसः यूसुफ पठान ने 2024 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की बहरामपुर सीट से टीएमसी के टिकट पर जीत हासिल की थी। उन्होंने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी को हराया था। चुनाव के कुछ ही समय बाद, जून 2024 में वडोदरा नगर निगम ने उन्हें नोटिस जारी कर कथित अतिक्रमण हटाने और जमीन खाली करने को कहा।

पठान ने इस कार्रवाई को गुजरात हाई कोर्ट में चुनौती दी। उनका तर्क था कि जमीन का मामला एक दशक से अधिक पुराना था और नगर निगम को अतिक्रमण हटाने का आदेश देने से पहले उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर देना चाहिए था। उन्होंने यह भी कहा कि संबंधित जमीन नगर निगम की है, न कि सीधे राज्य सरकार की। 21 अगस्त 2025 को हाई कोर्ट की एकल पीठ ने उनकी याचिका खारिज कर दी। अदालत ने राज्य सरकार द्वारा जमीन आवंटन के पुराने प्रस्ताव को अस्वीकार किए जाने के फैसले को बरकरार रखा।

हाई कोर्ट ने कब्जे और अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए

यूसुफ पठान ने एकल पीठ के फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट की दो न्यायाधीशों वाली पीठ में अपील दायर की। 8 जून 2026 की सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल उठाया कि जब जमीन का कानूनी आवंटन नहीं हुआ था और आवश्यक भुगतान भी नहीं किया गया था, तो सरकारी जमीन पर कब्जा कैसे बना रहा। अदालत ने इस मामले में नगर निगम के अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल किए।
पठान के वकील ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटरों को जमीन आवंटित करने से संबंधित राज्य सरकार की नीति के तहत उनका दावा पेश करने के लिए समय मांगा। अदालत ने उन्हें आगे की दलीलें रखने का अवसर दिया और चेतावनी दी कि यदि जमीन पर अनधिकृत कब्जा बना रहा, तो संभावित आर्थिक देनदारी बढ़ सकती है। इसके बाद 31 अगस्त 2026 को पठान ने अपनी अपील वापस ले ली। उनके वकील ने अदालत को बताया कि मामले का समाधान अदालत के बाहर तलाशा जा रहा है। अपील वापस लिए जाने के कारण अदालत ने उसे खारिज कर दिया।

गुजरात सरकार की मंजूरी के बाद अब क्या होगा?

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात सरकार ने 13 अगस्त 2026 को इस आवंटन से संबंधित सरकारी आदेश जारी किया था। यह आदेश 29 अगस्त को वडोदरा नगर निगम तक पहुंचा। इसके बाद जमीन आवंटन की प्रक्रिया फिर शुरू हुई। नगर निगम आयुक्त अरुण बाबू के मुताबिक, राज्य सरकार की मंजूरी मिल चुकी है और प्रस्ताव को नगर निगम की स्थायी समिति के सामने रखा जाएगा। 20 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, आवंटन से संबंधित प्रस्ताव पर आगे की मंजूरी अभी बाकी थी। इंडिया टुडे की एक अन्य रिपोर्ट में बताया गया कि स्थायी समिति में इस प्रस्ताव पर 23 अक्टूबर को विचार किया जाना है।

जमीन की कीमत 5.6 करोड़ से बढ़कर 20.53 करोड़ रुपये कैसे हुई?

जमीन के मूल्यांकन में पिछले वर्षों के दौरान बड़ा अंतर आया है।
  • 2012 में प्रस्तावित कीमत लगभग 5.6 करोड़ रुपये थी।
  • जुलाई 2026 में नगर निगम ने जमीन की नीलामी के लिए 2.10 लाख रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर पर विचार किया।
  • इस दर से 978 वर्ग मीटर जमीन का अनुमानित बाजार मूल्य लगभग 20.53 करोड़ रुपये बनता है।
  • नए प्रस्ताव में 500 वर्ग मीटर मुफ्त और शेष 478 वर्ग मीटर निर्धारित मूल्य के 55 प्रतिशत पर देने की व्यवस्था है।
इसका अर्थ है कि शेष जमीन पर 45 प्रतिशत की छूट दी जाएगी। हालांकि, 20.53 करोड़ रुपये पूरे प्लॉट का अनुमानित बाजार मूल्य है; यह यूसुफ पठान को मिलने वाला नकद लाभ या अंतिम भुगतान की राशि नहीं है। नगर निगम को राज्य सरकार के आदेश की शर्तों की जांच के बाद भुगतान का अंतिम हिसाब तय करना होगा।

क्या इस जमीन आवंटन का यूसुफ पठान के राजनीतिक बदलाव से संबंध है?

इस मामले का राजनीतिक पहलू भी चर्चा में है। यूसुफ पठान 2024 में टीएमसी के टिकट पर लोकसभा पहुंचे थे। लेकिन 2026 में वह ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी से अलग हुए 20 सांसदों के समूह में शामिल हो गए। इस समूह ने नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) के साथ विलय किया और संसद में एनडीए के साथ जुड़ने का फैसला किया। गुजरात में बीजेपी की सरकार है और वडोदरा नगर निगम पर भी बीजेपी का नियंत्रण है। ऐसे में पठान के राजनीतिक बदलाव के कुछ महीनों बाद जमीन आवंटन की प्रक्रिया आगे बढ़ने से फैसले के समय को लेकर सवाल उठ सकते हैं।

विवाद का सबसे अहम सवाल: कथित कब्जे का क्या होगा?

जमीन आवंटित करने के प्रस्ताव से विवाद का एक हिस्सा सुलझ सकता है, लेकिन कथित अतिक्रमण और जमीन के इस्तेमाल से जुड़ी वित्तीय देनदारी का सवाल अलग है। नगर निगम के अनुसार, कथित कब्जे की अवधि और उसके लिए किसी शुल्क या क्षतिपूर्ति की देनदारी पर अलग से कार्रवाई करनी पड़ सकती है। नागरिक समूह विश्वामित्री बचाओ समिति ने भी सार्वजनिक जमीन पर कथित कब्जे का मुद्दा उठाया था। समिति ने दावा किया था कि लंबे समय तक जमीन का इस्तेमाल किए जाने के लिए लगभग 7.5 करोड़ रुपये का शुल्क बन सकता है। यह समिति का अपना आकलन है, नगर निगम द्वारा तय की गई आधिकारिक देनदारी नहीं। इसलिए इसे पठान पर लगाया गया अंतिम जुर्माना या प्रमाणित बकाया नहीं माना जा सकता।