ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला डी सिल्वा ने तमाम चुनावी अनुमानों को गलत साबित करते हुए राष्ट्रपति चुनाव में ऐतिहासिक जीत हासिल की है। पहले दौर में पिछड़ने के बाद 25 अक्टूबर को हुए दूसरे दौर में उनकी वापसी ने न केवल ब्राजील की राजनीति में नया इतिहास बनाया, बल्कि लैटिन अमेरिका में दक्षिणपंथी राजनीति के बढ़ते प्रभाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए भी एक राजनीतिक चुनौती पेश की है। द इंडियन एक्सप्रेस की व्याख्यात्मक रिपोर्ट के मुताबिक, लूला की जीत के पीछे मतदाताओं को दोबारा अपने पक्ष में लामबंद करने और रोजमर्रा के आर्थिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने जैसे कारक अहम रहे।
80 वर्षीय लूला ने दक्षिणपंथी उम्मीदवार फ्लावियो बोल्सोनारो को हराया। फ्लावियो, पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के बेटे हैं। इस जीत के साथ लूला ब्राजील के लोकतांत्रिक दौर में पहले ऐसे राष्ट्रपति उम्मीदवार बन गए, जिन्होंने पहले दौर में दूसरे स्थान पर रहने के बावजूद दूसरे दौर में चुनाव जीत लिया। वह चौथी बार राष्ट्रपति पद संभालने जा रहे हैं।

पहले दौर में पिछड़े, दूसरे दौर में पलटी बाजी

4 अक्टूबर को हुए पहले दौर के मतदान में फ्लावियो बोल्सोनारो को लगभग 47.03 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि लूला को करीब 45.16 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे। दोनों के बीच लगभग 22 लाख वोटों का अंतर था। इस नतीजे ने लूला की चुनावी संभावनाओं पर सवाल खड़े कर दिए थे। लेकिन अगले तीन हफ्तों में लूला के अभियान ने अपनी रणनीति बदली। उन्होंने महंगाई, घरेलू खर्च, रोजगार, सामाजिक कल्याण योजनाओं और आम परिवारों की आर्थिक मुश्किलों को चुनाव प्रचार के केंद्र में रखा। इसके साथ ही उन्होंने उन मतदाताओं को दोबारा मतदान के लिए प्रेरित करने की कोशिश की, जो पहले दौर में वोट डालने नहीं पहुंचे थे।
दूसरे दौर में लूला को लगभग 51.7 प्रतिशत और फ्लावियो बोल्सोनारो को 48.3 प्रतिशत वोट मिले। इस तरह पहले दौर में पिछड़ने के बावजूद लूला ने करीब 43 से 44 लाख वोटों के अंतर से जीत हासिल की। अंतिम मतगणना के आंकड़ों के अनुसार, यह ब्राजील के आधुनिक लोकतांत्रिक इतिहास की एक असाधारण राजनीतिक वापसी है।

लूला की जीत के दो बड़े कारण क्या रहे?

आम लोगों की आर्थिक समस्याओं पर फोकसः लूला के सामने सबसे बड़ी चुनौती महंगाई, जीवनयापन की बढ़ती लागत और परिवारों पर बढ़ते कर्ज का दबाव था। चुनाव में फ्लावियो बोल्सोनारो ने अपराध पर सख्ती और खाद्य पदार्थों की कीमतें कम करने को प्रमुख मुद्दा बनाया था। लूला ने जवाब में गरीब और कामकाजी वर्ग के मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए अपनी सामाजिक कल्याण योजनाओं और आर्थिक राहत के वादों पर जोर दिया। उनके अभियान में सामाजिक सहायता कार्यक्रम बोल्सा फैमीलिया के तहत समर्थन बढ़ाने, घरेलू कर्ज से राहत देने, मजदूरों के हितों की रक्षा और सप्ताहांत में सार्वजनिक परिवहन मुफ्त करने जैसे प्रस्ताव शामिल थे।
उनकी रणनीति का मकसद यह दिखाना था कि सरकार की नीतियां आम परिवारों की जिंदगी में वास्तविक सुधार ला सकती हैं। गरीबी घटाने, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के अपने पुराने रिकॉर्ड को भी उन्होंने मतदाताओं के सामने रखा।
मतदाताओं को दोबारा मतदान के लिए प्रेरित करनाः लूला की वापसी का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू मतदान में अधिक लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने की कोशिश थी। पहले दौर में करीब 3.34 करोड़ मतदाता मतदान करने नहीं पहुंचे थे। अनुपस्थित रहने वाले मतदाताओं की संख्या कुल मतदाताओं की लगभग 21 प्रतिशत थी। लूला के अभियान ने ऐसे मतदाताओं को दोबारा मतदान के लिए प्रेरित करने पर ध्यान दिया। चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में कामकाजी वर्ग और निम्न आय वाले परिवारों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता दी गई।
विश्लेषकों के मुताबिक, दूसरे दौर में मतदान से दूर रहने वाले मतदाताओं की वापसी ने मुकाबले का परिणाम बदलने में भूमिका निभाई हो सकती है। हालांकि, जीत के पीछे किसी एक कारण को निर्णायक मानने के बजाय आर्थिक मुद्दों, मतदाता भागीदारी और राजनीतिक ध्रुवीकरण को एक साथ देखना जरूरी है।

ट्रंप के लिए क्यों है यह बड़ा राजनीतिक झटकाः लूला की जीत का महत्व ब्राजील की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं है। इसका असर अमेरिका और लैटिन अमेरिका के राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लैटिन अमेरिका में दक्षिणपंथी नेताओं और अपने वैचारिक सहयोगियों के साथ संबंध मजबूत करने की कोशिश की है। जायर बोल्सोनारो और उनका राजनीतिक परिवार ट्रंप के करीबी सहयोगियों में गिना जाता रहा है। फ्लावियो बोल्सोनारो की जीत इस क्षेत्र में ट्रंप समर्थक दक्षिणपंथी राजनीति को मजबूती दे सकती थी, लेकिन लूला की वापसी ने इस संभावना को झटका दिया है।

लूला ने अपने चुनाव अभियान में ब्राजील की राष्ट्रीय संप्रभुता और विदेशी हस्तक्षेप से स्वतंत्र निर्णय लेने के अधिकार पर जोर दिया। उन्होंने अमेरिका की व्यापार नीति और ब्राजील के आंतरिक मामलों पर वाशिंगटन के दबाव की आलोचना की। ट्रंप प्रशासन ने ब्राजील के उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगाए थे। इन कदमों का संबंध जायर बोल्सोनारो के खिलाफ कानूनी कार्रवाई को लेकर अमेरिका की नाराजगी से भी जुड़ा रहा। लूला ने इसे ब्राजील पर दबाव बनाने की कोशिश के रूप में पेश किया।
इसलिए उनकी जीत ऐसे समय में हुई है, जब लैटिन अमेरिका के कई देशों में दक्षिणपंथी राजनीति का प्रभाव बढ़ रहा है। ब्राजील और मेक्सिको जैसे क्षेत्र के बड़े देशों में वामपंथी या वाम-मध्यपंथी नेतृत्व का बने रहना अमेरिकी प्रभाव के विस्तार की रणनीति को जटिल बना सकता है।

चौथी पारी में लूला के सामने होंगी बड़ी चुनौतियां

चुनाव जीतना लूला के लिए बड़ी उपलब्धि है, लेकिन उनकी अगली पारी आसान नहीं होगी। ब्राजील की अर्थव्यवस्था, सुरक्षा व्यवस्था और राजनीतिक संस्थाओं से जुड़ी कई समस्याएं उनकी सरकार की परीक्षा लेंगी।
1. संसद में बहुमत का अभाव
लूला की पार्टी को संसद में अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं है। हालिया विधायी चुनावों में दक्षिणपंथी ताकतों की स्थिति मजबूत हुई है। पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो की लिबरल पार्टी प्रतिनिधि सभा में सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरी है। ऐसे में लूला को सामाजिक कल्याण, श्रम सुधार और आर्थिक नीतियों से जुड़े विधेयकों को पारित कराने के लिए मध्यमार्गी और केंद्र-दक्षिणपंथी दलों के साथ समझौते करने पड़ सकते हैं।
2. सरकारी कर्ज और आर्थिक दबाव
ब्राजील सरकार के सामने राजकोषीय घाटे और सार्वजनिक कर्ज की समस्या भी है। सरकार का खर्च उसकी आय से अधिक रहने, ऊंची ब्याज दरों और महंगाई के दबाव के कारण आर्थिक नीतियां बनाना मुश्किल हो सकता है। एक तरफ लूला सामाजिक सहायता योजनाओं और गरीब परिवारों के लिए राहत को जारी रखना चाहते हैं, दूसरी तरफ वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए सरकारी खर्च और राजस्व के बीच संतुलन जरूरी होगा। यदि सरकार खर्च में कटौती करती है, तो उसके लोकप्रिय कल्याणकारी कार्यक्रम प्रभावित हो सकते हैं। लेकिन यदि वित्तीय दबाव बढ़ता है, तो निवेश और आर्थिक विकास पर भी असर पड़ सकता है।

3. अपराध और सार्वजनिक सुरक्षा

ब्राजील में अपराध, हिंसा और संगठित आपराधिक गिरोहों का प्रभाव चुनाव के प्रमुख मुद्दों में शामिल रहा। फ्लावियो बोल्सोनारो ने अपराध के खिलाफ कठोर कार्रवाई का वादा किया था। अब लूला पर दबाव होगा कि वह सुरक्षा व्यवस्था में ठोस सुधार दिखाएं। उन्हें आपराधिक गिरोहों और उन सशस्त्र समूहों से निपटने की चुनौती का सामना करना होगा, जिनका कुछ शहरी इलाकों में प्रभाव है।

4. अमेरिका के साथ संबंधों में संतुलन

लूला को एक तरफ ब्राजील की संप्रभुता और स्वतंत्र विदेश नीति की रक्षा करनी होगी, दूसरी तरफ अमेरिका के साथ व्यापार और कूटनीतिक संबंध भी संभालने होंगे। ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीति, लैटिन अमेरिका में बढ़ता अमेरिकी प्रभाव और दोनों देशों के बीच वैचारिक मतभेद आने वाले समय में रिश्तों को प्रभावित कर सकते हैं। लूला के सामने चुनौती होगी कि वह अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं से समझौता किए बिना व्यावहारिक कूटनीति अपनाएं।