चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के सबसे वरिष्ठ जनरल झांग यौशिया (75 वर्ष) को राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व वाली सेंट्रल मिलिट्री कमीशन (सीएमसी) के संयुक्त उपाध्यक्ष पद से हटा दिया गया है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, उन पर चीन के परमाणु हथियार कार्यक्रम की संवेदनशील जानकारी अमेरिका को लीक करने का गंभीर आरोप लगा है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि झांग यौशिया पर यह भी आरोप है कि उन्होंने रिश्वत ली, जिसमें पूर्व रक्षा मंत्री की नियुक्ति के लिए रिश्वत शामिल है, साथ ही राजनीतिक गुटबंदी बनाकर प्रभाव बढ़ाने का प्रयास किया। चीन में "गंभीर अनुशासन और कानून उल्लंघन" का आधिकारिक शब्द आमतौर पर भ्रष्टाचार के लिए इस्तेमाल होता है।

झांग यौशिया, जो राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बचपन के दोस्त और सबसे विश्वसनीय सहयोगी माने जाते थे, पिछले तीन वर्षों में चल रही सैन्य नेतृत्व की व्यापक सफाई में अब तक के सबसे वरिष्ठ अधिकारी हैं। सीएमसी, जो पीएलए की समग्र रक्षा प्रशासन की जिम्मेदारी संभालती है और जिसके प्रमुख खुद शी जिनपिंग हैं, अब अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। उसके सात पदों में से केवल दो ही भरे हुए हैं, बाकी सभी पर लोग हटाए जा चुके हैं।

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वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार, यह जानकारी एक उच्च-स्तरीय आंतरिक ब्रीफिंग से आई है। जिसमें वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को बताया गया कि पूर्व चीन नेशनल न्यूक्लियर कॉर्पोरेशन के प्रमुख गु जून की जांच से परमाणु क्षेत्र में सुरक्षा उल्लंघन का खुलासा हुआ। जिसमें झांग का कथित तौर पर संबंध था। हालांकि, लीक की विशिष्ट जानकारी, जैसे क्या डेटा साझा किया गया या पूरा मामला कैसे हुआ, सार्वजनिक नहीं की गई है।

यह घटना शी जिनपिंग के सैन्य में भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जिसमें पिछले वर्षों में कई पूर्व रक्षा मंत्रियों और शीर्ष जनरलों को बर्खास्त किया जा चुका है। विश्लेषकों का मानना है कि इन कार्रवाइयों के पीछे भ्रष्टाचार के अलावा आंतरिक राजनीति और वफादारी के मुद्दे भी हो सकते हैं।

झांग यौशिया 1968 में सेना में शामिल हुए थे और 1979 के चीन-वियतनाम युद्ध में वास्तविक युद्ध अनुभव रखते हैं। वे सीएमसी के वाइस चेयरमैन के रूप में शी के सबसे करीबी सैन्य सहयोगी थे।

चीन की रक्षा मंत्रालय ने शनिवार को झांग यौशिया और सीएमसी के जॉइंट स्टाफ डिपार्टमेंट के चीफ ऑफ स्टाफ लियू झेनली (61 वर्ष) के खिलाफ जांच की आधिकारिक घोषणा की थी, लेकिन परमाणु लीक का आरोप सार्वजनिक रूप से नहीं बताया गया। यह घटना चीन की तेजी से बढ़ती परमाणु क्षमता के समय में आई है, जहां अमेरिका और अन्य देशों के साथ तनाव बढ़ रहा है।

अमेरिका-चीन परमाणु टेंशन

अमेरिका-चीन परमाणु तनाव दुनिया के दो सबसे बड़े सैन्य शक्तियों के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है। इसका संबंध चीन के तेजी से बढ़ते परमाणु हथियारों के भंडार पर केंद्रित है। 2026 की शुरुआत में, चीन के पास लगभग 600 से अधिक ऑपरेशनल परमाणु वारहेड्स हैं, और पेंटागन तथा SIPRI के अनुमानों के अनुसार यह संख्या 2030 तक 1,000 से अधिक हो सकती है। चीन अपनी परमाणु त्रिकोण (भूमि, समुद्र और वायु) को मजबूत कर रहा है, जिसमें नए ICBM साइलो, JL-3 SLBM और उन्नत डिलीवरी सिस्टम शामिल हैं। हालांकि चीन आधिकारिक तौर पर "नो-फर्स्ट-यूज" नीति का दावा करता है, लेकिन अमेरिकी आकलन में संभावित अस्पष्टताएं और लॉन्च-ऑन-वार्निंग पोस्चर की संभावना जताई गई है।


यह विस्तार ताइवान जलडमरूमध्य जैसे फ्लैशपॉइंट्स के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, जहां चीन की बढ़ती दूसरी क्षमता अमेरिकी हस्तक्षेप को रोकने के लिए इस्तेमाल हो सकती है। 2026 में न्यू START संधि (अमेरिका-रूस के बीच अंतिम प्रमुख परमाणु नियंत्रण समझौता) की समाप्ति फरवरी में हो रही है, जिससे बिना किसी बाधा के परमाणु विस्तार का खतरा बढ़ गया है। इससे तीन-तरफा (अमेरिका, रूस, चीन) हथियार दौड़ की आशंका है, जो पारंपरिक द्विपक्षीय मॉडल को जटिल बना रही है।

तनाव को और बढ़ाने वाली घटना जनरल झांग यौशिया पर लगे आरोप हैं, जिन्हें जनवरी 2026 में परमाणु कार्यक्रम की संवेदनशील जानकारी अमेरिका को लीक करने, रिश्वत लेने और राजनीतिक गुटबंदी के लिए जांच के दायरे में लिया गया है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, यह PLA में चल रही व्यापक बदलाव का हिस्सा है। हालांकि चीन ने इसे भ्रष्टाचार के रूप में फ्रेम किया है, लेकिन ये आरोप पारस्परिक अविश्वास को बढ़ा सकते हैं।

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कुल मिलाकर, 2026 में अमेरिका-चीन संबंधों में तनावपूर्ण स्थिरता बनी हुई है, लेकिन परमाणु जोखिमों पर कोई ठोस संवाद नहीं हो रहा है। विशेषज्ञों (जैसे स्टिमसन सेंटर, CSIS, RAND) का मानना है कि आधुनिकीकरण, गलतफहमी और दुर्घटना की संभावना बढ़ रही है, खासकर ताइवान या इंडो-पैसिफिक संकट में। जोखिम कम करने के उपायों की जरूरत है, लेकिन चीन त्रिपक्षीय वार्ता से इनकार कर रहा है, जिससे बहुपक्षीय परमाणु परिदृश्य और जटिल हो रहा है।