ईरान और अमेरिका के अधिकारियों की तरफ से 'ड्राफ्ट मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग' (एमओयू ड्राफ्ट) को लेकर बिल्कुल अलग-अलग और विरोधाभासी दावे किए जा रहे हैं। 'फ्रीज एसेट्स' को जारी करने की शर्तों पर मामला लटक सकता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ एक ऐतिहासिक शांति समझौते को "पूरी तरह संपन्न" (Now Complete) घोषित किए जाने के ठीक बाद, इस समझौते के नियमों को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच बड़े मतभेद उभर आए हैं। दोनों देशों के अधिकारियों की तरफ से एक 'ड्राफ्ट मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग' (सहमति पत्र के मसौदे) को लेकर बिल्कुल अलग-अलग और विरोधाभासी दावे किए जा रहे हैं। विवाद की मुख्य जड़ ईरान के अरबों डॉलर के 'फ्रीज एसेट्स' (जब्त पड़े फंड) को जारी करने की शर्तों पर टिकी है। रॉयटर्स का कहना है कि समझौते की शर्तें धीरे-धीरे सामने आ रही हैं।
ईरान का दावा: सबसे पहले प्रतिबंधों और फंड पर बात
ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया कि इस अंतिम मसौदे में तेहरान के परमाणु कार्यक्रम, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) को फिर से खोलने और ईरान के तेल प्रतिबंधों पर अमेरिकी छूट (Sanctions Waivers) जैसे कई अहम मुद्दे शामिल हैं। इस समझौते पर दोनों पक्षों की सहमति के बाद अगले 60 दिनों तक अंतिम बातचीत की जाएगी।ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची के दावे
ईरान की मेहर न्यूज एजेंसी के अनुसार, वहां के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने इस बातचीत का ब्योरा देते हुए दावा किया कि:
- पहले चरण में नौसैनिक नाकेबंदी खत्म करना: समझौते के 14-सूत्रीय मसौदे में अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी को हटाना पहला एजेंडा है, जबकि परमाणु कार्यक्रम को बातचीत के दूसरे चरण में डाल दिया गया है।
- 25 अरब डॉलर का फंड: ईरान का दावा है कि अमेरिका उसके 25 अरब डॉलर के फ्रीज पड़े फंड को जारी करने पर सहमत हुआ है, जिसमें डायरेक्ट कैश ट्रांसफर और क्रेडिट लाइन शामिल हैं।
- अग्रिम भुगतान (Advance Payment): ईरानी मीडिया के मुताबिक, अंतिम चरण की बातचीत शुरू होने से ठीक पहले अमेरिका ईरान को 12 अरब डॉलर की राशि एडवांस के रूप में देगा। इसके अलावा, ईरान के पुनर्निर्माण के लिए अमेरिका और उसके सहयोगियों को कम से कम 300 अरब डॉलर की योजनाएं पेश करनी होंगी।
अमेरिका का कड़ा रुख: "बिना काम के एक भी डॉलर नहीं"
ईरान के इन दावों के सामने आते ही अमेरिकी प्रशासन और व्हाइट हाउस के सूत्रों ने इन रिपोर्टों को सिरे से खारिज कर दिया है। 'एक्स' पर एक्सियोस (Axios) के पत्रकार बराक राविद ने व्हाइट हाउस और वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से लिखा कि ईरान का एडवांस पेमेंट का दावा पूरी तरह झूठ है।
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार:
- पे-फॉर-परफॉर्मेंस (Pay-for-Performance): यह समझौता पूरी तरह इस शर्त पर टिका है कि "पहले ईरान अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करे, तभी उसे कोई राहत मिलेगी।"
- शर्तों के बिना कोई फंड नहीं: बातचीत के शुरुआती 60 दिनों के भीतर ईरान को बिना किसी शर्त के अपने फ्रीज फंड का इस्तेमाल करने की इजाजत बिल्कुल नहीं दी जाएगी। जब तक ईरान जमीनी स्तर पर वादों को पूरा नहीं करता, तब तक कोई फंड जारी नहीं होगा।
समझौते के बीच अविश्वास की खाई
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जहां इसे अपनी विदेश नीति की एक बड़ी जीत के रूप में देख रहे हैं, वहीं दोनों देशों के बयानों में यह भारी अंतर साफ दिखाता है कि इस शांति समझौते की राह अभी भी बेहद जटिल है। ईरान जहां घरेलू मोर्चे पर इसे अपनी आर्थिक और कूटनीतिक जीत की तरह पेश कर रहा है, वहीं ट्रंप प्रशासन अमेरिकी जनता और सहयोगियों को यह संदेश दे रहा है कि वे ईरान पर ढिलाई नहीं बरत रहे हैं। आने वाले 60 दिन इस समझौते के भविष्य के लिए बेहद नाजुक और निर्णायक होने वाले हैं।दुश्मन ने हार मानी, सरेंडर कियाः ईरान
सोमवार को ईरान की सेना ने कहा कि उसने अमेरिका और इmराइल को "झुका दिया" है। यह बयान संघर्ष को तुरंत खत्म करने के समझौते की घोषणा के बाद जारी किया गया। AFP की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी टेलीविज़न पर प्रसारित बयान में जनरल स्टाफ़ ने कहा कि ईरानी सेनाओं ने "अमेरिकी और ज़ायोनी (इसराइली) दुश्मनों पर अपनी मज़बूत इच्छाशक्ति थोपकर यह मज़बूती से साबित कर दिया है कि दुश्मन के पास हार मानने और सरेंडर करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है।"