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फाइल फोटो

अमेरिका, यूरोप के देशों में कोरोना फिर बढ़ा; सचेत नहीं हुए तो...

दुनिया के कई देशों में कोरोना का ख़तरा फिर से बढ़ रहा है। अमेरिका के कई राज्यों में हालात इतने ख़राब हो रहे हैं जितने पिछले साल भी नहीं थे। 15 राज्यों में पिछले साल से ज़्यादा आईसीयू बेडों पर कोरोना संक्रमित मरीज़ भर्ती हैं। यूरोप के देशों में तो नयी लहर से स्थिति गंभीर होती जा रही है। कई देशों में लॉकडाउन जैसे प्रतिबंध लगाए गए हैं और सरकार के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ लोग सड़कों पर उतर आए हैं। कई जगहों पर हिंसा हुई है। यूरोप के इन अधिकतर देशों में आधी आबादी से ज़्यादा को वैक्सीन लगाई जा चुकी है। तो क्या कोरोना का ख़तरा अभी टला नहीं है और भारत को भी सचेत होने की ज़रूरत है?

दुनिया के कई देशों में तो कोरोना के मौजूदा हालात यही संकेत देते हैं। 

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अमेरिका में स्वास्थ्य और मानव सेवा विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 15 राज्यों में पुष्टि या संदिग्ध कोविड के मरीज एक साल पहले की तुलना में अधिक आईसीयू बेड पर भर्ती हैं। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार आँकड़े बताते हैं कि कोलोराडो, मिनेसोटा और मिशिगन में कोरोना रोगियों से आईसीयू बेड के 41 प्रतिशत, 37 प्रतिशत और 34 प्रतिशत भरे हुए हैं। 

पूरे अमेरिका में हर रोज़ अब फिर से 74 हज़ार से ज़्यादा संक्रमण के मामले आ रहे हैं। पिछले हफ़्ते ही 1 लाख 10 हज़ार से ज़्यादा संक्रमण के मामले आए थे। 19 नवंबर को क़रीब 1300 मरीज़ों की मौत हुई थी। 

यूरोप में तो और भी बुरे हालात हैं। वहाँ हर रोज़ क़रीब तीन लाख कोरोना संक्रमण के नये मामले सामने आ रहे हैं। हर रोज़ क़रीब 3400 लोगों की मौतें भी हो रही हैं। सिर्फ़ यूरोप में ही 65 लाख से ज़्यादा कोरोना के सक्रिय मामले हैं। इंग्लैंड में हर रोज़ 44 हज़ार से ज़्यादा मामले आ रहे हैं। 

जर्मनी में 40 हज़ार, रूस में 35 हज़ार, नीदरलैंड्स में 23 हज़ार, बेल्जियम व ऑस्ट्रिया में 13-13 हज़ार हर रोज़ पॉजिटिव केस आ रहे हैं। इसी कारण कई देशों में नये सिरे से पाबंदियाँ लगाई जा रही हैं।

कोरोना के मामले बढ़ने पर लॉकडाउन जैसी पाबंदियाँ लगाई गई हैं। कुछ देशों में तो इसलिए विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं कि बिना वैक्सीन लगाए लोगों पर पाबंदी क्यों लगाई जा रही है। ये वे देश हैं जहाँ की आधी से ज़्यादा आबादी वैक्सीन लगवा चुकी है, लेकिन अब ख़बरें आ रही हैं कि बाक़ी लोग वैक्सीन लगवाने के इच्छुक नहीं हैं और उनमें टीके के प्रति हिचक है। 

जिन देशों में बड़े पैमाने पर ऐसे विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं उनमें बेल्जियम, नीदरलैंड्स, ऑस्ट्रिया, क्रोएशिया और इटली जैसे देश शामिल हैं।

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हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि वह महाद्वीप पर बढ़ते कोरोनावायरस मामलों के बारे में बेहद चिंतित है। यह चेतावनी तब आई है जब कई देशों में रिकॉर्ड-उच्च संक्रमण दर है और इसे नियंत्रित करने के लिए पूर्ण या आंशिक लॉकडाउन लगाए गए हैं।

ऐसे हालात उन देश में हैं जहाँ कोरोना वैक्सीन सबसे ज़्यादा लगाई गई है। स्पेन में वयस्क आबादी के 80 फ़ीसदी लोगों को दोनों खुराक लग गई है। इटली में 73 फ़ीसदी, नीदरलैंड्स में 73 फ़ीसदी, फ्रांस, यूके, जर्मनी व ऑस्ट्रिया में 64 फ़ीसदी से ज़्यादा आबादी को टीके लगाए जा चुके हैं। हालाँकि रूस इस मामले में पीछे है और उसकी वयस्क आबादी के सिर्फ़ 37 फ़ीसदी लोगों को ही टीके लगे हैं। 

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इससे समझा जा सकता है कि जहाँ इतनी बड़ी आबादी को टीके लगने के बाद भी संक्रमण नियंत्रित नहीं है तो फिर भारत जैसे देशों के लिए यह कितनी ख़तरनाक स्थिति हो सकती है। साफ़ है कि न तो टीके लगाने में लापरवाही बरतने और न ही सोशल डिस्टेंसिंग व मास्क जैसे बचाव के उपाय को छोड़ने का ख़तरा उठाया जा सकता है। 
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