जिस जमात-ए-इस्लामी ने शेख हसीना सरकार के खिलाफ बड़ा आंदोलन खड़ा किया, वही चुनाव में अपेक्षित सफलता क्यों नहीं पा सकी? बांग्लादेश की सियासत और मतदान नतीजों का विश्लेषण पढ़िए।
बांग्लादेश के जिन छात्र संगठनों और जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व ने शेख हसीना सरकार को उखाड़ फेंका, उसके ही गठबंधन को चुनाव में बड़ा झटका लगा। क़रीब दो दशक तक निर्वासन में रहे और चुनाव से ऐन पहले देश लौटे तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बीएनपी को दो-तिहाई बहुमत मिला है। जमात-ए-इस्लामी को उम्मीद से बहुत कम सफलता मिली। चुनाव से पहले जमात ने बहुत आत्मविश्वास दिखाया था और कई लोग सोच रहे थे कि यह पार्टी आजादी के बाद अपनी सबसे बड़ी जीत हासिल कर सकती है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नतीजे आने के बाद जमात ने चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाए और कहा कि वे परिणामों से संतुष्ट नहीं हैं। तो सवाल है कि आख़िर जमात-ए-इस्लामी के साथ क्या हुआ और क्यों उसकी उम्मीदें टूटीं?
जमात-ए-इस्लामी, शेख हसीना सरकार को गिराने में अहम भूमिका निभाने वाले छात्र संगठनों और अन्य दलों के गठबंधन की ऐसी हालत तब हुई जब चुनाव से पहले इसके पक्ष में माहौल था। 2024 के जुलाई में छात्रों के आंदोलन ने शेख हसीना की अवामी लीग सरकार को गिरा दिया था। जमात उस आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाली पार्टियों में से एक थी। शेख हसीना की अवामी लीग पर चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी गई, इसलिए राजनीतिक मैदान में जमात को बड़ा मौक़ा दिखा। कई सालों बाद जमात मुख्यधारा की राजनीति में वापस आई और संगठन मज़बूत करने में लग गई।
जमात ने पूरा जोर लगा दिया
जमात पार्टी ने कहा था कि वे सिर्फ़ हिस्सा नहीं लेंगी, बल्कि सत्ता के लिए लड़ेंगी। उनके नेता शफीकुर रहमान ने महिलाओं और पुरुषों को साथ लेकर नया बांग्लादेश बनाने की बात की। उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा, भ्रष्टाचार ख़त्म करने और न्याय-आधारित समाज का वादा किया। जमात ने अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर भी जोर दिया और पहली बार हिंदू उम्मीदवार उतारा। पार्टी ने खुद को फासीवाद-विरोधी बताया। चुनाव से पहले ढाका में कई विश्लेषक कह रहे थे कि जमात का प्रदर्शन आज़ादी के बाद सबसे अच्छा हो सकता है। लेकिन चुनाव परिणाम निराशाजनक रहे।
नतीजे क्यों निराशाजनक रहे?
चुनाव के नतीजों में बीएनपी ने गठबंधन सहयोगियों के साथ 212 सीटें जीतीं, जबकि जमात और उसके 11-पार्टी गठबंधन को 77 सीटें मिलती दिख रही हैं। जमात को अकेले करीब 68-70 सीटें मिलती दिख रही हैं। यह जमात के लिए अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन है, लेकिन उम्मीदों से बहुत कम। पार्टी ने हार मान ली, लेकिन शुक्रवार को बयान जारी कर कहा कि चुनावी परिणाम प्रक्रिया में गड़बड़ी है। उन्होंने वोट गिनती में फर्जीवाड़ा और प्रशासन के एक हिस्से पर पक्षपात का आरोप लगाया।
जमात की कमी कहाँ रह गई?
शेख हसीना सरकार के ख़िलाफ़ आंदोलन के बाद जमात को संगठन का फायदा था। तारिक रहमान की चुनाव में एंट्री देर से हुई, इसलिए कुछ इलाकों में जमात ने समर्थन जुटाया। लेकिन जैसे-जैसे चुनाव तेज हुआ, वोटर जमात से दूर हो गए। कहा जा रहा है कि 2024 के आंदोलन के युवा यानी ज़ेन -जेड वोटरों ने जमात की बजाय बीएनपी को चुना। युवा जमात के कट्टर इस्लामी विचारों से डरते थे।
जमात को उम्मीद थी कि महिलाएं उनके पक्ष में आएंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हिंदू और अन्य अल्पसंख्यक समुदाय बीएनपी के साथ खड़े रहे। जमात के इतिहास में 1971 के युद्ध में पाकिस्तान का साथ देने और अल-बद्र, रजाकार जैसे समूहों के आरोपों ने अल्पसंख्यकों को दूर रखा।
अवामी लीग के वोटर बीएनपी के साथ गए
जमात को लग रहा था कि अवामी लीग के पुराने समर्थक उसकी तरफ़ आएँगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अवामी लीग के पुराने समर्थक बीएनपी की तरफ चले गए, जमात की तरफ नहीं।अमेरिका वाला विवाद का असर
चुनाव से पहले वाशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट में अमेरिकी राजनयिकों के जमात से संपर्क की बात आई थी। बीएनपी ने इसे अमेरिका से गुप्त समझौता बताकर हमला किया। इससे जमात की छवि खराब हुई और लोग सवाल उठाने लगे कि पार्टी देश की संप्रभुता के लिए खतरा तो नहीं।
पुरानी छवि और कट्टरवाद का डर
जमात 1941 में मौलाना मौदूदी ने बनाई थी। 1971 के स्वतंत्रता संग्राम में पाकिस्तान का साथ दिया और हिंदुओं पर हमलों के आरोप लगे। उसकी छवि कट्टरपंथी पार्टी की बनी। इस पर प्रतिबंध भी लगा। 2013 में हाई कोर्ट ने पार्टी का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया था। हसीना सरकार में कई नेता सजा पाए या फांसी हुई। पार्टी ने कोशिश की कि खुद को नरम दिखाए, लेकिन पुरानी छवि लोगों के मन में बनी रही। शरिया कानून, महिलाओं के अधिकारों पर जमात के पुराने बयान और इसके छात्र विंग की हिंसा लोगों को अभी भी याद है।
जमात ने क्या कहा?
बहरहाल, चुनाव नतीजों के बाद जमात ने हार मानी, लेकिन परिणामों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कई जगह उनके उम्मीदवार संदिग्ध तरीके से हारे, वोटर टर्नआउट के आँकड़े नहीं आए और प्रशासन ने एक पार्टी का साथ दिया। हालाँकि पार्टी ने शांति बनाए रखने की अपील की और कहा कि वे लोकतंत्र का सम्मान करेंगे।
जमात-ए-इस्लामी के लिए यह चुनाव ऐतिहासिक था क्योंकि वह मुख्य विपक्षी दल बनी है। ढाका में पहली बार सीटें जीतीं। लेकिन बीएनपी की भारी जीत से जमात सत्ता से दूर रह गई। पार्टी की कट्टर छवि, पुराने इतिहास और वोटरों का बीएनपी की तरफ झुकाव मुख्य वजह बनी। अब बांग्लादेश में तारिक रहमान की सरकार बनेगी और जमात विपक्ष की भूमिका निभाएगी।