डोनाल्ड ट्रंप यदि अमेरिका को महान बनाने में जुटे हैं तो उसके सहयोगी भी चीन के साथ क्यों जा रहे हैं? कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कुछ दिन पहले ही बीजिंग का दौरा किया। दोनों देशों ने बड़े सौदे किए। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे म्युंग ने भी हाल में बीजिंग का दौरा किया। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर जनवरी में बीजिंग जाने वाले हैं। जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज भी अगले महीने चीन जाएंगे। भारत सहित दुनिया के कई देश हैं जिनके व्यापार अब अमेरिका से कम हो रहे हैं और चीन के साथ बढ़ रहे हैं। पश्चिमी देशों के ही कई सर्वे बताते हैं कि ज्यादातर लोगों को लगता है कि अगले दशक में चीन का प्रभाव बढ़ेगा। कई देश चीन को सहयोगी या ज़रूरी साझेदार मानते हैं। यह सब तब हो रहा है जब ट्रंप ने टैरिफ़ के माध्यम से आक्रामक नीति अपना रखी है। अमेरिका को महान बनाने के नाम पर। तो अब ट्रंप की नीतियों से अमेरिका महान बन रहा है या चीन? और इस वैश्विक बदलाव में भारत कहाँ खड़ा है?

दरअसल, ट्रंप की आक्रामक नीतियों से बचने के लिए कई देश चीन से दोस्ती बढ़ा रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का दूसरा कार्यकाल शुरू हुए एक साल हो गया है। इस दौरान उन्होंने सैकड़ों आदेश जारी किए, व्यापार युद्ध छेड़ा, कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अमेरिका को बाहर निकाला, बड़े पैमाने पर लोगों को देश से निकाला और यमन, ईरान तथा नाइजीरिया पर बमबारी की। इतना ही नहीं, वह वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उनके घर से उठवाकर न्यूयॉर्क में मुकदमा चलाने के लिए ले आए। तो पूरी दुनिया को नाराज़ कर आख़िर ट्रंप अमेरिका के लिए क्या हासिल कर रहे हैं?

ट्रंप का MAGA

ट्रंप ने अपने चुनावी नारे 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' यानी MAGA पर जीत हासिल की, लेकिन उनके फैसलों से लगता है कि चीन और मज़बूत हो रहा है। ट्रंप ने चीन को अलग-थलग करने की कोशिश की, व्यापार पर पाबंदी लगाई और तकनीक हस्तांतरण रोका। लेकिन नतीजा उल्टा हुआ। 2025 के आखिर में चीन का व्यापार सरप्लस रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जो दुनिया की 20वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के जीडीपी के बराबर है। व्यापार सरप्लस का मतलब है निर्यात ज्यादा और आयात कम होना।

चीन फायदे में कैसे?

चीन की अर्थव्यवस्था 5% की दर से बढ़ी, जो उनका लक्ष्य था। घरेलू खर्च बढ़ाने में मुश्किलों और प्रॉपर्टी संकट के बावजूद व्यापार से मिले फायदे ने चीन को मजबूत किया। चीन ने दुनिया के बाकी देशों के साथ बेहतर रिश्ते बनाए।

ट्रंप की आक्रामक नीतियों से बचने के लिए कई देश चीन से दोस्ती बढ़ा रहे हैं। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने हाल ही में बीजिंग का दौरा किया। इसे बेहद अहम बताया जा रहा है। वहां चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ 'नई रणनीतिक साझेदारी' की शुरुआत हुई।

चीन ने कनाडाई कैनोला बीज और समुद्री उत्पादों पर टैरिफ कम किए, जबकि कनाडा ने 49000 चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों को अपने बाजार में आने दिया। यह दौरा लगभग एक दशक बाद हुआ। 2017 में जस्टिन ट्रूडो के बाद कोई कनाडाई पीएम चीन नहीं गया था।

इसी तरह, दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे म्युंग ने जनवरी में बीजिंग का दौरा किया। यह 2019 के बाद पहला दौरा था। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर जनवरी में जाने वाले हैं, जो 2018 के बाद पहला दौरा होगा। जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज भी अगले महीने चीन जाएंगे। ये दौरे दिखाते हैं कि ट्रंप की वजह से देश अमेरिका से दूर होकर आपस में साझेदारी बढ़ा रहे हैं।

वैश्विक व्यापार की दिशा ही बदल गई?

ट्रंप ने अमेरिका को वैश्विक व्यापार का नेतृत्व करने वाली भूमिका से पीछे हटा लिया। इसका नतीजा यह हुआ कि सप्लाई चेन बदल रही हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार डीएचएल ग्लोबल कनेक्टेडनेस ट्रैकर की रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक व्यापार की धारा बदल गई है। एशिया, पश्चिम एशिया और अफ्रीका में व्यापार बढ़ रहा है, जबकि अमेरिका का हिस्सा घट रहा है। अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट कहती है कि भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद व्यापार, पूंजी, सूचना और लोगों का वैश्विक प्रवाह ऐतिहासिक ऊंचाई पर है। 2025 की शुरुआत में व्यापार तेजी से बढ़ा, क्योंकि टैरिफ़ बदलने की आशंका से लोग पहले से माल मंगा रहे थे।

दुनिया की राय बदली?

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर टिमोथी गार्टन ऐश की जनवरी 2026 की रिपोर्ट कहती है कि दुनिया के ज्यादातर लोग उम्मीद करते हैं कि अगले दशक में चीन का प्रभाव बढ़ेगा। कई देश चीन को सहयोगी या ज़रूरी साझेदार मानते हैं। अमेरिका अभी भी प्रभावशाली है, लेकिन उसका प्रभाव बढ़ने की उम्मीद कम है। ट्रंप के पहले साल ने राय बदल दी, खासकर भारत और दक्षिण अफ्रीका में। यूरोपीय काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस यानी ईसीएफ़आर के नवंबर 2025 के सर्वे में 21 देशों के 25949 लोगों से पूछा गया। नतीजे बताते हैं कि यूरोप में पश्चिमी एकता टूट रही है। रूसी अब यूरोपीय संघ को अमेरिका से ज़्यादा दुश्मन मानते हैं। यूक्रेन ब्रुसेल्स की तरफ़ ज़्यादा देखता है। ज़्यादातर यूरोपीय अमेरिका को भरोसेमंद साथी नहीं मानते और खुद हथियार बढ़ा रहे हैं।

ट्रंप ने राजनीति में क़दम रखा था अमेरिका को महान बनाने के लिए, लेकिन ईसीएफ़आर का कहना है कि वह अनजाने में 'चीन को महान बना रहे हैं'। दुनिया के लोग चीन को और ताक़तवर होते देख रहे हैं। अमेरिका के दुश्मन अब उससे कम डरते हैं, जबकि सहयोगी अमेरिका से सावधान हो गए हैं।

भारत कहाँ खड़ा है?

ट्रंप की नीतियों से भारत भी प्रभावित हुआ है। अमेरिका ने भारत पर 50% टैरिफ़ लगा दिए, जो चीन से भी ज़्यादा हैं। इससे दोनों देशों के व्यापार और कूटनीतिक रिश्ते बिगड़े। दिसंबर 2025 में भारत के चीन को निर्यात 70% बढ़कर 2 अरब डॉलर हो गए, जबकि अमेरिका को निर्यात 2% घटकर 6.8 अरब डॉलर रह गया। भारत अब वैकल्पिक बाजारों पर ध्यान दे रहा है।

नई दिल्ली ने चीन के साथ रिश्ते सुधारने शुरू कर दिए हैं। सीमा विवाद और रणनीतिक मतभेदों के बावजूद कुछ आसान मुद्दों पर काम हुआ है। लेकिन भारत चाहता है कि चीन रेयर अर्थ मैग्नेट पर पाबंदी हटाने जैसे फ़ैसले लेकर भारतीय कारोबार को जगह दे। तब भारत और छूट देगा। यह बदलाव ट्रंप के कारण है। कहा जा रहा है कि इससे भारत की विदेश नीति संतुलित हो रही है।

कुल मिलाकर, ट्रंप का पहला साल दुनिया को बदल रहा है। सोना और चांदी की क़ीमतें रिकॉर्ड ऊँचाई पर हैं, क्योंकि अनिश्चितता बढ़ी है। पहले रूस यूरोप के लिए ख़तरा था, अब अमेरिका लगता है। दुनिया के देश चीन की ओर देख रहे हैं। तो क्या ट्रंप सच में अमेरिका को महान बना रहे हैं?