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दुनिया में कोरोना का नया ख़तरा; यूरोप में तीसरी लहर!

इटली में फिर से लॉकडाउन लगाया गया है। इस प्रयास में कि कोरोना की तीसरी लहर को रोका जाए। जर्मन सरकार की स्वास्थ्य से जुड़ी एजेंसी रॉबर्ट कोच संस्थान के प्रमुख ने कहा है कि जर्मनी में तीसरी लहर पहले ही शुरू हो गई है। फ्रांस में नवंबर के बाद अब हर रोज़ सबसे ज़्यादा संक्रमण के मामले आ रहे हैं और वहाँ पूरे देश में लॉकडाउन लगाने पर विचार किया जा रहा है। उस तरह से जैसे पिछले साल मार्च-अप्रैल महीने में लगाया गया था। पूरे यूरोप के हालात कैसे हैं इसका अंदाज़ा इसी से लग सकता है कि अब हर रोज़ डेढ़ लाख तक संक्रमण के मामले आने लगे हैं। 

एक दिन पहले 24 घंटे में पूरे यूरोप में 1 लाख 12 हज़ार से ज़्यादा संक्रमण के मामले आए थे और 2500 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई थी। उससे भी एक दिन पहले पूरे यूरोप में 1 लाख 52 हज़ार संक्रमण के मामले आए थे और 2 हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हुई थी। 

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फ्रांस, इटली और पोलैंड जैसे देशों में संक्रमण काफ़ी तेज़ी से बढ़ा है। एक दिन पहले इन देशों में क्रमश: 6400, 15000 और 10000 संक्रमण के मामले आए जबकि इससे भी एक दिन पहले क्रमश: 26 हज़ार 21 हज़ार और 17 हज़ार मामले सामने आए थे। इन तीन देशों के अलावा रूस, इंग्लैंड, स्पेन, जर्मनी, नीदरलैंड्स जैसे देशों में भी संक्रमण काफ़ी तेज़ी से फैला है। 

ऐसे ही हालात के बीच इटली में लॉकडाउन लगाया गया है। ऐसे क़दम उठाए जाने को लेकर शुक्रवार को प्रधानमंत्री मारियो ड्रैगी ने चेतावनी दी कि कोरोनो वायरस के अधिक संक्रामक वेरिएंट यानी नये क़िस्म के कोरोना से इटली 'संक्रमण की नई लहर' का सामना कर रहा है। इटली ही यूरोप का पहला देश था जहाँ सबसे तेज़ी से कोरोना संक्रमण फैला था और सबसे पहले पूरे देश में लॉकडाउन लगाया गया था। 

रॉबर्ट कॉच इंस्टीट्यूट फॉर इंफेक्शयस डिजीज के प्रमुख लोथर विलेर ने शुक्रवार को एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान कहा, 'हमें स्पष्ट संकेत मिले हैं: जर्मनी में तीसरी लहर शुरू हो चुकी है।' 'न्यूयॉर्क टाइम्स' की रिपोर्ट के अनुसार हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान ने भविष्यवाणी की कि अस्पताल के बिस्तर, ऑक्सीज़न मशीनों को आवंटित करने और नर्सों व डॉक्टरों को जुटाने के मामले में महामारी की शुरुआत के बाद से यह सप्ताह सबसे कठिन होगा।

पिछले साल पहली बार जब संक्रमण फैला था तो इतनी स्थिति ख़राब हो गई थी कि कोरोना मरीज़ों को बेड नहीं मिल पा रहे थे और नर्सों और डॉक्टरों की कमी हो गई थी।

ऐसे ही हालात यूरोप में पिछले साल अक्टूबर में हो गए थे। तब यूरोप में दूसरी लहर शुरू हुई थी। कई देशों में लॉकडाउन लगाना पड़ा था, स्कूल, बार-रेस्तराँ बंद करने पड़े थे। कई जगहों पर आपात स्थिति घोषित करनी पड़ी थी। 

europe faces coronavirus third wave as lockdown returns  - Satya Hindi
पहली लहर ख़त्म होने के बाद जब स्थिति सामान्य होने लगी थी तब यूरोप के हालात।फोटो साभार: ट्विटर

जबकि इससे पहले अगस्त-सितंबर में उन देशों में स्थिति इतनी सुधर गई थी कि कुछ देशों में स्कूल-कॉलेज, बार-रेस्तराँ आदि तक खोल दिए गए थे। लोग सामान्य सी ज़िंदगी जीने लगे थे और लोगों ने मास्क उतार फेंका था और सार्वजनिक जगहों पर उस तरह की एहतियात नहीं बरती गई जिस तरह की कोरोना को फैलने से रोकने के लिए होनी चाहिए। यानी लोगों ने ढिलाई बरतनी शुरू कर दी थी। 

अब जब तीसरी लहर आई है तब भी लोगों द्वारा ऐसी ही लापरवाही बरते जाने की ख़बरें आ रही हैं। लोग सामान्य सी ज़िंदगी जीने लगे थे और सभी उम्र के लोग बाहर जाने लगे थे। यही कारण है कि इन कुछ देशों में लॉकडाउन लगा दिया गया है और अब इस पर विचार किया जा रहा है कि फिर से लॉकडाउन लगाया जाए और लोग कोरोना के दिशा-निर्देशों का पालन करें। 

वैसे, यूरोप की चिंताओं से अमेरिका, ब्राज़ील, भारत सहित दुनिया के दूसरे देशों की भी चिंताएँ बढ़ेंगी ही। हर रोज़ संक्रमण के मामले अमेरिका, ब्राज़ील में काफ़ी ज़्यादा आने लगे हैं। इन दोनों देशों में 40-45 हज़ार संक्रमण के मामले आ रहे हैं।

भारत में भी हर रोज़ संक्रमण के मामले बढ़ कर 25 हज़ार के आसपास आने लगे हैं। 

सबसे ज़्यादा संक्रमण के मामले में भी अमेरिका पहले स्थान पर है। वहाँ 3 करोड़ से ज़्यादा संक्रमण के मामले आए हैं और क़रीब साढ़े पाँच लाख लोगों की मौत हो चुकी है। दूसरे स्थान पर ब्राज़ील में 1 करोड़ 15 लाख से ज़्यादा संक्रमण के मामले हैं और 2 लाख 79 हज़ार लोगों की मौतें हुई हैं। भारत में 1 करोड़ 14 लाख संक्रमण के मामले आए हैं और 1 लाख 58 हज़ार मौतें हुई हैं। 

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उम्मीद थी कि कोरोना वैक्सीन आने के बाद हालात संभलेंगे और कोरोना नियंत्रित होगा। लेकिन ऐसा होता हुआ नहीं दिख रहा है। पूरी दुनिया में हर रोज़ साढ़े तीन लाख से ज़्यादा संक्रमण के नये मामले आने लगे हैं। यूरोप के देशों में कोरोना की तीसरी लहर आने का साफ़ संदेश यह है कि सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों की अनदेखी करना अभी भी ख़तरे से खाली नहीं है। 

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