फ्रांस इन दिनों ऐसे छात्र आंदोलन से जूझ रहा है, जिसने राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार को गंभीर राजनीतिक चुनौती के सामने खड़ा कर दिया है। सितंबर के मध्य में पेरिस के आसपास शुरू हुआ हाईस्कूल छात्रों का आंदोलन अब देशव्यापी हो चुका है। शिक्षकों की कमी, भीड़भरी कक्षाएं, जर्जर स्कूल भवन, लंबे स्कूल घंटे, गर्मी में खराब सुविधाएं और शिक्षा में बढ़ती असमानता इस आंदोलन के मुख्य कारण हैं। लेकिन पिछले कुछ दिनों में आंदोलन के हिंसक होने, पुलिस कार्रवाई और राजनीतिक हस्तक्षेप ने इसे शिक्षा के सवाल से आगे बढ़ाकर सरकार की नीतियों के खिलाफ व्यापक असंतोष का रूप दे दिया है।

17 सितंबर से शुरू हुआ था आंदोलन

मौजूदा आंदोलन की शुरुआत 17 सितंबर 2026 को पेरिस के नजदीक Créteil के Saint-Exupéry हाईस्कूल से हुई। वहां छात्रों ने शिक्षकों की कमी और स्कूल में संसाधनों की कमी को लेकर विरोध शुरू किया। शुरुआत में यह स्थानीय आंदोलन था, लेकिन धीरे-धीरे पेरिस के दूसरे इलाकों और फिर पूरे फ्रांस के lycée यानी 15 से 18 वर्ष के छात्रों वाले हाईस्कूलों तक फैल गया।
छात्रों ने स्कूलों के गेट पर बैरिकेड लगाए, कक्षाओं का बहिष्कार किया और स्कूल परिसरों के बाहर धरने शुरू किए। 28 सितंबर को छात्र संगठनों ने देशव्यापी स्कूल ब्लॉकेड का आह्वान किया, जिसके बाद आंदोलन तेजी से फैल गया।

आखिर छात्र सड़कों पर क्यों उतरे?

1. शिक्षकों की भारी कमी
छात्रों की सबसे बड़ी शिकायत है कि स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं। शिक्षक छुट्टी पर जाते हैं तो उनकी जगह कई बार दूसरे शिक्षक नहीं आते। इसका सीधा असर पढ़ाई पर पड़ रहा है। फ्रांस सरकार की अपनी रिपोर्ट के मुताबिक 2024-25 के दौरान सरकारी माध्यमिक स्कूलों में 9.8 प्रतिशत शिक्षण घंटे उपलब्ध ही नहीं हो पाए। इनमें 7.5 प्रतिशत घंटे अनुपस्थित शिक्षकों की जगह शिक्षक नहीं मिलने के कारण और 2.3 प्रतिशत स्कूल बंद रहने के कारण प्रभावित हुए। यानी छात्रों का यह आरोप केवल राजनीतिक नारा नहीं है कि उन्हें नियमित पढ़ाई नहीं मिल रही।
2. 40 छात्रों तक की भीड़भरी कक्षाएं
कई स्कूलों में कक्षाओं में छात्रों की संख्या बहुत अधिक है। छात्रों का कहना है कि जब एक कक्षा में करीब 40 बच्चे हों और शिक्षक भी कम हों तो व्यक्तिगत ध्यान और पढ़ाई की गुणवत्ता दोनों प्रभावित होते हैं। खास तौर पर पेरिस के गरीब उपनगरों में यह समस्या अधिक गंभीर बताई जा रही है। समाजशास्त्री वैलेरी बेक ने कहा है कि कम आय वाले इलाकों के हाईस्कूल छात्र महसूस कर रहे हैं कि उन्हें अपेक्षाकृत कमजोर शिक्षा मिल रही है। 
3. जर्जर स्कूल और खराब बुनियादी सुविधाएं
यह आंदोलन केवल शिक्षकों की नियुक्ति का मामला नहीं है। कई छात्रों ने स्कूल भवनों की खराब हालत का मुद्दा उठाया है।
कुछ स्कूलों में लीकेज, जर्जर छत, खराब इमारतें और कीड़े-मकौड़ों की समस्या तक की शिकायतें सामने आई हैं। जून में आई गर्मी की लहर ने समस्या को और उजागर कर दिया। कई कक्षाओं में एयर-कंडीशनिंग नहीं थी और इमारतों में गर्मी रोकने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी। The Guardian
कुछ छात्रों ने बताया कि उन्हें 35 से 40 डिग्री सेल्सियस तापमान में परीक्षाएं देनी पड़ीं।
4. सुबह 8 से शाम 6 बजे तक स्कूल- लेकिन पढ़ाई की गुणवत्ता?
छात्रों की एक बड़ी शिकायत स्कूल के लंबे घंटों को लेकर भी है। कई छात्र सुबह लगभग 8 बजे से शाम 6 बजे तक स्कूल में रहते हैं। आंदोलन में शामिल छात्रों का सवाल है कि यदि स्कूल में इतने लंबे समय तक पढ़ाया जा रहा है, तो शिक्षा के परिणाम लगातार कमजोर क्यों हो रहे हैं? यानी छात्रों का तर्क है कि समस्या केवल कितने घंटे पढ़ाया जा रहा है नहीं बल्कि किन परिस्थितियों में पढ़ाया जा रहा है भी है। 
5. शिक्षा में बढ़ती असमानता
आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक असमानता है। पेरिस के अपेक्षाकृत समृद्ध इलाकों और गरीब उपनगरों के स्कूलों के बीच संसाधनों का अंतर लंबे समय से चर्चा में है। छात्रों और कुछ स्थानीय नेताओं का आरोप है कि गरीब इलाकों के बच्चों को कम संसाधन, अधिक भीड़ और कम स्टाफ वाले स्कूल मिलते हैं। इसलिए आंदोलन केवल "बेहतर स्कूल" की मांग नहीं कर रहा बल्कि समान शिक्षा के अधिकार का सवाल भी उठा रहा है।

फिर बजट का मुद्दा क्यों इतना महत्वपूर्ण हो गया?

यही वह बिंदु है जहां छात्र आंदोलन सीधे सरकार की आर्थिक नीतियों से जुड़ गया है। फ्रांस सरकार ने 2027 के बजट में शिक्षा मंत्रालय के लिए करीब 1.2 अरब यूरो अतिरिक्त राशि का प्रस्ताव रखा है। सरकार का कहना है कि कठिन वित्तीय परिस्थितियों के बावजूद शिक्षा बजट बढ़ाया जा रहा है।
लेकिन दूसरी ओर प्रस्ताव में 1,588 स्थायी शिक्षक पद खत्म करने की योजना भी है, जिनमें 1,250 सरकारी स्कूलों से जुड़े पद हैं। सरकार इसका कारण छात्रों की संख्या में कमी को बताती है और कहती है कि 2027 में स्कूलों में लगभग 1.8 लाख कम छात्र होंगे। छात्र और शिक्षक यूनियन इसे अलग नजरिए से देखते हैं—उनका सवाल है कि जब मौजूदा स्कूलों में शिक्षक और संसाधन पहले ही कम हैं, तो पदों में कटौती क्यों? यही विरोधाभास आंदोलन को और हवा दे रहा है।

शिक्षक भी क्यों आंदोलन से जुड़ रहे हैंः छात्रों की मांगें शिक्षकों की मांगों से काफी हद तक मिलती हैं। शिक्षक यूनियनों की शिकायत है कि स्टाफ की कमी, बढ़ता काम का दबाव और वेतन संबंधी समस्याएं लंबे समय से बनी हुई हैं। सरकार के 2027 बजट प्रस्ताव में फिलहाल वेतन बढ़ाने का कोई बड़ा कदम नहीं रखा गया है।इसीलिए मंगलवार को छात्रों के समर्थन में व्यापक प्रदर्शन और हड़ताल की तैयारी है। ट्रेड यूनियनें भी इसमें शामिल होने की तैयारी कर रही हैं।

शांतिपूर्ण शिक्षा आंदोलन हिंसक कैसे हो गया?

यह सवाल अब फ्रांस की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल बन चुका है। शुरुआत में अधिकांश प्रदर्शन स्कूलों के गेट बंद करने, कक्षाओं का बहिष्कार और शांतिपूर्ण धरने तक सीमित थे। लेकिन बाद में कई जगहों पर कूड़ेदानों में आग लगाई गई, पत्थर और पटाखे पुलिस पर फेंके गए और पुलिस ने आंसू गैस तथा अन्य बल प्रयोग किया। 2 अक्टूबर तक करीब 400 हाईस्कूल बंद थे और लगभग 560 स्कूल किसी न किसी रूप में प्रदर्शन से प्रभावित बताए गए थे। 4 अक्टूबर की स्थिति में शिक्षा मंत्री ने कहा कि सोमवार को 400 से 500 स्कूल पूरी तरह या आंशिक रूप से बंद रह सकते हैं क्योंकि सुरक्षा की स्थिति सामान्य नहीं हुई है। 24 स्कूलों के जलाए जाने या तोड़फोड़ से प्रभावित होने और 78 शिक्षा कर्मचारियों के घायल होने की बात भी सरकार ने कही है।

5,000 से ज्यादा गिरफ्तारियां

आंदोलन के दौरान गिरफ्तारियों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। फ्रांस के गृह मंत्रालय के मुताबिक सोमवार से अब तक 5,000 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जिनमें बड़ी संख्या नाबालिगों की है। Reuters के मुताबिक पुलिस अधिकारियों में भी 600 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। इससे एक दूसरा विवाद पैदा हो गया है—क्या नाबालिग छात्रों के खिलाफ पुलिस जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग कर रही है? छात्र संगठनों और कुछ अधिकार समूहों ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार स्वीकार्य है, लेकिन आगजनी, तोड़फोड़ और पुलिस पर हमले बर्दाश्त नहीं किए जा सकते। एक 14 वर्षीय छात्र के पुलिस कार्रवाई में गंभीर रूप से घायल होने के मामले की भी जांच हो रही है।

क्या छात्रों के आंदोलन में बाहरी राजनीतिक ताकतें घुस गई हैं?

यह आंदोलन का सबसे विवादास्पद राजनीतिक पहलू है। फ्रांसीसी सरकार और सुरक्षा अधिकारियों का आरोप है कि कट्टर वामपंथी संगठन और राजनीतिक समूह आंदोलन को अपने हित में इस्तेमाल कर रहे हैं। सरकार का कहना है कि मूल छात्र मांगें जायज हो सकती हैं, लेकिन हिंसक घटनाओं में पेशेवर प्रदर्शनकारी और बाहरी तत्व शामिल हो गए हैं।
दूसरी तरफ वामपंथी नेता ज्यां-ल्यूक मेलोंशों ने छात्रों के आंदोलन का समर्थन किया है और पुलिस कार्रवाई की आलोचना की है। इससे आंदोलन को राजनीतिक रंग मिलने लगा है। हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है—हिंसक घटनाओं में बाहरी तत्वों के शामिल होने का सरकारी आरोप पूरे छात्र आंदोलन की मूल वजहों को खारिज नहीं करता। आंदोलन की शुरुआत जिन मुद्दों से हुई थी—शिक्षकों की कमी, स्कूलों की खराब हालत और शिक्षा में असमानता- वे पहले से मौजूद समस्याएं हैं।
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मैक्रों सरकार के लिए यह संकट क्यों गंभीर है?

इस आंदोलन का समय भी महत्वपूर्ण है। फ्रांस अगले साल राष्ट्रपति चुनाव की ओर बढ़ रहा है और इमैनुएल मैक्रों दोबारा चुनाव नहीं लड़ सकते।
ऐसे समय में यदि युवा मतदाताओं और उनके परिवारों के बीच यह धारणा बनती है कि सरकार शिक्षा व्यवस्था में निवेश नहीं कर रही, तो यह आने वाले चुनाव में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है। आंदोलन पहले ही शिक्षा के सवाल से आगे बढ़कर सरकारी बजट, सार्वजनिक सेवाओं, पुलिस कार्रवाई और सामाजिक असमानता की बहस में बदल चुका है। 

आज सोमवार को फिर 400-500 स्कूल बंद, मंगलवार को बड़ा प्रदर्शन

4 अक्टूबर तक आंदोलन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। सरकार के मुताबिक 5 अक्टूबर को 400 से 500 हाईस्कूल पूरी तरह या आंशिक रूप से बंद रह सकते हैं। इसके बाद मंगलवार को छात्रों और ट्रेड यूनियनों ने नए राष्ट्रव्यापी प्रदर्शनों का आह्वान किया है। सरकार को आशंका है कि यदि बड़ी संख्या में बाहरी राजनीतिक और अराजकतावादी समूह शामिल हुए तो हिंसा फिर बढ़ सकती है।
हिंसा ने आंदोलन को जरूर नया और ज्यादा गंभीर रूप दिया है, लेकिन यदि सरकार केवल पुलिस कार्रवाई से समस्या का समाधान करने की कोशिश करती है तो मूल सवाल वहीं रहेगा—फ्रांस अपने युवाओं को कैसी शिक्षा व्यवस्था देना चाहता है? और यही वजह है कि यह आंदोलन अब मैक्रों सरकार के लिए केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह गया है; यह फ्रांस की सार्वजनिक शिक्षा और आने वाली पीढ़ी के भविष्य पर राजनीतिक जनमत-संग्रह जैसा बनता जा रहा है।