अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को ग़ज़ा और वैश्विक संघर्षों के लिए अपने 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होने का निमंत्रण दिया है।लेकिन ट्रंप की आजीवन अध्यक्षता वाले इस बोर्ड को तमाम देश कितना पसंद करेंगे, एक महत्वपूर्ण विश्लेषणः
पीएम मोदी यूएस राष्ट्रपति ट्रंप के साथ। फाइल फोटो
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित 'बोर्ड ऑफ पीस' में भारत को औपचारिक निमंत्रण मिला है। यह निमंत्रण रविवार को जारी किया गया, जिसकी जानकारी अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने एक्स पर साझा की। बोर्ड को "अब तक की सबसे प्रभावशाली और महत्वपूर्ण बोर्ड" बताते हुए, ट्रंप ने इसे वैश्विक संघर्षों को सुलझाने वाली एक नई अंतरराष्ट्रीय संस्था के रूप में पेश किया है। हालांकि, इस निमंत्रण के साथ भारत को कई पेचीदा सवालों का सामना करना पड़ सकता है, जिसमें संप्रभुता, वित्तीय प्रतिबद्धताएं और बोर्ड की विस्तारित भूमिका शामिल हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि अमेरिका के राष्ट्रपति पद से हटने के बाद भी ट्रंप इस संस्था को अपनी जेब में रखेंगे। दुनिया की चौधराहट करने के लिए बनाई गई इस संस्था को लेकर तमाम सवाल हो रहे हैं।
ट्रंप का प्लान क्या है
ट्रंप ने पिछले साल सितंबर में ग़ज़ा के लिए एक 20-सूत्रीय शांति योजना प्रस्तावित की थी। इस योजना के तहत ग़ज़ा को एक "अस्थायी शासन" के अधीन रखा जाना था, जिसका प्रबंधन एक "तकनीकी, गैर-राजनीतिक फिलिस्तीनी समिति" द्वारा किया जाता। इस समिति की निगरानी 'बोर्ड ऑफ पीस' द्वारा की जानी थी, जिसकी शुरुआती अध्यक्षता ट्रंप खुद संभालेंगे। नवंबर 2025 में संयुक्त राष्ट्र (यूएन) ने इस बोर्ड को मंजूरी दी, लेकिन इसका कार्यकाल 2027 के अंत तक सीमित था और फोकस केवल ग़ज़ा पर था।
ग़ज़ा ही नहीं अब पूरी दुनिया की चिन्ता वाला प्लान
हालांकि, बोर्ड का चार्टर अब विस्तारित हो चुका है। अब यह सिर्फ मिडिल ईस्ट की शांति तक सीमित नहीं है, बल्कि "वैश्विक संघर्षों को सुलझाने" वाला एक "नया अंतरराष्ट्रीय संगठन और अस्थायी शासन प्रशासन" के रूप में परिभाषित है। चार्टर में "और संस्थाओं से अलग होने का साहस" पर जोर दिया गया है। यानी यूएन जैसी संस्था को चुनौती दी गई है। यह ट्रंप की यूएन और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रति नापसंदगी को दर्शाता है। ट्रंप ने यूएन फंडिंग में कटौती की और कई संस्थाओं से अमेरिका को अलग किया था। बोर्ड का चार्टर अब ग़ज़ा का जिक्र तक नहीं करता, बल्कि "संघर्ष से प्रभावित" या "संघर्ष की धमकी वाले" क्षेत्रों में "स्थायी शांति" पर फोकस करता है। जहां "धमकी वाले" क्षेत्र की परिभाषा साफ नहीं है।
बोर्ड का सदस्य बनने के लिए 1 अरब डॉलर फीस है
भारत के अलावा, हंगरी, अल्बानिया, ग्रीस, कनाडा, तुर्की, साइप्रस, मिस्र, जॉर्डन, पैराग्वे और अर्जेंटीना जैसे देशों को भी निमंत्रण भेजा गया है। पाकिस्तान ने भारत से पहले अपना निमंत्रण स्वीकार किया, जबकि हंगरी ने स्पष्ट रूप से हामी भरी है। सदस्यता तीन साल की है, लेकिन पहले साल में 1 अरब डॉलर नकद भुगतान करने पर स्थायी सदस्यता मिल सकती है। निमंत्रण स्वीकार करने पर देश "इस चार्टर से बंधे होने की सहमति" देते हैं, जिसमें ट्रंप ही अध्यक्ष हैं। भले ही वे राष्ट्रपति रहें या न रहें। यानी इस पद से हटने के बाद भी ट्रंप इस संस्था के अध्यक्ष बने रहेंगे।
एक्जीक्यूटिव बोर्ड में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, विशेष दूत स्टीव विटकॉफ, जेरेड कुश्नर जैसे अमेरिकी व्यक्तित्व शामिल हैं, साथ ही अंतरराष्ट्रीय सदस्य जैसे पूर्व ब्रिटिश पीएम टोनी ब्लेयर और वर्ल्ड बैंक अध्यक्ष अजय बंगा। कुल मिलाकर, लगभग 60 देशों को निमंत्रण दिया गया है, जो विभिन्न भू-राजनीतिक खेमों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
यह ट्रंप प्लान नहीं बल्कि उनका निजी एजेंडा
ट्रंप का यह प्लान सतह पर वैश्विक शांति की एक महत्वाकांक्षी पहल लगता है, लेकिन गहराई में कई विवादास्पद तत्व छिपे हैं, जो इसे एक "समांतर यूएन" की तरह बनाते हैं। सबसे बड़ा सवाल बोर्ड की भूमिका के "म्यूटेशन" पर है। यूएन द्वारा मंजूर ग़ज़ा-केंद्रित मिशन से यह वैश्विक स्तर पर फैल चुका है, बिना यूएन की मंजूरी के। चार्टर में ग़ज़ा का नामोनिशान नहीं है, जो मूल उद्देश्य से भटकने का साफ संदेश देता है। क्या यह ट्रंप का निजी एजेंडा है, जो अमेरिकी राष्ट्रपति पद से अलग होकर भी उनकी पावर को बनाए रखे?
ट्रंप की अध्यक्षता एक और विवादास्पद पहलू है। वे स्वैच्छिक इस्तीफा देने या उनके द्वारा नियुक्त एक्जीक्यूटिव बोर्ड की सर्वसम्मति से ही हटाए जा सकते हैं। उसके बाद उनका नामित उत्तराधिकारी ही आएगा। यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक नहीं लगती, बल्कि एक व्यक्ति-केंद्रित संगठन जैसी है, जो ट्रंप की "अमेरिका फर्स्ट" नीति को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा दे सकती है।
संप्रभु राष्ट्रों के लिए ट्रंप प्लान खतरा है, क्योंकि सदस्यता से वे ट्रंप-नियंत्रित संस्था से बंध जाते हैं, जो उनकी विदेश नीति को प्रभावित कर सकती है।
वित्तीय पक्ष भी चिंताजनक है। 1 अरब डॉलर की फीस स्थायी सदस्यता के लिए, जो विकासशील देशों जैसे भारत के लिए बोझिल हो सकती है। अस्पष्ट शब्द जैसे "संघर्ष की धमकी वाले क्षेत्र" बोर्ड को किसी भी क्षेत्र में हस्तक्षेप का अधिकार दे सकते हैं, जो कश्मीर या दक्षिण एशिया जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भारत की संप्रभुता को चुनौती दे सकता है। ट्रंप के यूएन-विरोधी रुख को देखते हुए सवाल उठ रहा है कि क्या यह बोर्ड मौजूदा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को कमजोर करने की साजिश है?
भारत के लिए दोधारी तलवार
भारत के लिए यह निमंत्रण एक दोधारी तलवार है। एक तरफ, वैश्विक शांति प्रयासों में शामिल होना भारत की "विश्व गुरु" छवि को मजबूत कर सकता है, लेकिन दूसरी तरफ, ट्रंप-केंद्रित संस्था में फंसना विदेश नीति की स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है। पाकिस्तान का पहले शामिल होना क्षेत्रीय गतिशीलता को जटिल बना सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को इन "पेचीदा सवालों" का जवाब ढूंढने से पहले सावधानी बरतनी चाहिए, ताकि यह प्लान शांति की बजाय नए संघर्ष न पैदा करे।
ट्रंप के महत्वाकांक्षी प्लान पर भारत चुप
19 जनवरी 2026 को इस रिपोर्ट के लिखे जाना तक, भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) की ओर से इस निमंत्रण पर कोई आधिकारिक बयान या प्रतिक्रिया जारी नहीं की गई है। गुमनाम रूप से बोलते हुए सरकारी अधिकारियों ने कहा है कि नई दिल्ली प्रस्ताव से अवगत है, लेकिन अभी कोई फैसला नहीं लिया गया है या संवाद नहीं किया गया है। भारत की संभावित प्रतिक्रिया को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं- रणनीतिक स्वायत्तता की चिंताएं, अमेरिका-केंद्रित प्रक्रिया से संप्रभुता पर प्रभाव, वित्तीय प्रतिबद्धताएं, क्षेत्रीय तनावों के बीच पाकिस्तान के साथ एक ही बोर्ड में शामिल होने की जटिलता, और संयुक्त राष्ट्र जैसे मौजूदा तंत्रों को प्राथमिकता न देना। हालांकि पीएम मोदी ने 2025 में ट्रंप की ग़ज़ा शांति योजना के कुछ पहलुओं का स्वागत किया था, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भारत संभवतः विनम्र तरीके से गैर-प्रतिबद्ध जवाब दे सकता है, जैसे "प्रस्ताव का अध्ययन किया जा रहा है", या स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखने के लिए मना भी कर सकता है।