अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने पुष्टि की है कि ईरान युद्ध के बीच इसराइली हमलों के बाद ईरान का खोंदाब हेवी वॉटर प्लांट बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया है। अब यह काम नहीं कर रहा  है। यहां से मीठे पानी की सप्लाई होती थी। यह प्लांट ईरान के मध्य भाग में अराक के पास स्थित है और लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय चिंता का केंद्र रहा है। इस प्लांट पर 27 मार्च को हमला हुआ था। इसके बाद ईरान ने 29 मार्च की देर रात दोहा वेस्ट पावर और वाटर डिसेलिनेशन स्टेशन पर हमला कर दिया। लेकिन इसे कुवैत में पीने के पानी का बहुत बड़ा संकट बताकर मीडिया में प्रचारित किया जा रहा है।
IDF ने टेलीग्राम पर जारी बयान में कहा कि इसराइली वायुसेना ने खुफिया इनपुट्स के आधार पर इस साइट को निशाना बनाया। IDF के अनुसार, यह प्लांट हेवी वॉटर का उत्पादन करता है, जो कुछ प्रकार के परमाणु रिएक्टरों में उपयोग होता है, जिसमें अराक रिएक्टर भी शामिल है। IDF का दावा है कि यह रिएक्टर मूल रूप से हथियार-ग्रेड प्लूटोनियम बनाने की क्षमता के साथ डिजाइन किया गया था।

ईरान का कुवैत पर जवाबी हमला

ईरान ने कुवैत के दोहा वेस्ट पावर और वाटर डिसैलिनेशन स्टेशन पर हमला किया, जिसमें एक भारतीय कामगार की मौत हो गई। भारी नुकसान हुआ। कुवैत अपनी लगभग 90% पेयजल जरूरतों के लिए समुद्री पानी को मीठा बनाने (डिसेलिनेशन) पर निर्भर है। अरब की खाड़ी के किनारों पर मौजूद 400 से अधिक प्लांट्स दुनिया के कुल डिसैलिनेटेड पानी का करीब 40% उत्पादन करते हैं।

ईरान ने वाटर प्लांट पर हमले का खंडन किया

ईरान की सशस्त्र सेना (खतम अल-अनबिया) के प्रवक्ता ने कहा कि ईरान पर आरोप लगाकर कुवैत के मीठे पानी के प्लांट पर ज़ायोनी (इसराइली) शासन द्वारा किया गया क्रूर हमला, जो हाल ही में हुआ, उनकी क्षुद्रता का प्रतीक है। ईरानी प्रवक्ता ने कहा कि पश्चिम एशिया के देशों को क्षेत्र को अस्थिर करने और नष्ट करने के उद्देश्य से अमेरिकी-ज़ायोनी उकसावों के प्रति सतर्क रहना चाहिए और क्षेत्र में अपराधी अमेरिकी सेना और ज़ायोनी कब्ज़ा करने वालों की उपस्थिति को समाप्त करना चाहिए।
Atlantic Council की चेतावनी के मुताबिक, खाड़ी क्षेत्र के 90% से अधिक डिसेलिनेशन उत्पादन सिर्फ 56 प्लांट्स से आता है। इसका मतलब साफ है। यह अब सिर्फ ऊर्जा युद्ध नहीं रहा, बल्कि पानी का युद्ध बन चुका है। पानी का कोई विकल्प नहीं होता। न इसका कोई रणनीतिक भंडार होता है, न ही ऐसा कोई बाजार जहां से इसकी कमी को पूरा किया जा सके।
उपग्रह से ली गई तस्वीरों में कुवैत के वाटर प्लांट (शायद दोहा वेस्ट कॉम्प्लेक्स) में ईरान के हमले के बाद भारी क्षति दिखाई दे रही है। एक अमेरिकी जनरल ने पुष्टि की है कि अगर ईरान मिडिल ईस्ट में स्थित खारे पानी को मीठा करने वाले प्लांटों पर हमला करता है, तो पूरा क्षेत्र पानी से वंचित हो जाएगा और लाखों लोग जीवित नहीं बचेंगे। उन्होंने ट्रंप प्रशासन से बातचीत करने और वहां से हटने की गुहार लगाई है।
मिडिल ईस्ट के विश्लेषकों का कहना है कि तमाम वाटर प्लांट आपस में जुड़े हुए हैं। जिसमें से कतर को अपने पानी का 100% हिस्सा खारे पानी को मीठा करके मिलता है। कुवैत को 90% और सऊदी अरब को 70%। ईरान ने दिखा दिया है कि वे कभी भी पानी की आपूर्ति बंद कर सकते हैं। लेकिन सबसे पहले ईरान के वाटर प्लांटों को जब निशाना बनाया गया तो ही उसने जवाबी हमला शुरू किया।
ईरानी मिसाइल जब कुवैत के दोहा वेस्ट पावर एंड वाटर डिसेलिनेशन स्टेशन पर गिरी तो वहां भीषण आग लग गई है। दरअसल, यह प्लांट रोजाना 2,400 मेगावाट बिजली और लगभग 11 करोड़ गैलन पानी का उत्पादन करता है। इससे कुवैत की जल आपूर्ति पर गंभीर दबाव बढ़ गया है। अगर महत्वपूर्ण जल प्लांट इस तरह प्रभावित होते हैं, तो कुवैत की जल सुरक्षा कितनी सुरक्षित रह पाएगी?
मिडिल ईस्ट में कोई जलभंडार नहीं है। कोई नदी नहीं है। नाममात्र की बारिश होती है। पूरा अरब प्रायद्वीप समुद्र से बिजली का इस्तेमाल करके उससे समुद्री पानी को साफ कर जो मीठा पानी आता है, उस पर निर्भर है। यानी अगर एक ड्रोन या एक मिसाइल एक प्लांट गिरे तो लाखों लोग पानी के बिना हो जाएंगे। यह कोई अटकलबाजी नहीं है। 2009 के एक अमेरिकी स्टडी इस पर हो चुकी है। जिसमें यही निष्कर्ष निकाला गया था: अगर खारे पानी को मीठा करने वाले ढांचे को नष्ट कर दिया जाए, तो सऊदी की राजधानी रियाद को एक सप्ताह के भीतर खाली करने के लिए मजबूर किया जा सकता है। वह संदेश 17 साल पुराना है। तब से निर्भरता और भी बढ़ गई है।

तेजी से बढ़ता सैन्य टकराव

ईरान अब चुन-चुन कर मिडिल ईस्ट में पानी के प्लांटों को निशाना बना रहा है। सऊदी अरब ने अपने पूर्वी प्रांत को निशाना बनाकर भेजे गए ड्रोन और मिसाइलों को इंटरसेप्ट किया। यह भी कहा जा रह है कि होर्मुज और बाब अल-मंदेब दोनों जलडमरूमध्य एक साथ बंद होने की 20–25% संभावना है। अगर ऐसा होता है, तो स्वेज नहर से लेकर मलक्का जलडमरूमध्य तक एक ऐसा समुद्री क्षेत्र बन जाएगा जहां कोई कारोबारी गतिविधि फिलहाल नहीं हो सककेगी और इससे वैश्विक व्यापार के लिए एक बड़ा झटका लगेगा।