इसराइल में अरब पार्टियों ने संसदीय चुनाव में रिकॉर्ड प्रदर्शन का दावा किया है। मंगलवार को हुए मतदान में अरब मतदाताओं की भारी भागीदारी के बाद दो प्रमुख अरब पार्टियों को करीब 19 सीटें मिलने का अनुमान है। इससे प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता और उनके विरोधियों की सरकार बनाने की कोशिशों के बीच अरब पार्टियां किंगमेकर की भूमिका में आ गई हैं।

इसराइल की राजनीति में अरब पार्टियों की बढ़ी ताकत

इसराइल के संसदीय चुनाव में अरब पार्टियों का प्रदर्शन देश की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत दे रहा है। शुरुआती मतगणना के रुझानों के मुताबिक, अरब समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली दो प्रमुख पार्टियां लगभग 19 सीटें जीतने की स्थिति में हैं। यह निवर्तमान संसद में उनके कुल प्रतिनिधित्व से करीब दोगुना है। इन पार्टियों में यूसुफ जबरीन के नेतृत्व वाला ज्वाइंट लिस्ट (Joint List) और मंसूर अब्बास की रा'म (Ra'am) शामिल हैं।
अरब मतदाताओं की मजबूत भागीदारी ने इन पार्टियों को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया है, जहां अगली सरकार के गठन में उनकी भूमिका निर्णायक हो सकती है। इसराइल की 120 सदस्यीय संसद नेसेट में सरकार बनाने के लिए 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। इस चुनाव में अरब पार्टियों का प्रदर्शन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबे समय से इसराइल की राजनीति में अरब प्रतिनिधियों को सरकार गठन की प्रक्रिया से दूर रखा जाता रहा है। अब उनके पास न केवल अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाने का अवसर है, बल्कि सरकार की नीतियों को प्रभावित करने की भी संभावना है।
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नेतन्याहू को हटाने के लिए ज्वाइंट लिस्ट तैयार

ज्वाइंट लिस्ट के नेता यूसुफ जबरीन ने कहा है कि उनकी पार्टी को मिलने वाली अनुमानित 12 सीटों का इस्तेमाल नेतन्याहू सरकार को सत्ता से हटाने और इसराइल की राजनीतिक स्थिति में बदलाव लाने के लिए किया जाएगा। जबरीन ने कहा कि उनकी पार्टी का उद्देश्य अपने समुदाय की सुरक्षा, अधिकारों और समानता को आगे बढ़ाना है। हालांकि, जबरीन ने यह भी स्पष्ट किया कि ज्वाइंट लिस्ट गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाली संभावित सरकार में शामिल नहीं होगी। इसकी वजह गाजा में इसराइल के सैन्य अभियान और दक्षिणी लेबनान पर कब्जे को लेकर आइजेनकोट का समर्थन है। लेकिन जबरीन ने एक महत्वपूर्ण विकल्प खुला रखा है। उन्होंने संकेत दिया कि ज्वाइंट लिस्ट संसद के बाहर से आइजेनकोट के गठबंधन को समर्थन दे सकती है। इससे अल्पमत सरकार भी विश्वास मत हासिल कर सकती है और सत्ता में बनी रह सकती है। इसका अर्थ यह है कि अरब पार्टियां सीधे सरकार में शामिल हुए बिना भी नेतन्याहू को हटाने में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं।

मंसूर अब्बास की पार्टी सरकार में शामिल होने को तैयार

दूसरी प्रमुख अरब पार्टी रा'म के नेता मंसूर अब्बास ने सरकार गठन को लेकर अधिक व्यावहारिक रुख अपनाया है। अब्बास ने कहा कि उन्हें विश्वास है कि राजनीतिक मुश्किलों को दूर किया जा सकता है और आइजेनकोट के नेतृत्व वाले गठबंधन में रा'म की भागीदारी संभव है। उन्होंने इसराइली टेलीविजन से बातचीत में कहा कि आइजेनकोट के गठबंधन के अधिकांश मतदाता भी रा'म के साथ सरकार देखना चाहते हैं। अब्बास के मुताबिक, चुनाव से पहले ही आइजेनकोट के गठबंधन के वरिष्ठ नेताओं ने उनके साथ संभावित समझौते को लेकर बातचीत की थी। उन्होंने यह भी दावा किया कि सिर्फ विपक्षी गठबंधन ही नहीं, बल्कि दक्षिणपंथी खेमे के नेता भी उनसे संपर्क कर रहे हैं।
अब्बास ने कहा कि चुनाव से कुछ दिन पहले दक्षिणपंथी खेमे के एक बेहद वरिष्ठ नेता ने उनसे संपर्क किया था। रा'म ने अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए पार्टी की उम्मीदवार सूची में एक यहूदी पूर्व पुलिस अधिकारी को भी शामिल किया है। अब्बास का प्रयास है कि उनकी पार्टी को केवल अरब समुदाय की पार्टी के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक गठबंधन के संभावित सहयोगी के रूप में देखा जाए।

इसराइल के मंसूर अब्बास अपनी पत्नी के साथ वोट डालते हुए

आइजेनकोट का अरब पार्टियों के साथ सरकार बनाने से इनकार

गादी आइजेनकोट ने चुनाव प्रचार के दौरान अरब पार्टियों के साथ सरकार बनाने की संभावना को खारिज कर दिया था। उनका तर्क था कि अरब पार्टियों और उनके गठबंधन के बीच साझा राजनीतिक मूल्य नहीं हैं। उन्होंने इसराइल को यहूदी और लोकतांत्रिक देश के रूप में मान्यता देने के सवाल को भी इस मतभेद का हिस्सा बताया था। इस रुख के कारण अब आइजेनकोट के सामने मुश्किल स्थिति पैदा हो गई है।
अगर वह अरब पार्टियों का समर्थन नहीं लेते हैं, तो उनके लिए संसद में बहुमत जुटाना कठिन हो सकता है। दूसरी ओर, अरब पार्टियों के साथ सहयोग करने पर उनके अपने गठबंधन के दक्षिणपंथी मतदाताओं और नेताओं की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है। इस बीच, नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने भी अरब पार्टियों के साथ बातचीत की संभावना से इनकार किया है। लिकुड के प्रवक्ता गाय लेवी ने यरुशलम में पार्टी मुख्यालय पर कहा कि अरब पार्टियों के साथ सरकार बनाने को लेकर बातचीत का कोई सवाल ही नहीं है।

कौन हैं मंसूर अब्बास?

मंसूर अब्बास 52 वर्षीय अरब-इजराइली राजनीतिज्ञ और पेशे से दंत चिकित्सक हैं। वह रा'म पार्टी के नेता हैं और 2019 में पहली बार इजराइल की संसद नेसेट के लिए चुने गए थे। अब्बास ने अरब राजनीति में एक व्यावहारिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया है। उनका जोर इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष के व्यापक सवालों के बजाय अरब नागरिकों की रोजमर्रा की समस्याओं पर रहा है।
उनकी प्राथमिकताओं में शामिल हैं:
  • - अरब समुदायों में बढ़ते अपराध और संगठित अपराध पर नियंत्रण।
  • - सामाजिक और आर्थिक असमानता को कम करना।
  • - अरब समुदायों में बुनियादी ढांचे का विकास।
  • - स्थानीय निकायों को अधिक वित्तीय सहायता।
  • - अरब नागरिकों के नागरिक अधिकारों और सामाजिक स्थिति में सुधार।

अब्बास की राजनीति का एक महत्वपूर्ण उदाहरण 2021 का घटनाक्रम है, जब उनकी पार्टी रा'म नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड के नेतृत्व वाली इजराइली सरकार में शामिल हुई थी। यह इजराइल की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव था।

क्या है ज्वाइंट लिस्ट?

ज्वाइंट लिस्ट इसराइल की अरब बहुल पार्टियों का गठबंधन है। इसका गठन 2015 में अरब नागरिकों के वोटों को एकजुट करने के उद्देश्य से किया गया था। इस गठबंधन में अहमद तिबी की ता'अल सहित कई राजनीतिक दल शामिल रहे हैं। इसमें धर्मनिरपेक्ष, राष्ट्रवादी और वामपंथी विचारधारा वाली पार्टियों का प्रतिनिधित्व रहा है।
ज्वाइंट लिस्ट की प्रमुख मांगें हैं:
  • - अरब नागरिकों के लिए समान नागरिक अधिकार।
  • - अरब समुदायों में अपराध पर नियंत्रण।
  • - अरब नागरिकों के साथ भेदभाव समाप्त करना।
  • - इसराइल के कब्जे वाली फिलिस्तीनी जमीनों को लेकर राजनीतिक समाधान।
ज्वाइंट लिस्ट का पारंपरिक रुख यह रहा है कि वह यहूदी-बहुल सरकारों में सीधे शामिल होने के बजाय बाहर से समर्थन देने को प्राथमिकता देती है।

इसराइल की आबादी में अरब नागरिकों की कितनी हिस्सेदारी?

इसराइल में अरब नागरिकों की आबादी लगभग 20 फीसदी है। उनकी संख्या करीब 21 लाख बताई जाती है। अरब नागरिक इसराइल के स्वास्थ्य क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसराइल के स्वास्थ्य मंत्रालय और ताउब सेंटर फॉर सोशल पॉलिसी स्टडीज के आंकड़ों के मुताबिक:  अरब नागरिकों डॉक्टर 20 फीसदी से अधिक, नर्स करीब 25 फीसदी और लाइसेंस प्राप्त फार्मासिस्ट करीब 50 फीसदी हैं। 
इसराइल के सुप्रीम कोर्ट में भी दो अरब नागरिक न्यायाधीश के रूप में काम कर चुके हैं। इसके अलावा अरब इंजीनियर, शिक्षाविद, लेखक और खिलाड़ी देश के सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके बावजूद अरब समुदाय लंबे समय से राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सामाजिक असमानता, अपराध और बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसी समस्याओं का सामना करता रहा है।

इसराइल की सरकारों को पहले भी समर्थन देती रही हैं अरब पार्टियां

इसराइल की राजनीति में अरब पार्टियों की भूमिका नई नहीं है, लेकिन सरकार गठन में उनकी भागीदारी सीमित रही है। कई दशकों तक अरब पार्टियां सरकारों को संसद के बाहर से समर्थन देती रही हैं। मंत्रिमंडल में अरब प्रतिनिधित्व आमतौर पर व्यक्तिगत नियुक्तियों तक सीमित रहा।
कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण:
  • - 2001 में ड्रूज नेता सलाह तारीफ को मंत्रिमंडल में जगह मिली।
  • - 2007 में लेबर पार्टी के रालेब मजादेले मंत्री बने।
  • - बाद के वर्षों में इस्सावी फ्रेज और अयोब कारा जैसे नेताओं को भी मंत्रिमंडल में शामिल किया गया।
  • - 2021 में मंसूर अब्बास की रा'म पार्टी नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड की सरकार में शामिल हुई।
2021 का घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि रा'म पहली अरब-बहुल पार्टी बनी जिसने इसराइल की सत्तारूढ़ गठबंधन सरकार में शामिल होकर सत्ता में प्रत्यक्ष भागीदारी की।

क्या अरब पार्टियां नेतन्याहू की सत्ता खत्म कर पाएंगी?

इसराइल के चुनावी नतीजों ने एक ऐसी राजनीतिक स्थिति पैदा कर दी है, जिसमें नेतन्याहू के विरोधियों के पास संभावित बहुमत हो सकता है, लेकिन उस बहुमत को सरकार में बदलने के लिए अरब पार्टियों के समर्थन की जरूरत पड़ सकती है। इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आइजेनकोट और उनके सहयोगी अरब पार्टियों के साथ सहयोग करने को तैयार होंगे? अरब पार्टियों के सामने भी एक चुनौती है। उन्हें अपने समुदाय के अधिकारों और सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर ठोस आश्वासन हासिल करने होंगे। वहीं, आइजेनकोट को अपने गठबंधन के भीतर विरोध का सामना करना पड़ सकता है।
अगर अरब पार्टियों को सरकार गठन में शामिल नहीं किया जाता है, तो इजराइल में राजनीतिक गतिरोध बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में दोबारा चुनाव या नेतन्याहू के साथ किसी तरह की साझा सरकार जैसे विकल्प सामने आ सकते हैं। इसलिए इसराइल के इस चुनाव में अरब पार्टियों का प्रदर्शन सिर्फ सीटों की संख्या बढ़ने तक सीमित नहीं है। यह देश की राजनीति में अरब नागरिकों की भूमिका, प्रतिनिधित्व और सत्ता में भागीदारी को लेकर एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।