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इमरान ख़ान की उल्टी गिनती शुरू? 

अभी तक विपक्ष के लोग इमरान खान को 'सेलेक्टेड प्राइम मिनिस्टर' कहा करते थे पर कोई भी 'सेलेक्टर्स' की शिनाख्त खुले आम करने की जुर्रत नहीं करता था। गुजराँवाला की रैली में, इलाज के बहाने लंदन में बैठे, नवाज शरीफ़ के ऑनलाइन प्रसारित होने वाले भाषण में पहली बार 'सेलेक्टर्स' का नाम खुले आम लिया गया।
वी. एन. राय

पाकिस्तान में हालिया दिनों में जो कुछ घटा है उस पर राजनैतिक विश्लेषकों को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। घटनायें पहले की ही तरह घट रही हैं। नापसंद सरकारों को बर्ख़ास्त करने के पहले विरोधी दलों के गठबंधन बनते हैं, लोग सड़कों पर निकलते हैं, सेना और न्यायपालिका सरकार को अपने हथकंडों से अपंग बनाती है और फिर देश में अराजकता फैलने या भ्रष्टाचार के नाम पर उसे बर्ख़ास्त करा दिया जाता है। 

क्या है मामला?

इस बार भी कुछ- कुछ ऐसे ही हो रहा है, फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि पहले फ़ौज के प्रोत्साहन से गठबंधन बनते थे और उसकी मर्ज़ी से ही लोग सड़कों पर निकलते थे। पर इस बार गठबंधन उसके बावजूद बना है। पिछले दिनों पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट या पीडीएम के नाम से बना गठबंधन वैसे तो एक दूसरे की मुख़ालिफ़ सियासी पार्टियों का जोड़ है, पर सेना के प्रति ग़ुस्सा उन्हें एक किये हुये है।
ख़ास ख़बरें
पीडीएम ने जनता को सड़कों पर उतारने की रणनीति के तहत देश भर में एक दर्जन के लगभग रैलियाँ आयोजित करने का ऐलान कर रखा है। गुजराँवाला (16 अक्टूबर) और कराची (18 अक्टूबर) की रैलियाँ अब तक हो चुकीं हैं और स्वाभाविक रूप से सत्तारू़ढ़ पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए- इंसाफ़ के समर्थकों ने इन्हें फ़्लॉप और विपक्षी दलों ने सफल क़रार दे दिया है।
निष्पक्ष राजनैतिक विश्लेषकों के मुताबिक़, जनता की उपस्थिति और भागीदारी के अतिरिक्त भी कई अर्थों मे ये सभायें अभूतपूर्व रही हैं। ख़ासतौर से गुजराँवाला की रैली में कुछ ऐसा हुआ, जिसका आभास स्वयं मंच पर मौजूद पीडीएम नेतृत्व तक को नहीं था। 
अभी तक विपक्ष के लोग इमरान खान को 'सेलेक्टेड प्राइम मिनिस्टर' कहा करते थे पर कोई भी 'सेलेक्टर्स' की शिनाख्त खुले आम करने की जुर्रत नहीं करता था। गुजराँवाला की रैली में, इलाज के बहाने लंदन में बैठे, नवाज शरीफ़ के ऑनलाइन प्रसारित होने वाले भाषण में पहली बार 'सेलेक्टर्स' का नाम खुले आम लिया गया।

नवाज़ का हमला

नवाज़ ने बिना किसी लाग लपेट के सेनाध्यक्ष जनरल बाज़वा और आईएसआई प्रमुख लेफ़्टिनेंट जनरल फ़ैज़ का नाम लेकर कहा कि इन्ही लोगों ने जजों पर दबाव डालकर उनके ख़िलाफ़ फ़ैसले कराये थे और इन्होंने ही जनता के वोट चुरा कर फ़र्ज़ी तरीक़ों से इमरान ख़ान को जितवाया था ।
जिस तरह भाषण में सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा और आईएसआई चीफ़ लेफ़्टिनेंट जनरल फ़ैज़ के नाम लेकर नवाज़ शरीफ़ ने ललकारते हुए कहा कि उनकी लड़ाई इमरान खान से नही बल्कि उन्हें लाने वाले सेलेक्टरों से है, उससे कुछ देर के लिये तो मंच पर सन्नाटा छा गया। अभी तक यह तो कहा जाता रहा था कि इमरान खान सेलेक्टेड प्राइम मिनिस्टर हैं, किंतु सेलेक्टर का नाम लेने का हौसला नवाज़ शरीफ़ ने भी पहली बार दिखाया है। 

क्या होगा नवाज़ का?

जनता की नब्ज़ पहचानने वाले कुशल राजनेता की तरह नवाज शरीफ़ जनता से पूछते थे कि उनकी सरकार को किसने हटाया और सेलेक्टेड प्रधानमंत्री को किसने चुना, तो जनता की तरफ़ से पहले तो सहमी आवाज में उत्तर आया -फ़ौज और फिर जब उन्होंने थोड़ा ललकारते हुये सवाल दागने शुरू किये तो श्रोताओं ने भी जोश में हाथ उठा- उठाकर जनरल साहेबान के नाम लेने शुरू कर दिये। 
इससे पहले सिर्फ़ एक बार, लगभग पाँच साल पहले मोहाज़िर नेता अलताफ़ हुसैन ने खुलकर फ़ौजी अफ़सरों के ख़िलाफ़ नाम लेकर बोलने की जुर्रत की थी और फ़ौज ने उनकी क्या गत बनायी थी, हम सभी जानते हैं।

सेना का पलटवार

नवाज़ के भाषण पर सेना की प्रतिक्रिया तीन दिन बाद आयी। कराची में 16 अक्टूबर को भी एक कामयाब जलसा हुआ। इसमें गुजराँवाला से भी अधिक संख्या में लोग आये और वैसी ही तक़रीरें 'सेलेक्टेड' और 'सेलेक्टर्स' के ख़िलाफ़ हुईं, फ़र्क़ सिर्फ़ इतना आया कि कुछ अज्ञात कारणों से यहाँ नवाज़ शरीफ़ नहीं बोले। उनकी कमी मरियम, बिलावल और मौलाना फ़ज़लुर रहमान के भाषणों ने पूरी कर दी और फ़ौज को नाराज़ करने मे कोई कसर नही छोड़ी। 
कुछ ही घंटो मे फ़ौज ने पलट वार किया। रैली ख़त्म करने के बाद जब मरियम और उनके पति सफ़दर अपने होटल के कमरे में आराम कर रहे थे, सुबह 6 बजे सिंध पुलिस और अर्द्धसैनिक बल पाकिस्तान रेंजर्स के कर्मियों ने उनके कमरे का दरवाज़ा तोड़कर सफ़दर को गिरफ़्तार कर लिया।

पुलिस आईजी को ज़बरन उठाया?

शुरू में तो किसी की समझ में नही आया कि आख़िर माजरा क्या है? पीपीपी की सरकार, उसकी पुलिस और पीडीएम में बिलावल की भागीदारी के बाद मरियम के पति की गिरफ़्तारी कैसे हो सकती है? जैसे- जैसे दिन चढ़ा, राज खुलता गया। रैली के पहले मरियम और सफ़दर जिन्ना की मज़ार पर फूल चढ़ाने गये थे और वहाँ उनके कार्यकर्ताओं ने लोकतंत्र के पक्ष में नारे लगाये थे। 
पहले किसी हिस्ट्री- शीटर पीटीआई समर्थक से एक एफ़आईआर लिखाने की कोशिश की गयी कि मज़ार की बेइज़्ज़ती की गयी है और सफ़दर और उनके कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया जाय।
थाने पर असफल होने के बाद रेंजर्स प्रदेश के आईजी पुलिस को सुबह 4 बजे उनके घर से उठा कर अपने दफ़्तर ले गये और वहाँ उनसे सफ़दर के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करने और उनको गिरफ़्तार करने के हुक़्मनामे पर ज़बरदस्ती दस्तख़त कराये गये।
हालाँकि शाम तक सफ़दर की ज़मानत हो गयी और बिलावल भुट्टो और सिंध के मुख्यमंत्री ने प्रेस कानफ़्रेंस कर इस घटना से सिंध सरकार की ज़िम्मेदारी से इंकार कर दिया, पर इमरान खान इसके बाद ज़्यादा कमज़ोर विकेट पर दिखे। 
यह एक ऐसा काम था जो पीडीएम के चेयरमैन मौलाना फ़ज़लुर रहमान के मुताबिक़ आलोकप्रिय सरकारें अपने अंत काल में करती हैं। तो क्या इमरान खान की उल्टी गिनती शुरू हो ग़यी है? जो विश्लेषक पाकिस्तानी समाज और राजनीति पर गहरी पकड़ रखते हैं, उनमे कुछ तो कह सकते हैं कि अभी कुछ सटीक अनुमान लगाना जल्दबाज़ी होगी, पर ज़्यादातर इस प्रश्न का उत्तर 'हाँ' में देंगे ।

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