पाकिस्तान ने चीन के उस दावे का समर्थन किया है जिसमें बीजिंग ने मई 2025 में भारत-पाकिस्तान चार दिवसीय संघर्ष के दौरान मध्यस्थता की भूमिका निभाने का दावा किया था। इस संघर्ष को भारत की ओर से ऑपरेशन सिंदूर नाम दिया गया था।

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने 2 जनवरी 2026 को एक प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि चीनी नेता पाकिस्तानी नेतृत्व के साथ "निरंतर संपर्क" में थे। उन्होंने भारतीय नेतृत्व से भी "कुछ संपर्क" किए थे। यह संपर्क मई महीने के 6 से 10 तारीख के बीच, और शायद इससे पहले और बाद में भी हुए थे।

अंद्राबी ने कहा, "मुझे लगता है कि चीनी नेताओं द्वारा की गई इन पॉजिटिव डिप्लोमेसी आदान-प्रदान की विशेषता वाले संपर्कों ने तनाव कम करने और क्षेत्र में शांति एवं सुरक्षा लाने में भूमिका निभाई। इसलिए, मैं साफ तौर पर कह सकता हूं कि चीन द्वारा मध्यस्थता की बात सही है।"

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पाकिस्तानी प्रवक्ता ने इन प्रयासों को "शांति, समृद्धि और सुरक्षा के लिए कूटनीति" करार देते हुए कहा कि पाकिस्तान चीन की स्थिति का "दृढ़ता से" समर्थन करता है। यह पाकिस्तान का पहला ऐसा बयान है जिसमें बीजिंग की कथित मध्यस्थता भूमिका को स्वीकार किया गया है।

इस बयान में देरी और पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को संघर्ष विराम का पूरा श्रेय देने के कारण यह बयान चर्चा का विषय बन गया है। इससे पहले पाकिस्तान ने युद्धविराम का श्रेय केवल अमेरिका को दिया था।

भारत ने चीन के विदेश मंत्री वांग यी के दावे को खारिज कर दिया था। भारत का कहना है कि सैन्य विराम पाकिस्तान के डीजीएमओ (डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस) के अनुरोध के बाद हुआ था, न कि किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता से।

चीन का दावा अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बार-बार किए गए उस बयान से मिलता-जुलता है जिसमें उन्होंने कहा था कि वाशिंगटन ने दोनों परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसी देशों के बीच टकराव समाप्त करने में निर्णायक भूमिका निभाई थी।

ट्रंप ने 70 बार युद्ध रुकवाने का दावा किया 

10 मई 2025 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहली बार ट्रुथ सोशल पर घोषणा की थी: "यूएसए द्वारा मध्यस्थता वाली लंबी रात की बातचीत के बाद, मुझे यह घोषणा करते हुए खुशी हो रही है कि भारत और पाकिस्तान पूर्ण एवं तत्काल युद्धविराम पर सहमत हो गए हैं।" ट्रंप ने बार-बार इस समझौते का श्रेय लिया और कहा कि उन्होंने व्यापारिक दबाव (व्यापार समझौतों को रोकने की धमकी) का इस्तेमाल करके तनाव कम किया, जिससे संभावित परमाणु संघर्ष टल गया। 2025 के अंत तक उन्होंने सार्वजनिक बयानों, साक्षात्कारों और विश्व नेताओं से मुलाकातों में इस दावे को 70 से अधिक बार दोहराया।


पाकिस्तानी अधिकारियों, जिसमें विदेश मंत्री इशाक डार भी शामिल हैं, ने युद्धविराम की पुष्टि की और अमेरिकी भूमिका की सराहना की। कुछ खुफिया स्रोतों ने ट्रंप के सीधे हस्तक्षेप को समझौते को अंतिम रूप देने का श्रेय दिया। शुरू में पाकिस्तान ने अमेरिकी प्रयासों को प्रमुखता दी, हालांकि बाद के बयानों (जैसे चीन के दावे के संदर्भ में) में फोकस बदल गया।

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भारत का पक्ष

भारत ने किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को लगातार खारिज किया है। विदेश मंत्रालय (MEA), विदेश सचिव विक्रम मिश्री और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आधिकारिक बयानों में जोर दिया गया है कि युद्धविराम द्विपक्षीय था। यह तब हुआ जब पाकिस्तान के डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस (DGMO) ने भारी नुकसान झेलने के बाद भारतीय DGMO से संपर्क करके युद्ध रोकने का अनुरोध किया। भारत अपनी नीति पर कायम है: द्विपक्षीय मुद्दों, विशेषकर कश्मीर या आतंकवाद से जुड़े मामलों में कोई बाहरी मध्यस्थता नहीं।


कुल मिलाकर, जहां ट्रंप ने अपनी भूमिका को निर्णायक और "ऐतिहासिक" बताया, वहीं भारत युद्धविराम को अपनी प्रभावी सैन्य कार्रवाई का नतीजा मानता है, जिसने पाकिस्तान को पीछे हटने पर मजबूर किया। किसी विदेशी मध्यस्थता की कोई भूमिका नहीं थी। ये परस्पर विरोधी बयानबाज़ी दक्षिण एशिया में चल रही कूटनीतिक संवेदनशीलता को बता रहे हैं। जिससे भारत-पाकिस्तान संबंधों में तनाव बरकरार है।