रेड सी में हूतियों की बढ़त जारी है। यूएस मीडिया ने बताया कि सऊदी अरब किंग मोहम्मद बिन सलमान ने राष्ट्रपति ट्रंप से हूतियों पर हमले का आग्रह किया। ट्रंप ने मना कर दिया। पाकिस्तान भी मना कर चुका है।
यमन के हूती लड़ाके रेड सी में आगे बढ़ रहे हैं
यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के बढ़ते प्रभाव ने पश्चिम एशिया के संकट को और गंभीर बना दिया है। हूती लड़ाकों ने लाल सागर के महत्वपूर्ण बंदरगाह शहर मोखा (Mokha) पर कब्जा कर लिया है और अब वे रणनीतिक बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य की ओर बढ़ रहे हैं। इस घटनाक्रम से सऊदी अरब की चिंता बढ़ गई है, क्योंकि ईरान के साथ जारी संघर्ष के कारण पहले ही हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तेल और जहाजों की आवाजाही प्रभावित है।
इसी बढ़ते खतरे के बीच सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से दो बार फोन पर बात कर हूतियों के खिलाफ तत्काल अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की मांग की। लेकिन Axios की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप ने इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। अमेरिकी अधिकारियों ने कहा है कि फिलहाल अमेरिका हूतियों के खिलाफ सीधे सैन्य अभियान शुरू करने के पक्ष में नहीं है।
MBS ने ट्रंप से दो बार की बात
Axios के मुताबिक गुरुवार को MBS ने ट्रंप को दो फोन कॉल किए। उस समय हूती लड़ाके यमन के लाल सागर तट पर तेजी से दक्षिण की ओर बढ़ रहे थे और सऊदी समर्थित यमनी सेना पीछे हट रही थी। MBS ने ट्रंप को बिगड़ती स्थिति की जानकारी दी और हूतियों के खिलाफ अमेरिकी हमले की मांग की। लेकिन ट्रंप प्रशासन ने सीधे सैन्य हस्तक्षेप से इनकार कर दिया। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक वाशिंगटन फिलहाल सऊदी अरब को समर्थन बढ़ाना चाहता है, लेकिन यमन में एक नया सीधा सैन्य मोर्चा खोलने से बच रहा है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर भी गुरुवार को तत्काल समन्वय वार्ता के लिए सऊदी अरब पहुंचे। रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिका का मौजूदा सैन्य फोकस ईरान के साथ चल रहे संघर्ष और हॉर्मुज जलडमरूमध्य को खुला रखने पर है।पाकिस्तान भी मना कर चुका है
पाकिस्तान, तुर्की, सऊदी अरब ने हाल ही में मक्का पैक्ट पर हस्ताक्षर किए थे। जिसमें की गई घोषणाओं में यह भी कहा गया है कि इन देशों पर अगर कोई अन्य देश हमला करता है तो वो हमला इन तीनों पर माना जाएगा। इसके बाद सऊदी अरब ने रेड सी का संकट बढ़ने के बाद पाकिस्तान से आग्रह किया कि वो हूतियों पर हमला करे। पाकिस्तान ने हूतियों पर हमले से साफ मना कर दिया। इसकी एक खास वजह यह है कि हूतियों को ईरान समर्थक माना जाता है। जबकि पाकिस्तान लंबे समय से ईरान और अमेरिका में समझौते की कोशिश कर रहा था। हालांकि उसे वहां भी नाकामी हाथ लगी है।
मोखा पर कब्जा क्यों अहम है?
हूतियों का मोखा पर कब्जा इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बंदरगाह बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य से लगभग 80 किलोमीटर दूर है। मोखा पर नियंत्रण के बाद हूती अब इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग के और करीब पहुंच गए हैं। बाब-अल-मंदेब लाल सागर के दक्षिणी छोर पर स्थित है और यमन को अफ्रीका के जिबूती और इरिट्रिया से अलग करता है। यह एशिया और यूरोप के बीच समुद्री व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण रास्ता है। इसी रास्ते से जहाज लाल सागर और आगे स्वेज नहर की ओर जाते हैं। इसका सबसे संकीर्ण हिस्सा करीब 29 किलोमीटर चौड़ा है। इसके बीच में पेरिम द्वीप स्थित है, जिसके कारण समुद्री यातायात सीमित चैनलों से गुजरता है।होर्मुज के बाद बाब-अल-मंदेब भी खतरे में
मौजूदा संकट की सबसे बड़ी चिंता यह है कि पश्चिम एशिया के दो महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते एक साथ दबाव में आ गए हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी से तेल और गैस की आवाजाही का प्रमुख रास्ता है। दूसरी तरफ बाब-अल-मंदेब लाल सागर और स्वेज नहर के जरिए एशिया-यूरोप व्यापार का महत्वपूर्ण समुद्री द्वार है।मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक होर्मुज में जहाजों की आवाजाही पहले ही काफी कम हुई है। बुधवार को शुरुआती शिप-ट्रैकिंग आंकड़ों के अनुसार केवल सात जहाज इस जलडमरूमध्य से गुजरे, जबकि पिछले 10 दिनों का औसत करीब 14 जहाज प्रतिदिन था। अब अगर हूती बाब-अल-मंदेब के आसपास अपना नियंत्रण मजबूत कर लेते हैं, तो सऊदी अरब के लिए अपने तेल को लाल सागर के रास्ते अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाना और मुश्किल हो सकता है।
सऊदी तेल निर्यात पर बड़ा खतरा
सऊदी अरब दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक है और बाब-अल-मंदेब उसके लिए होर्मुज का एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक रास्ता है। Reuters के अनुसार बाब-अल-मंदेब से जून में वैश्विक तेल उत्पादन का करीब 7 प्रतिशत हिस्सा गुजर रहा था। वहीं सामान्य परिस्थितियों में दुनिया के लगभग 12 प्रतिशत माल की आवाजाही इस समुद्री मार्ग से होती है। यदि हूती इस इलाके में समुद्री यातायात को बाधित करने की स्थिति में पहुंचते हैं, तो जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी सिरे केप ऑफ गुड होप के रास्ते भेजना पड़ सकता है। इससे यात्रा में कई सप्ताह की देरी और परिवहन लागत में भारी बढ़ोतरी हो सकती है।2023 से ही हूतियों ने लाल सागर को बनाया निशानाः हूतियों ने 2023 के आखिर में लाल सागर और बाब-अल-मंदेब इलाके में जहाजों पर हमले शुरू किए थे। उनका कहना था कि वे ग़ज़ा में फिलिस्तीनियों के समर्थन में इसराइल से जुड़े जहाजों को निशाना बना रहे हैं। इन हमलों के बाद कई बड़ी शिपिंग कंपनियों ने स्वेज नहर के रास्ते से अपने जहाज हटाकर अफ्रीका के चारों ओर भेजना शुरू कर दिया था। इससे माल ढुलाई की लागत और यात्रा का समय दोनों बढ़ गए। AP के अनुसार बाब-अल-मंदेब से गुजरने वाले जहाजों की संख्या हूती हमलों के बाद करीब 60 प्रतिशत तक घट चुकी है।
अब निशाने पर सऊदी अरब
इस बार हूतियों का अभियान सिर्फ इजरायल से जुड़े जहाजों तक सीमित नहीं दिख रहा। उन्होंने सऊदी अरब के खिलाफ भी हमले तेज किए हैं। हाल के दिनों में हूतियों ने दक्षिणी सऊदी अरब में तेल और ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। इसके जवाब में सऊदी समर्थित यमनी बलों ने हूती ठिकानों पर हवाई हमले किए हैं। हूतियों ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी की घोषणा भी की है और लाल सागर के रास्ते सऊदी तेल निर्यात को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं।जुलाई से बिगड़े रिश्ते
सऊदी अरब और हूतियों के बीच तनाव जुलाई में तेजी से बढ़ा। उस समय सऊदी अरब ने ईरान से आने वाले एक विमान को सना में उतरने की अनुमति नहीं दी थी। विमान में हूती नेताओं के होने की बात सामने आई थी। हूतियों ने दावा किया था कि सऊदी युद्धक विमानों ने विमान को सना में उतरने से रोकने की कोशिश की। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच तनाव बढ़ता गया। सऊदी अरब ने बाद में हूतियों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाने की कोशिश भी शुरू की ताकि लाल सागर में समुद्री मार्गों की सुरक्षा की जा सके।ट्रंप क्यों नहीं चाहते नया सैन्य मोर्चाः अमेरिकी रुख से संकेत मिलता है कि ट्रंप प्रशासन फिलहाल ईरान के साथ चल रहे संघर्ष के बीच यमन में एक और बड़ा सैन्य अभियान शुरू करने से बचना चाहता है। अमेरिकी अधिकारियों ने सऊदी पक्ष को बताया है कि अमेरिकी सेनाओं का मुख्य ध्यान ईरान और हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर है। वाशिंगटन लाल सागर को खुला रखने के लिए क्षेत्रीय सहयोगियों की मदद करना चाहता है, लेकिन यमन के व्यापक संघर्ष की जिम्मेदारी सीधे अपने ऊपर लेने से बच रहा है।
यह स्थिति सऊदी अरब के लिए रणनीतिक चुनौती है। एक ओर उसे हूती हमलों से अपने तेल प्रतिष्ठानों और समुद्री मार्गों की रक्षा करनी है, दूसरी ओर अमेरिका से अपेक्षित सीधी सैन्य मदद फिलहाल नहीं मिल रही है।
ईरान को मिल सकता है रणनीतिक फायदा
हूतियों की यह बढ़त केवल यमन का स्थानीय सैन्य घटनाक्रम नहीं है। इसके क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव भी हो सकते हैं। ईरान हूतियों का प्रमुख समर्थक है। अगर हूती बाब-अल-मंदेब के आसपास अपनी स्थिति मजबूत कर लेते हैं, तो तेहरान को पश्चिम एशिया के समुद्री मार्गों पर अतिरिक्त दबाव बनाने की क्षमता मिल सकती है। खासकर उस समय जब हॉर्मुज पहले ही संकट में है। इस तरह ईरान के पास पश्चिम एशिया के दो महत्वपूर्ण समुद्री chokepoints पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डालने की संभावना पैदा हो सकती है—एक तरफ होर्मुज और दूसरी तरफ बाब-अल-मंदेब।सबसे बड़ा सवाल
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सऊदी अरब अकेले हूतियों की बढ़त रोक पाएगा या अमेरिका को अंततः सीधे हस्तक्षेप करना पड़ेगा? फिलहाल ट्रंप प्रशासन का जवाब स्पष्ट है—अमेरिका सऊदी अरब को समर्थन देगा, लेकिन हूतियों के खिलाफ सीधे युद्ध में उतरने से बचना चाहता है। दूसरी तरफ हूती बाब-अल-मंदेब की तरफ बढ़ रहे हैं और मोखा पर कब्जे के बाद उनके सामने अगला रणनीतिक लक्ष्य इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग के आसपास अपनी पकड़ मजबूत करना हो सकता है। इसका मतलब है कि हॉर्मुज संकट के बीच अब लाल सागर और बाब-अल-मंदेब का संकट भी वैश्विक तेल और समुद्री व्यापार के लिए एक नई चुनौती बन गया है।