बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने एक इंटरव्यू में ऐलान किया है कि वे "इसी साल" अपने देश वापस लौटेंगी। यह बयान ऐसे समय में आया है जब कुछ महीने पहले ही बांग्लादेश की एक अदालत ने उनकी गैर-मौजूदगी में उन्हें मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए मौत की सजा सुनाई है।
NDTV को दिए एक इंटरव्यू में शेख हसीना ने कहा कि उन्हें मौत का कोई डर नहीं है। उन्होंने अपने खिलाफ आए अदालती फैसले को "अवैध, असंवैधानिक और राजनीतिक रूप से प्रेरित प्रक्रिया का हिस्सा" बताया। शेख हसीना ने इंटरव्यू में कहा, "मेरे खिलाफ कई साजिशें रची गईं। लेकिन साजिश के हर जाल को तोड़ते हुए... जनता के वोटों से मैं पांच बार प्रधानमंत्री चुनी गई और बांग्लादेश के अभूतपूर्व विकास के लिए काम किया।" जब उनसे पूछा गया कि क्या वे मौत की सजा के फैसले के बावजूद वापस जाएंगी, तो उन्होंने साफ किया, "मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहती हूं: हर बाधा और हर साजिश को पार करते हुए, मैं इस साल अपने देश लौटूंगी।"

बांग्लादेश से भागने के बाद का पहला बयान 

78 वर्षीय शेख हसीना अगस्त 2024 में छात्रों के नेतृत्व में हुए एक बड़े विद्रोह के बाद बांग्लादेश से भागकर पड़ोसी देश भारत आ गई थीं। इस विद्रोह के साथ ही उनके 15 साल के कड़े शासन का अंत हो गया था। तब से उन्हें सार्वजनिक रूप से नहीं देखा गया है, सिवाय जनवरी में नई दिल्ली के एक प्रेस क्लब में दिए गए उनके भाषण के।
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पिछले साल नवंबर में ढाका की एक अदालत ने शेख हसीना को हिंसा भड़काने, हत्या का आदेश देने और अत्याचारों को रोकने में नाकाम रहने का दोषी पाते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। इसके साथ ही उनकी पूर्व सत्तारूढ़ पार्टी 'अवामी लीग' की गतिविधियों को भी गैरकानूनी घोषित कर दिया गया है।

भारत-बांग्लादेश संबंध

फरवरी में बांग्लादेश में हुए आम चुनावों में प्रधानमंत्री तारिक रहमान की पार्टी को मिली भारी जीत के बाद दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार आया है। हालांकि, शेख हसीना के प्रत्यर्पण (Extradition) को लेकर दोनों देशों के बीच अभी भी तनाव बना हुआ है, क्योंकि बांग्लादेश लगातार भारत से उन्हें सौंपने की मांग कर रहा है।
बांग्लादेश में शेख हसीना के खिलाफ वहां की ट्रिब्यूनल और अदालतों में मुख्य रूप से मानवता के खिलाफ अपराध (Crimes against humanity) और सामूहिक हत्याओं से जुड़े गंभीर आरोप लगे हैं।
सामूहिक नरसंहार और हत्याएं (Mass Killings): शेख हसीना पर जुलाई और अगस्त 2024 में हुए छात्र आंदोलन (Anti-Discrimination Student Movement) के दौरान प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक और घातक बल प्रयोग करने का आरोप है। इस हिंसा में लगभग 1,000 से अधिक लोग (जिनमें अधिकांश छात्र और आम नागरिक थे) मारे गए थे।

हिंसा भड़काने का आदेश (Instigation of Violence): उन पर आरोप है कि उन्होंने प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए कानून प्रवर्तन एजेंसियों (पुलिस और रैपिड एक्शन बटालियन) और अपनी पार्टी 'अवामी लीग' के कार्यकर्ताओं को प्रदर्शनकारियों को किसी भी तरह दबाने और उन पर गोलियां चलाने के सीधे आदेश दिए थे।

अत्याचार रोकने में विफलता: सुरक्षा बलों द्वारा किए जा रहे मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन और निहत्थे नागरिकों पर की जा रही ज्यादतियों को जानबूझकर न रोकने का दोषी माना गया।

शेख हसीना को सज़ा-ए-मौत का आधार (Grounds for Death Penalty)

ढाका की अदालत और इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने उन्हें मुख्य रूप से इन कानूनी और तथ्यात्मक आधारों पर मौत की सजा सुनाई:

मानवता के खिलाफ अपराध: अदालत ने पाया कि छात्र आंदोलन के दौरान हुई मौतें कोई सामान्य कानून-व्यवस्था का मामला नहीं थीं, बल्कि राज्य प्रायोजित (State-sponsored) हिंसा थी, जो मानवता के खिलाफ अपराध की श्रेणी में आती है।

कमांड रिस्पॉन्सिबिलिटी (Command Responsibility): कानूनी रूप से सरकार और सुरक्षा बलों की सर्वोच्च कमांडर होने के नाते, उनके शासनकाल में हुए इन सभी अपराधों की सीधी जिम्मेदारी शेख हसीना पर तय की गई।

गैर-मौजूदगी में मुकदमा (Trial in Absentia): चूंकि शेख हसीना अगस्त 2024 में देश छोड़कर भारत आ गई थीं, इसलिए अदालत ने उनके देश में मौजूद न होने पर भी मामले की गंभीरता को देखते हुए कानूनन उनकी गैर-मौजूदगी में ही मुकदमा चलाया और उपलब्ध गवाहों व सबूतों (जैसे डिजिटल फुटेज और आधिकारिक आदेशों) के आधार पर उन्हें दोषी करार दिया।
इसके अतिरिक्त, बांग्लादेश की वर्तमान अंतरिम/नवनिर्वाचित सरकार के तहत उनकी पार्टी 'अवामी लीग' की गतिविधियों को भी इन्हीं आधारों पर गैरकानूनी घोषित कर दिया गया है।