इसराइल में ही एक नए सर्वे में ईरान को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। क़रीब 92 फीसदी इसराइली नागरिक मानते हैं कि ईरान के साथ हालिया जंग और अमेरिका-ईरान डील में ईरान ने जीत हासिल की है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी समर्थकों में तो यह संख्या और ज़्यादा 93.1 फीसदी है। नेतन्याहू की खुद की लोकप्रियता भी गर्त में जा रही है और जून में तो यह गिरकर क़रीब 29 फीसदी तक पहुँच गई है। अधिकतर लोगों का तो यह भी मानना है कि इस संघर्ष में इसराइल की सुरक्षा लंबे समय में कम हुई है। तो अपने घर में इतना बड़ा अविश्वास का सामना कर रहे नेतन्याहू लेबनान के ख़िलाफ़ हमले क्यों कर रहे हैं? वह भी तब जब डोनाल्ड ट्रंप और जेडी वेंस तक नेतन्याहू और इसराइल तक को धमका रहे हैं। इस सवाल का जवाब इस सर्वे के नतीजों में साफ़-साफ़ पता चलता है।

हिब्रू यूनिवर्सिटी और अगम इंस्टीट्यूट ने यह सर्वे 17 से 20 जून के बीच किया। सर्वे में 3644 इसराइलियों से राय ली गई। सर्वे में लोगों की उम्र 17 साल से ज्यादा थी और नतीजे पूरे देश की आबादी को दिखाते हैं। सर्वे में ही कहा गया है कि अधिकतम गलती की गुंजाइश सिर्फ 2.2% है। तो यदि किसी को इस सर्वे पर कोई शक भी हो तो आँकड़ों को 2.2 फीसदी घटा-बढ़ा कर देख सकता है। ऐसा करने पर भी सर्वे के नतीजे ज़्यादा नहीं बदलते दिखते हैं।
ताज़ा ख़बरें
टाइम्स ऑफ इसराइल ने सर्वे के इन आँकड़ों को प्रकाशित किया है। इसकी रिपोर्ट के अनुसार 92.1% इसराइलियों का मानना है कि ईरान इस मुकाबले में जीत गया है। यही नहीं, दक्षिणपंथियों में तो और भी ज़्यादा ख़राब स्थिति दिखती है। नेतन्याहू के दक्षिणपंथी समर्थकों में भी 93.1% लोगों ने यही कहा कि ईरान जीत गया। सर्वे के नतीजे दिखाते हैं कि 82.9% लोगों का कहना है कि ईरान पर छह हफ्ते की कार्रवाई से इसराइल की लंबे समय की सुरक्षा कमजोर हुई है। सर्वे के अनुसार 86% लोगों को लड़ाई के नतीजे और अमेरिका-ईरान डील से नाराजगी है। जबकि इस डील में तो इसराइल की कोई भूमिका भी नहीं है।

इसराइल लक्ष्य पाने में नाकाम

यही नहीं, सर्वे में यह भी पूछा गया कि क्या इसराइल ने अपने लक्ष्य पा लिए? इस पर 87.8% इसराइली मानते हैं कि इसराइल अपना मकसद पूरी तरह या ज्यादातर हासिल नहीं कर सका। इसका मक़सद ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम खत्म करना, मिसाइल खतरे को खत्म करना और रिजीम बदलना रहा है।

सर्वे में पूछा गया कि क्या हमास और हिजबुल्लाह के खिलाफ पूरी जीत का लक्ष्य हासिल हुआ? सिर्फ 12.2% ने कहा कि ज्यादातर लक्ष्य पूरे हुए। 61.3% ने कहा कि बिल्कुल नहीं हुए। 26.5% ने कहा कि कुछ लक्ष्य पूरे हुए।

नेतन्याहू की बातों पर लोगों को भरोसा ही नहीं!

सर्वे के नतीजों से पता चला कि इसराइल के नेतृत्व पर भरोसे का बड़ा संकट है। सर्वे में शामिल लोगों में से लगभग तीन-चौथाई यानी 72.5% ने कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की इस बात पर यकीन नहीं है कि इसराइल को बड़ी कामयाबी मिली है और उसने अस्तित्व के लिए खतरा बने संकट को खत्म कर दिया है। वहीं 56.4% लोगों ने युद्ध के दौरान उनके कामकाज को असफल या खराब बताया। हालात ऐसे हैं कि सर्वे में शामिल सिर्फ़ 26.5% लोगों ने प्रधानमंत्री के हमले के मैनेजमेंट को अच्छा या बेहतरीन माना। 17.1% लोगों ने इसे ठीक-ठाक कहा।

इस सर्वे से नेतन्याहू को जो राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ी है उसका भी पता चला। उनके प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन मार्च की शुरुआत में 40.5% से गिरकर जून में 29.4% रह गया।

ट्रंप के ख़िलाफ़ भी ग़ुस्सा

इसराइली लोगों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ख़िलाफ़ भी ग़ुस्सा है। 69.1% इसराइलियों ने ट्रंप के जंग प्रबंधन को असफल या खराब बताया। वहीं, सर्वे में लेबनान में हिजबुल्लाह के ख़िलाफ़ मिलिट्री एक्शन के लिए लगातार समर्थन भी देखा गया।

जब लोगों से पूछा गया कि क्या इसराइल को हिजबुल्लाह के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर मिलिट्री एक्शन फिर से शुरू करना चाहिए- भले ही इससे ट्रंप के साथ टकराव का जोखिम हो क्योंकि उन्होंने लेबनान में लड़ाई पर नाराज़गी जताई है? तो 48.2% लोगों ने कहा कि ऐसा करना चाहिए। इसके उलट, 20.9% लोग इस विकल्प से सहमत नहीं थे और 30.9% लोगों ने कहा कि उन्हें इस बारे में पक्का पता नहीं है।
दुनिया से और खबरें

क्यों जारी हैं लेबनान पर हमले?

नेतन्याहू सरकार में कम होते विश्वास और खुद नेतन्याहू की लोकप्रियता में कमी को दिखाने वाले सर्वे आने के बाद अब यह सवाल उठ रहे हैं कि आख़िर ट्रंप की चेतावनी के बावजूद इसराइल लेबनान पर हमला क्यों कर रहा है? क्या लेबनान पर लगातार हमले नेतन्याहू की राजनीतिक मजबूरी बन गए हैं?

यह सर्वे इसराइल में नेतृत्व पर गहरे संकट को दिखाता है। ईरान के साथ जंग के बाद लोगों में निराशा बहुत ज़्यादा है। ऐसे में नेतन्याहू के लिए लेबनान पर हमले जारी रखना अपनी राजनीतिक पोजीशन मजबूत करने का तरीका भी हो सकता है। इसराइल की जनता हिजबुल्लाह जैसे खतरों को पूरी तरह खत्म करना चाहती है, भले ही इसके लिए और लड़ाई लड़नी पड़े। तो क्या नेतन्याहू जनता की इस भावना को भुनाने की कोशिश में लगे हैं? बहरहाल, यह स्थिति इसराइल की घरेलू राजनीति और क्षेत्रीय सुरक्षा दोनों को प्रभावित कर रही है।