बांग्लादेश में तारिक रहमान के पीएम पद की शपथ लेते ही नयी सरकार तो बन गई, लेकिन विवाद अभी भी थमा नहीं है। जमात गठबंधन ने सड़क पर उतर प्रदर्शन की धमकी दी है। ऐसा तब हुआ जब नए चुने गए सांसदों ने मंगलवार को संसद सदस्य के रूप में तो शपथ ली, लेकिन बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी बीएनपी ने दूसरी शपथ लेने से इनकार कर दिया। यह दूसरी शपथ 'कॉन्स्टिट्यूशन रिफॉर्म कमीशन' यानी संविधान सुधार आयोग के सदस्य के रूप में लेनी थी। दूसरी बार शपथ लेने से इनकार पर जमात-ए-इस्लामी और एनसीपी यानी नेशनल सिटिजन्स पार्टी में भारी गुस्सा है। उन्होंने पहले तो शपथ का बहिष्कार करने की धमकी दी थी, लेकिन बाद में दोनों पार्टियों के सांसदों ने शपथ ली।

'कॉन्स्टिट्यूशन रिफॉर्म कमीशन' को जुलाई चार्टर भी कहा जा रहा है। शेख हसीना सरकार के खिलाफ जैसा सड़क पर प्रदर्शन देखा गया था, वैसा ही प्रदर्शन इस जुलाई चार्टर को लेकर बांग्लादेश में वापस आ सकता है। तारिक रहमान की सरकार के शपथ ग्रहण के दिन जमात और एनसीपी ने सड़क पर विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी है और बीएनपी को फासीवादी ताकत बताया है।

क्या हुआ था चुनाव में?

यह तनातनी दो शपथों को लेकर पैदा हुई है जो सभी चुने हुए सांसदों को लेनी थीं। ये दो शपथ चुनाव के दिन दो दो मतदान से जुड़ी थीं। बांग्लादेश में लोगों ने 12 फरवरी को अपने सांसद चुनने के लिए तो वोट किया ही था, जुलाई चार्टर पर एक रेफरेंडम में भी हिस्सा लिया था। चुनाव में बीएनपी ने धांधली के आरोपों के बीच 209 सीटें जीतकर दो-तिहाई बहुमत हासिल किया। जुलाई चार्टर रेफरेंडम में 62% ने 'हां' में वोट किया। इसका मतलब हुआ कि रेफ़रेंडम में लोगों ने 'कॉन्स्टिट्यूशन रिफॉर्म कमीशन' के गठन वाले जुलाई चार्टर का पक्ष लिया।

यह 'जुलाई चार्टर' संसद को 180 दिनों के लिए संविधान सभा बनाने की बात करता है, ताकि संविधान में बड़े बदलाव किए जा सकें। यह बदलाव 2024 के छात्र आंदोलन से आए थे, जिसने शेख हसीना की सरकार गिराई थी।

दो शपथ क्यों?

संसद सदस्यों को दो शपथ लेनी थीं। एक तो, सामान्य संसद सदस्य के रूप में। और दूसरी, संविधान सुधार आयोग के सदस्य के रूप में, जो जुलाई चार्टर को लागू करने के लिए है। विवाद तब हुआ जब बीएनपी ने कहा कि वे सिर्फ पहली शपथ लेंगे।

बीएनपी के वरिष्ठ नेता सलाहुद्दीन अहमद ने तारिक रहमान की मौजूदगी में घोषणा की कि बीएनपी सांसद संविधान सुधार आयोग की शपथ नहीं लेंगे। उन्होंने कारण यह बताया कि संविधान में अभी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। पहले इसे संविधान में शामिल करना होगा। बीएनपी ने चार्टर पर हस्ताक्षर तो किए थे, लेकिन कई प्रावधानों से असहमत है और कहती है कि उनसे सलाह नहीं ली गई।

जमात और एनसीपी की नाराजगी

विवाद के बीच जमात-ए-इस्लामी के डिप्टी चीफ सैयद अब्दुल्लाह मुहम्मद ताहेर ने दिन में कहा दिया था, 'अगर बीएनपी संविधान सुधार आयोग की शपथ नहीं लेगी तो हम भी कोई शपथ नहीं लेंगे। बिना सुधार वाली संसद बेमानी है।' हालाँकि, पार्टी के सांसदों ने बाद में शपथ ली।
 
हसीना सरकार गिराने में बड़ी भूमिका निभाने वाली युवाओं की पार्टी एनसीपी ने भी पहले बहिष्कार की बात की थी। एनसीपी की मोनिरा शर्मिन और अब्दुल्लाह अल अमीन ने कहा था कि वे विचार कर रहे हैं कि शपथ न लें। लेकिन बाद में 11 पार्टियों के गठबंधन में चर्चा हुई। जमात के सांसदों ने दोपहर 12:23 बजे संसद सदस्य की शपथ ली और 12:27 बजे सुधार आयोग की शपथ ली। एनसीपी के 6 सांसदों ने भी दोपहर 1:30 बजे दोनों शपथें लीं।

सड़क पर विरोध की धमकी

जमात के सेक्रेटरी जनरल मिया गोलाम परवार ने कहा कि चुनाव में धांधली, अनियमितताएं और चुनाव बाद हिंसा से लोगों के सपने टूट गए। उन्होंने नोआखाली में एक महिला के साथ गैंग-रेप का ज़िक्र किया, जो एनसीपी को वोट देने वाली थी। उन्होंने इसे फासीवाद कहा। ऐसा ही आरोप पहले हसीना पर लगता था।
एनसीपी के नासिरुद्दीन पटवारी ने कहा कि महिलाओं पर अत्याचार के खिलाफ सड़क पर आंदोलन जारी रहेगा। वे तारिक रहमान को जवाबदेह ठहराएंगे। उन्होंने कहा, 'हम सिर्फ अल्लाह से डरते हैं, उम्मीद मत छोड़ो।'

बीएनपी की सरकार बन गई है। तारिक रहमान ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ले ली है। लेकिन संविधान सुधार पर मतभेद से राजनीतिक तनाव बढ़ सकता है। जमात और एनसीपी सड़क पर उतरने की बात कर रहे हैं। यह बांग्लादेश की नई राजनीति में बड़ा टकराव दिखा रहा है।