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पाकिस्तान में टीएलपी समर्थकों का बवाल, 4 पुलिसकर्मियों की मौत

पड़ोसी मुल्क़ पाकिस्तान में एक बार फिर बवाल हो गया है। दीनी नेता और तहरीक़-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) के मुखिया साद रिज़वी के समर्थकों की पंजाब पुलिस के साथ जबरदस्त झड़प हुई है। इसमें पंजाब पुलिस के चार जवान मारे गए हैं। इमरान ख़ान और पंजाब सूबे की हुक़ूमत रिज़वी के समर्थकों से पूरी कड़ाई से निपट रही है। हालात को देखते हुए पंजाब में दो महीने के लिए पाकिस्तानी रेंजर्स को तैनात कर दिया गया है। 

पंजाब के वज़ीर-ए-आला उस्मान बुज़दार ने गुरूवाई को बुलाई गई आला पुलिस अफ़सरों की बैठक में क़ानून व्यवस्था को लेकर सख़्ती बरतने को कहा है। 

पंजाब पुलिस का कहना है कि उसके 263 जवान जख़्मी भी हुए हैं और इनमें से कई की हालत गंभीर है। टीएलपी समर्थकों के साथ ये झड़पें मुरीदके और साधुके इलाक़ों में हुई हैं। 

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पंजाब पुलिस का कहना है कि टीएलपी के समर्थकों के पास ऑटोमैटिक हथियार थे और उन्होंने पुलिस पर सीधी फ़ायरिंग की। जबकि टीएलपी का कहना है कि पुलिस ने उनके शांतिपूर्ण मार्च पर ताक़त का इस्तेमाल किया। 
TLP police clash in pakistan  - Satya Hindi

इसलामाबाद की ओर मार्च 

टीएलपी के समर्थक बीते कई दिनों से धरना दे रहे हैं और इसलामाबाद की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। पुलिस उन्हें रोकने की कोशिश कर रही थी जिसके बाद वे भड़क गए और पुलिस के जवानों को मौत के घाट उतारने के साथ ही सरकारी संपत्तियों को भी नुक़सान पहुंचाया। 

टीएलपी की कमान मौलाना साद रिज़वी के वालिद और मशहूर मौलाना अल्लामा खादिम हुसैन रिज़वी संभालते थे। उनके इंतकाल के बाद इसकी कमान साद रिज़वी के पास है। पाकिस्तान में टीएलपी के कार्यकर्ताओं की अच्छी-खासी संख्या है।  

TLP police clash in pakistan  - Satya Hindi
अल्लामा खादिम हुसैन रिज़वी और साद रिज़वी।

‘टीएलपी अब चरमपंथी संगठन’

इमरान की हुकू़मत के वज़ीर फ़वाद चौधरी ने कहा कि इमरान ख़ान ने भी इस मामले में बैठक की है और इसमें आर्मी और ख़ुफ़िया एजेंसी के आला अफ़सर मौजूद रहे। उन्होंने कहा कि बैठक में यह फ़ैसला लिया गया है कि टीएलपी के साथ अब सियासी जमात की तरह नहीं बल्कि चरमपंथी संगठन की तरह बर्ताव किया जाएगा। फ़वाद ने कहा कि टीएलपी को भारत में सक्रिय कुछ तंजीमों से पैसा मिल रहा है। 

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क्या है टीएलपी समर्थकों की मांग?

टीएलपी समर्थकों का कहना है कि साद रिज़वी को रिहा किया जाए। रिज़वी को पिछले साल अप्रैल में गिरफ़्तार कर लिया गया था। इसके अलावा फ्रांस के दूतावास को बंद करने और इसके राजदूत को वापस भेजने की मांग भी टीएलपी के समर्थकों की है। 

क्या है विवाद?

बीते साल फ्रांस की राजधानी पेरिस में एक शिक्षक ने कक्षा में अपने छात्रों को पैगंबर मुहम्मद का कार्टून दिखाया था, इसके बाद एक मुसलिम लड़के ने उस शिक्षक की हत्या कर दी थी। शिक्षक की हत्या के बाद फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ा था। इसके बाद मैक्रों के ख़िलाफ़ कई इसलामिक देशों में प्रदर्शन हुए थे। 

पाकिस्तान में अल्लामा खादिम हुसैन रिज़वी के नेतृत्व में बीते साल टीएलपी समर्थक सड़कों पर उतर आए थे। उनकी मांग थी कि फ्रांस के राजदूत को पाकिस्तान में न रखा जाए। उस वक़्त जैसे-तैसे इमरान सरकार ने टीएलपी के समर्थकों को रोका था और कहा था कि वह फरवरी, 2021 तक फ्रांस के राजदूत को हटा देगी। लेकिन ऐसा न होने पर टीएलपी समर्थकों ने मार्च-अप्रैल में फिर से बवाल कर दिया था। 

लेकिन इमरान की हुक़ूमत ने साफ कहा है कि वह टीएलपी की इस मांग को क़तई नहीं मानेगी कि वह फ़्रांस के दूतावास को बंद कर दे।

रमज़ान से पहले किया था बवाल 

इस साल अप्रैल में रमज़ान से ठीक पहले भी टीएलपी के समर्थकों ने जबरदस्त बवाल किया था। टीएलपी के समर्थकों ने लाहौर व कई अन्य इलाक़ों की सड़कों को कब्जे में ले लिया था और पुलिस की कई गाड़ियों में आग लगाने के साथ ही आम लोगों के वाहनों, संपत्तियों में भी तोड़फोड़ की थी। उस वक़्त भी छह पुलिसकर्मी मारे गए थे और 700 से ज़्यादा घायल हुए थे। साथ ही कई आम लोगों को भी जान गंवानी पड़ी थी। 

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टीएलपी के समर्थक आज इमरान की हुक़ूमत के लिए आफ़त बन गए हैं लेकिन 2014 में इमरान ख़ान ने उस वक़्त की मौजूदा नवाज़ शरीफ़ की हुक़ूमत को गिराने के लिए देश निकाला दिए जा चुके पाकिस्तान अवामी तहरीक के दीनी नेता ताहिर उल क़ादरी के साथ धरना दिया था और मार्च निकाला था। 

ईशनिंदा क़ानून की कट्टर समर्थक 

टीएलपी की स्थापना खादिम हुसैन रिज़वी ने 2016 में की थी। सुन्नी बरेलवी विचारधारा को मानने वाली टीएलपी ईशनिंदा क़ानून की कट्टर समर्थक है। 

2018 के आम चुनाव में टीएलपी के 744 उम्मीदवार मैदान में उतारे थे और सिंध सूबे में दो सीटें जीती थीं। साथ ही अच्छी संख्या में वोट भी हासिल किए थे। खादिम हुसैन रिज़वी की वजह से पंजाब में नवाज़ शरीफ़ की पार्टी को खासा नुक़सान भी हुआ था। 

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