2025 में भारत ने अमेरिका को लगभग 9.7 अरब डॉलर यानी क़रीब 93 हज़ार करोड़ रुपये की दवाएं निर्यात की थीं। ट्रंप के 200 प्रतिशत टैरिफ़ लगने के बाद दवाएँ तीन गुनी महंगी हो जाएँगी तो दूसरी दवाओं के सामने भारतीय दवाओं का टिकना मुश्किल हो जाएगा।
डोनाल्ड ट्रंप ने अब उन जेनेरिक दवाओं के आयात पर 200 फीसदी तक टैरिफ़ लगाने का फ़ैसला लिया है जिसका भारत से सबसे ज़्यादा निर्यात अमेरिका को होता है। ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका में आयात होने वाली जेनेरिक दवाओं पर अभी दो साल तक कोई टैरिफ़ नहीं लगाया जाएगा, लेकिन उसके बाद इन पर चरणबद्ध तरीके से 100% और फिर 200% तक टैरिफ लगाया जाएगा। उनकी योजना है कि विदेश की कंपनियाँ अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट खोलें।
ट्रंप का कहना है कि इस क़दम का मक़सद दवा निर्माण वाली कंपनियों को वापस अमेरिका लाना और विदेशी कंपनियों को अमेरिका में फैक्ट्री लगाने के लिए प्रोत्साहित करना है। इस फ़ैसले का सबसे अधिक असर भारत पर पड़ सकता है, क्योंकि भारत दुनिया में जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा निर्यातक देशों में शामिल है। अब यदि 200 फीसदी तक टैरिफ़ लगा तो 100 रुपये की दवाएँ 300 रुपये की हो जाएँगी। जाहिर है ऐसे में भारत की जेनरिक दवाओं का अमेरिकी कंपनियों की दवाओं के सामने टिकना मुश्किल हो जाएगा।
ट्रंप की घोषणा में बड़ी बात क्या?
डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि 1 अगस्त 2026 से अमेरिका में आने वाली जेनेरिक दवाओं पर अगले दो वर्षों तक शून्य टैरिफ रहेगा। इसके बाद तीसरे वर्ष 100% टैरिफ लगाया जाएगा और उसके बाद 200% टैरिफ लागू होगा। ट्रंप ने कहा कि जो कंपनियां तय समय के भीतर अमेरिका में अपने प्लांट और उत्पादन इकाइयां नहीं लगाएंगी, उन्हें भारी शुल्क देना होगा। उन्होंने कहा कि यह नीति अमेरिका में दवा निर्माण बढ़ाने और देश को आयातित दवाओं पर निर्भरता से बाहर निकालने के लिए बनाई गई है।
ट्रंप ने साफ़ किया कि यह फ़ैसला केवल जेनेरिक दवाओं पर लागू होगा। उन्होंने कहा कि पेटेंट, ब्रांडेड और इनोवेटिव दवाओं से जुड़ी मौजूदा नीति में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।
भारत पर क्यों पड़ेगा सबसे ज्यादा असर?
भारत को अक्सर 'दुनिया की फार्मेसी' कहा जाता है क्योंकि यहाँ कम क़ीमत पर बड़ी मात्रा में जेनेरिक दवाओं का उत्पादन होता है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशियटिव की रिपोर्ट के अनुसार 2025 में भारत ने अमेरिका को लगभग 9.7 अरब डॉलर यानी क़रीब 93 हज़ार करोड़ रुपये की दवाएँ निर्यात कीं। यह भारत के कुल दवा निर्यात 25.8 अरब डॉलर का क़रीब 38 प्रतिशत है। यानी भारत के लिए अमेरिका सबसे बड़ा दवा बाजारों में से एक है।
अमेरिका में भारतीय दवाओं की बड़ी हिस्सेदारी
अमेरिका में मिलने वाली जेनेरिक दवाओं का बड़ा हिस्सा भारतीय कंपनियाँ उपलब्ध कराती हैं। स्वास्थ्य क्षेत्र की रिसर्च संस्था IQVIA के अनुसार अमेरिका में 47 प्रतिशत जेनेरिक प्रिस्क्रिप्शन भारतीय कंपनियों की दवाओं से पूरे होते हैं। भारतीय दवाएँ मुख्य रूप से मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हाई कोलेस्ट्रॉल, कैंसर, संक्रमण, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों में इस्तेमाल होती हैं।अमेरिकी बाजार में भारत की कई बड़ी दवा कंपनियों की मज़बूत मौजूदगी है। इनमें सन फार्मा, सिप्ला, डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज प्रमुख हैं। ये कंपनियाँ अमेरिका में बड़ी मात्रा में जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति करती हैं। भारत में बनी कई सामान्य दवाएँ अमेरिका में रोजाना लाखों मरीजों द्वारा इस्तेमाल की जाती हैं। इनमें Metformin, Atorvastatin, Losartan, Amoxicillin, Ciprofloxacin जैसी दवाएँ काफी ज़्यादा मात्रा में अमेरिका में इस्तेमाल की जाती हैं।
ट्रंप ऐसा क्यों करना चाहते हैं?
ट्रंप का कहना है कि अमेरिका को दवा निर्माण में आत्मनिर्भर बनाना ज़रूरी है। उनका मानना है कि यदि विदेशी कंपनियाँ अमेरिका में उत्पादन शुरू करेंगी तो नई नौकरियां पैदा होंगी, घरेलू उद्योग मजबूत होगा और विदेशों पर निर्भरता कम होगी। इसी मक़सद से उन्होंने विदेशी कंपनियों पर भारी टैरिफ लगाने की योजना बनाई है।
अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन यानी एफ़डीए के अनुसार अमेरिका में लिखे जाने वाले 90 प्रतिशत से अधिक प्रिस्क्रिप्शन जेनेरिक दवाओं के होते हैं। यानी यदि आयात महंगा होता है तो दवाओं की क़ीमत और स्वास्थ्य व्यवस्था दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता पर भी असर
ट्रंप की यह घोषणा तब की गई है जब भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत अंतिम चरण में बताई जा रही है। इसके अलावा ट्रंप प्रशासन कई देशों पर नए आयात शुल्क लगाने की तैयारी भी कर रहा है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार क़रीब 60 देशों के उत्पादों पर 10 से 12.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ़ लगाने पर भी विचार किया जा रहा है।
जानकारों का मानना है कि यदि ट्रंप की यह योजना पूरी तरह लागू होती है तो भारतीय दवा कंपनियों की अमेरिका में प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है। ऐसा इसलिए कि अमेरिका में मौजूदा क़ीमतों के हिसाब से भारतीय दवाओं का इस्तेमाल काफी ज़्यादा हो रहा है। लेकिन जब 100 रुपये की दवा 200 फीसदी तक टैरिफ़ लगने के बाद एकाएक 300 रुपये की हो जाएगी तो मरीज इसकी अपेक्षा सस्ती दवाएँ ख़रीदना पसंद करेंगे। यदि ये कंपनियाँ टैरिफ़ से बचना चाहेंगी तो इसके लिए उन्हें दवा बनाने की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट अमेरिका में लगानी होगी।
इसके साथ ही अमेरिकी मरीजों के लिए सस्ती जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता और क़ीमतों पर भी असर पड़ सकता है। हालाँकि यह व्यवस्था चरणबद्ध तरीक़े से लागू होगी, इसलिए कंपनियों के पास अमेरिका में निवेश या अपनी रणनीति बदलने के लिए कुछ समय रहेगा।