ईरान में परमाणु एनरिचमेंट का आरोप लगाते हुए हमला कर रहे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब ईरान के विरोधी पड़ोसी देश सऊदी अरब के साथ एक परमाणु समझौते को मंजूरी दी है। इसके तहत सऊदी अपने नागरिक रिएक्टरों के लिए परमाणु ईंधन संवर्धित कर सकेगा।
डोनाल्ड ट्रंप और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान
ईरान में जिस परमाणु संवर्धन को लेकर डोनाल्ड ट्रंप ने युद्ध छेड़ रखा है, अब उसी परमाणु के नागरिक इस्तेमाल को लेकर उन्होंने सऊदी अरब के साथ एक परमाणु समझौते को मंजूरी दे दी है। इस समझौते के तहत सऊदी अरब को अपने नागरिक परमाणु रिएक्टरों के लिए परमाणु ईंधन तैयार करने की दिशा में काम करने की मंजूरी मिलेगी। यह फ़ैसला तब आया है जब अमेरिका लगातार ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंता जताता रहा है और ईरान पर संवर्धित यानी एनरिच्ड यूरेनियम का बड़ा भंडार रखने का आरोप लगाता रहा है।
ईरान और सऊदी अरब एक-दूसरे के विरोधी देश हैं। ईरान के पास संवर्धित यूरेनियम होने के बाद अब उसके पड़ोसी देश सऊदी अरब के पास यूरेनियम के नागरिक इस्तेमाल की मंजूरी मिलने से मध्य पूर्व में स्थिति बदल सकती है। माना जा रहा है कि इस समझौते का असर सिर्फ अमेरिका और सऊदी अरब तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की रणनीतिक राजनीति पर भी पड़ सकता है।
क्या है नया परमाणु समझौता?
सीएनएन की रिपोर्ट में अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि यह समझौता 30 वर्षों के लिए होगा। इसके तहत अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब में नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के विकास के लिए तकनीक, विशेषज्ञता और बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराएंगी।
हालाँकि शुरुआती चरण में सऊदी अरब को संवेदनशील परमाणु तकनीक सीधे नहीं सौंपी जाएगी। पहले अमेरिका और सऊदी की संयुक्त टीम यह अध्ययन करेगी कि देश में यूरेनियम संवर्धन की ज़रूरत कितनी है और आर्थिक व्यवहार्यता कितनी है। यदि परियोजना आगे बढ़ती है तो संयंत्र का निर्माण अमेरिकी कंपनियां करेंगी, लेकिन शुरुआती वर्षों में संवेदनशील तकनीक का नियंत्रण अमेरिका के पास रहेगा।वाल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट में कहा गया है कि समझौते के मुताबिक़ सऊदी अरब अगले 10 वर्षों तक अपनी स्वतंत्र यूरेनियम संवर्धन तकनीक विकसित नहीं कर सकेगा और न ही किसी अन्य देश से ऐसी तकनीक खरीद सकेगा। अमेरिका का कहना है कि इस व्यवस्था का मक़सद यह सुनिश्चित करना है कि सऊदी का परमाणु कार्यक्रम केवल नागरिक उपयोग तक सीमित रहे।
अंतरराष्ट्रीय निगरानी को लेकर उठे सवाल
यह समझौता इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इसमें वह सख्त अंतरराष्ट्रीय निगरानी व्यवस्था शामिल नहीं है जिसे आमतौर पर परमाणु सहयोग के लिए 'गोल्ड स्टैंडर्ड' माना जाता है। सऊदी अरब को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी IAEA के अतिरिक्त प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर करने की अनिवार्यता नहीं होगी।
बताया जा रहा है कि सऊदी सरकार लंबे समय से इस प्रोटोकॉल का विरोध करती रही है। उसका कहना था कि इससे निरीक्षकों को कुछ संवेदनशील स्थानों तक पहुंच का अधिकार मिल सकता है। सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार इसकी जगह अमेरिका और सऊदी के बीच एक अलग द्विपक्षीय सुरक्षा व्यवस्था बनाई जाएगी, जिसे लागू करने से पहले IAEA बोर्ड की मंजूरी भी जरूरी होगी।ईरान को लेकर क्यों बढ़ी चिंता?
यह समझौता तब सामने आया है जब ईरान के पास बड़ी मात्रा में संवर्धित यूरेनियम मौजूद है। अमेरिका और पश्चिमी देशों का आरोप है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम हथियार बनाने की दिशा में बढ़ सकता है, जबकि तेहरान लगातार कहता रहा है कि उसका कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण और नागरिक उद्देश्यों के लिए है। हाल के महीनों में अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर तनाव भी बढ़ा है।
सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पहले कह चुके हैं कि यदि ईरान कभी परमाणु हथियार विकसित करता है तो सऊदी अरब भी वैसी क्षमता हासिल करने की कोशिश करेगा। यही वजह है कि इस नए समझौते को क्षेत्रीय सुरक्षा और हथियारों की संभावित प्रतिस्पर्धा के नजरिए से भी देखा जा रहा है।
इसराइल का क्या है इंटेरेस्ट?
मध्य पूर्व में इसराइल लंबे समय से किसी भी अरब देश के परमाणु कार्यक्रम को लेकर सतर्क रहा है। हालाँकि इसराइल ने कभी आधिकारिक रूप से परमाणु हथियार होने की पुष्टि नहीं की है, लेकिन माना जाता है कि उसके पास परमाणु क्षमता मौजूद है। ऐसे में सऊदी अरब को परमाणु तकनीक मिलने पर इसराइल की सुरक्षा चिंताएं भी बढ़ सकती हैं।भारत का सऊदी अरब, अमेरिका और पश्चिम एशिया के अन्य देशों के साथ मजबूत आर्थिक और ऊर्जा संबंध हैं। यदि इस समझौते के बाद क्षेत्र में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ती है तो इसका असर वैश्विक तेल बाजार, सुरक्षा समीकरण और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी पड़ सकता है।
बहरहाल, ट्रंप प्रशासन इस समझौते को आधिकारिक घोषणा के बाद अमेरिकी कांग्रेस के पास भेजेगा। वहां इस पर चर्चा और समीक्षा होगी। कुछ सांसदों ने पहले ही आशंका जताई है कि यदि निगरानी पर्याप्त मजबूत नहीं हुई तो भविष्य में यह समझौता विवाद का कारण बन सकता है।
आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि ईरान इस समझौते पर कैसी प्रतिक्रिया देता है और क्षेत्र के अन्य देश इसे किस नजरिए से देखते हैं।