अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने नौकरी जाने के बाद H-1B वीजा धारकों को मिलने वाले 60 दिन के ग्रेस पीरियड को खत्म करने का प्रस्ताव रखा है। इससे भारतीय कर्मचारियों के नौकरी जाने के बाद तुरंत डिपोर्ट किए जाने का ख़तरा रहेगा।
अमेरिका में काम कर रहे लाखों भारतीय आईटी कर्मचारियों के लिए बड़ी चिंता की खबर आई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने H-1B वीजा धारकों को नौकरी छूटने के बाद मिलने वाले 60 दिन के ग्रेस पीरियड को खत्म करने का प्रस्ताव रखा है। यदि यह नियम लागू हो जाता है तो नौकरी जाने के बाद विदेशी कर्मचारियों को तुरंत अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है या उन्हें निर्वासन का सामना करना पड़ सकता है।
अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग ने इस मामले में नया प्रस्ताव जारी किया है, जिसे फिलहाल सार्वजनिक टिप्पणी और आपत्तियों के लिए रखा गया है। इससे पहले पिछले महीने ही अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी ने H-1B वीज़ा से जुड़े कुछ आवेदन पर लगने वाली फीस को बढ़ाकर 1,03,265 डॉलर यानी क़रीब 1 करोड़ रुपये करने का प्रस्ताव रखा था। फीस बढ़ाने वाला यह प्रस्ताव लागू हुआ तो H-1B वीज़ा के लिए आवेदन करना पहले की तुलना में कहीं अधिक महंगा हो जाएगा।
क्या है 60 दिन का ग्रेस पीरियड?
अभी तक अमेरिका में H-1B वीजा पर काम करने वाले किसी विदेशी कर्मचारी की यदि नौकरी चली जाती है तो उसे 60 दिन तक अमेरिका में रहने की अनुमति मिलती है। इस दौरान कर्मचारी नई नौकरी तलाश सकता है, किसी दूसरी कंपनी से H-1B स्पॉन्सरशिप ले सकता है, अपना वीजा स्टेटस बदल सकता है या फिर अमेरिका छोड़ने की तैयारी कर सकता है। यह व्यवस्था 2017 से लागू है और इसे विदेशी पेशेवरों के लिए बड़ी राहत माना जाता रहा है।
नया प्रस्ताव क्या कहता है?
ट्रंप प्रशासन के प्रस्ताव के अनुसार यदि किसी H-1B कर्मचारी की नौकरी ख़त्म हो जाती है तो उसे 60 दिन का समय नहीं मिलेगा। ऐसी स्थिति में कर्मचारी को तुरंत अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है। यदि वह देश में रुकता है तो उसका वीजा स्टेटस प्रभावित हो सकता है। समय पर नया स्पॉन्सर नहीं मिलने पर डिपोर्टेशन की कार्रवाई भी हो सकती है। इस बदलाव से नौकरी जाने के बाद नई कंपनी खोजने का समय लगभग ख़त्म हो जाएगा।
भारतीयों पर सबसे ज्यादा असर क्यों?
H-1B वीजा का सबसे अधिक लाभ भारतीय पेशेवरों को मिलता है। अमेरिका के टेक्नोलॉजी सेक्टर में काम करने वाले लाखों भारतीय इंजीनियर, सॉफ्टवेयर डेवलपर और आईटी विशेषज्ञ इसी वीजा पर कार्यरत हैं। इनमें टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज यानी TCS, इंफोसिस, एचसीएल टेक, एलटीआईमाइंडट्री, डेलॉयट, पीडब्ल्यूसी, अर्न्स्ट एंड यंग जैसी प्रमुख कंपनियां शामिल हैं। यदि प्रस्ताव लागू होता है तो छंटनी की स्थिति में सबसे ज्यादा मुश्किल भारतीय कर्मचारियों को होगी।
H-1B वीज़ा लंबे समय से भारतीय इंजीनियरों, सॉफ्टवेयर डेवलपर्स, डॉक्टरों, वैज्ञानिकों और अन्य पेशेवरों के लिए अमेरिका में नौकरी पाने का सबसे अहम रास्ता रहा है।
अमेरिकी आँकड़ों के अनुसार, H-1B वीज़ा पाने वालों में 70 प्रतिशत से अधिक भारतीय होते हैं। इसलिए फीस में इतनी बड़ी बढ़ोतरी भारतीय कंपनियों और पेशेवरों दोनों के लिए चुनौती बन सकती है। यूएस सिटिज़नशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज़ ने 2024 में 399,402 H-1B याचिकाओं को मंज़ूरी दी थी। इनमें से 71 प्रतिशत भारत में जन्मे लोगों को वीजा मिले थे।
परिवारों पर भी पड़ेगा असर
60 दिन का ग्रेस पीरियड केवल नौकरी खोजने के लिए ही नहीं बल्कि परिवार से जुड़े जरूरी काम पूरे करने के लिए भी अमह माना जाता है। इस दौरान कर्मचारी बच्चों की पढ़ाई से जुड़े निर्णय ले सकते हैं, घर खाली करने या संपत्ति बेचने की व्यवस्था कर सकते हैं, बैंक और अन्य कानूनी प्रक्रियाएं पूरी कर सकते हैं। नया नियम लागू होने पर इन सभी कार्यों के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलेगा।
इमिग्रेशन विशेषज्ञों ने जताई चिंता
अमेरिकी इमिग्रेशन कानून विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव विदेशी कर्मचारियों और कंपनियों दोनों के लिए चुनौतीपूर्ण होगा। बरार्डी इमिग्रेशन लॉ के वकीलों के अनुसार इस नियम से कंपनियों के मानव संसाधन विभागों के लिए विदेशी कर्मचारियों की छंटनी और उनकी कानूनी प्रक्रिया संभालना काफी मुश्किल हो जाएगा।
किन-किन वीजा धारकों पर पड़ेगा असर?
यह प्रस्ताव केवल H-1B वीजा तक सीमित नहीं है। यदि नियम लागू हुआ तो E-1 अंतरराष्ट्रीय व्यापार वीजा, E-2 कमर्शियल ऑपरेटर, L-1 मल्टीनेशनल कंपनियों के अधिकारी, O-1 असाधारण प्रतिभा वाले पेशेवर, TN प्रोफेशनल वर्कर, H-1B1 (सिंगापुर और चिली) और E-3 (ऑस्ट्रेलिया) वीजा श्रेणियों के लोग भी प्रभावित होंगे।डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य अमेरिकी नागरिकों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाना है। प्रशासन का तर्क है कि यदि विदेशी कर्मचारी तुरंत देश छोड़ेंगे तो कंपनियां उन्हीं पदों पर योग्य अमेरिकी नागरिकों को नौकरी दे सकेंगी।
फीस 1 करोड़ करने का प्रस्ताव पहले ही आ चुका है
पिछले महीने ही अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी ने H-1B वीज़ा से जुड़े कुछ आवेदन पर लगने वाली फीस को बढ़ाकर 1,03,265 डॉलर यानी क़रीब 1 करोड़ रुपये करने का प्रस्ताव रखा था। यह प्रस्ताव लागू हुआ तो H-1B वीज़ा के लिए आवेदन करना पहले की तुलना में कहीं अधिक महंगा हो जाएगा। हालाँकि, डोनाल्ड ट्रंप ने भी पिछले साल H-1B वीज़ा के लिए फीस को 1 लाख डॉलर किया था, लेकिन तब वह अस्थायी था और इस पर बाद में कोर्ट ने रोक भी लगा दी थी। लेकिन पिछले महीने होमलैंड सिक्योरिटी ने बढ़ी हुई फीस के साथ इसे स्थायी करने का प्रस्ताव दिया है।
दरअसल, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वर्ष 2025 में एक आदेश जारी कर कुछ नए H-1B वीज़ा आवेदनों पर 1 लाख डॉलर का अतिरिक्त शुल्क लगाया था। हालाँकि बाद में अमेरिकी अदालत ने इस व्यवस्था पर रोक लगा दी थी। डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी यानी डीएचएस ने पिछले महीने इस शुल्क को नियमों में शामिल करते हुए 1,03,265 डॉलर करने का प्रस्ताव दिया है। इसके लिए मसौदा अधिसूचना फेडरल रजिस्टर में प्रकाशित कर दी गई है।सार्वजनिक सुझावों के बाद होगा फैसला
फिलहाल ग्रेस पीरियड को ख़त्म करने का यह केवल एक प्रस्तावित नियम है। अमेरिकी सरकार ने इसे दो महीने के सार्वजनिक सुझाव के लिए जारी किया है। इस अवधि में कंपनियां, इमिग्रेशन विशेषज्ञ, उद्योग संगठन और आम नागरिक अपनी राय दे सकेंगे। इसके बाद सरकार तय करेगी कि इस प्रस्ताव को मौजूदा स्वरूप में लागू किया जाए या इसमें बदलाव किया जाए।
बहरहाल, माना जा रहा है कि यदि यह नियम लागू होता है तो अमेरिका में काम कर रहे हजारों भारतीय पेशेवरों के लिए नौकरी जाने की स्थिति पहले से कहीं अधिक मुश्किल हो जाएगी। बड़ी टेक कंपनियों में लगातार हो रही छंटनी के बीच नया नियम विदेशी कर्मचारियों के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ा सकता है। फिलहाल यह प्रस्ताव विचाराधीन है, लेकिन यदि इसे मंजूरी मिलती है तो अमेरिकी इमिग्रेशन व्यवस्था में यह पिछले कई वर्षों का सबसे बड़ा बदलाव माना जाएगा।