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ब्रिटिश चुनाव : मजदूरों के इलाक़ों में बुरी तरह हारी लेबर पार्टी, ब्रेग़्जिट नीति से नुक़सान

ब्रिटेन में खदानों के लिए जाने जाने वाले इलाक़े नाटिंघमशायर के बेसेटलॉ में कंजर्वेटिव आखिरी बार 1924 में जीते थे। इस बार 18% के परिवर्तन के साथ कन्जर्वेटिव ने यह सीट लेबर पार्टी से छीन ली। ग्रेट ग्रिम्स्बी की भी यही कहानी है, इस सीट को आख़िरी बार 1935 में जीतने वाले कन्जर्वेटिव ने 14.7% के बदलाव के साथ यह सीट छीन ली।
 यही कहानी लगभग पूरे ब्रिटेन में दोहराई गई- यहाँ तक कि 'लाल दीवार' नाम से जाने जाने वाले उस इलाके में भी जो ब्रिटेन का औद्योगिक केंद्र रहा है और जिसने मजबूत मजदूर संघर्ष देखे हैं। इस लाल दीवार की बोल्शोवेर, रोदर वैली, ब्लाइद वैली, डार्लिंगटन, रेडकार जैसी तमाम सीटों का भी यही हाल रहा।

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लेबर पार्टी का छीजता आधार

मतलब साफ़ है कि हर जगह निम्न-मध्यमवर्गीय और ग़रीब, कामगार समुदाय और बेरोज़गार लोगों, यानी अब तक लेबर पार्टी का मूल आधार रहे लोगों ने लेबर पार्टी को छोड़ ज्यादातर कन्जर्वेटिव पार्टी को जिताया। आँकड़े कहते हैं कि असल में जो भी लेबर पार्टी को हराता दिखा, उसे ही मतदाताओं ने वोट दिया है।

जिन इलाकों में ज़्यादातर मतदाता कामगार वर्ग के हैं वहां लेबर समर्थन में 11% की कमी आई है जबकि मध्यवर्गीय मतदाताओं वाले इलाकों में उनका समर्थन सिर्फ 7% कम हुआ है! साथ ही लेबर पार्टी के पारंपरिक इलाकों में मतदान भी काफी गिरा है- मतलब लेबर समर्थकों ने पार्टी तो नहीं छोड़ी, पर मतदान करने नहीं निकले।

कारण क्या है?

आखिर उसके घोषणापत्र में ज़्यादातर मुद्दे कामगार और ग़रीब वर्गों के समर्थन वाले थे। उनके घोषणापत्र में स्वास्थ्य बजट बढ़ा कर 4.3% करने, न्यूनतम वेतन को करीब 25% बढ़ाने, पेंशन की उम्र 66 से न बढ़ाने, मूलभूत उद्योगों का सरकारीकरण करने जैसी बातें थीं। साफ़ है कि अन्य लोगों को छोड़िये, खुद लेबर पार्टी समर्थक ही उन पर विश्वास नहीं कर सके। वास्तविकता में इस घोषणापत्र को लेबर पार्टी की हार का एक कारण भी माना जा रहा है कि उन्होंने चाँद देने का वादा कर दिया है जो वे पूरा नहीं कर सकेंगे, ऐसा विश्वास वोटरों को हुआ होगा। 
ब्रेग्ज़िट और स्थानीय लोगों को रोज़गार में वरीयता देना असल में निम्न-मध्यमवर्गीय और कामगार समाज के लोगों को खींचता है और लेबर पार्टी यह समझ नहीं पाई।
इसका असर चुनाव परिणामों पर साफ़ साफ़ दिखा। उन तमाम सीटों पर जिनमें 2016 में यूरोपियन यूनियन छोड़ने के मसले पर हुये जनमत संग्रह में 60 % से ज़्यादा समर्थन मिला था, उनमें कन्जरवेटिव पार्टी के समर्थन में 6% का उछाल है। 

कोर्बिन की वजह से हार?

बढ़ते असंतोष, अस्थिर अर्थव्यवस्था और अनिश्चित ब्रेग्ज़िट स्थिति के साथ साथ लेबर पार्टी की हार का एक बड़ा कारण खुद उनके नेता जेरेमी कोर्बिन भी हैं। सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप फॉरवर्ड्स के द्वारा छवि बनाने, दुश्मन पर हमलावर होने की जगह उनकी 'भद्रता' ने उनको कमज़ोर ही साबित किया। फिर कभी अलगाववादी पार्टी रही आयरिश नेशनल आर्मी को उनके समर्थन के खुलासे ने बची खुची कसर भी पूरी कर दी। फिर लेबर पार्टी की चुनावी रणनीति भी भगवान भरोसे ही थी। 

आगे?

जॉन्सन की जीत तमाम मामलों में भारत में नरेंद्र मोदी की जीत जैसी है। बड़े-बड़े वादे, निर्णायक और आक्रामक भाषा, शानदार जुमले। इस जीत ने यह  साबित कर दिया है कि लेबर पार्टी के पास न तो कोई नेता है और न ही जनता को उन पर यकीन है। यह संकट लिबरल सोच का तो है ही, साथ ही ब्रिटेन के अस्तित्व का भी है। स्कॉटिश नेशनल पार्टी की ज़बरदस्त जीत ने टूट का संकट पैदा कर दिया है । जो जॉन्सन के सामने सबसे चुनौती होगी।

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समर अनार्य
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