अमेरिका और ईरान के बीच 19 जून को जिनेवा में 14 सूत्रीय समझौते के MoU पर औपचारिक रूप से दस्तखत होने के बाद अहम मुद्दों पर बातचीत शुरू होगी ताकि 60 दिनों के अंदर किसी अंतिम समझौते पर पहुँचा जा सके। इस समय-सीमा को आपसी सहमति से बढ़ाया जा सकेगा।
मुजतबा खामेनेई और डोनाल्ड ट्रंप
अमेरिका और ईरान के बीच समझौते का MoU लीक हो गया है। 19 जून को जिनेवा में औपचारिक रूप से दस्तखत होने के बाद यह 14 सूत्रीय एमओयू जारी किया जाने वाला था। एमओयू में अमेरिकी प्रतिबंध हटाने के अलावा ईरान को 300 मिलियन डॉलर की मदद देने का भी ज़िक्र है। इस 300 मिलियन डॉलर के फंड की रिपोर्ट को पहले डोनाल्ड ट्रंप ने खारिज कर दिया था। इस एमओयू में यह भी कहा गया है कि ईरान परमाणु बम नहीं बनाएगा। इन बातों पर अमेरिका और ईरान में सहमति बन गई है। एमओयू पर हस्ताक्षर होने के बाद अहम मुद्दों पर बातचीत शुरू होगी ताकि 60 दिनों के अंदर किसी अंतिम समझौते पर पहुँचा जा सके; इस समय-सीमा को आपसी सहमति से बढ़ाया जा सकेगा।
भले ही यह एमओयू 14 सूत्रीय है, लेकिन इसमें सबसे अहम बात यह है कि इस समझौते में अमेरिका ने ईरान को 300 अरब डॉलर का आर्थिक मदद का वादा किया है, प्रतिबंध हटाने का फैसला लिया है और बदले में ईरान ने वादा किया है कि वह कभी परमाणु बम नहीं बनाएगा। सऊदी अरब के Al Arabiya चैनल ने इस 14-पॉइंट वाले MoU का पूरा टेक्स्ट प्रकाशित किया है। इस समझौते पर 19 जून को स्विट्जरलैंड के जिनेवा में दोनों देशों के उच्च अधिकारी दस्तखत करने वाले हैं।
लीक MoU में बड़ी बातें क्या?
- ईरान का वादा: ईरान ने साफ़ कहा है कि वह कभी भी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा। परमाणु कार्यक्रम से जुड़े परमाणु संवर्धन जैसे सभी मुद्दों पर अंतिम समझौते में फ़ैसला होगा।
- अमेरिका का वादा: ईरान पर लगाए गए सभी प्रतिबंध हटा दिए जाएंगे, खासकर तेल, पेट्रोकेमिकल उत्पाद और बैंकिंग सेवाओं पर।
- ईरान के फ्रोजन पैसे और संपत्ति वापस लौटाई जाएगी।
- ईरान के आर्थिक विकास और उसको दोबारा खड़ा करने के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर का फंड उपलब्ध कराया जाएगा।
- युद्ध का अंत: दोनों देशों ने 'सभी मोर्चों पर तुरंत और स्थायी युद्ध समाप्ति' का फ़ैसला किया है। इसमें लेबनान भी शामिल है। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर हमला नहीं करेंगे, एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करेंगे और दूसरे देश के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देंगे।
- समुद्री मार्ग: अमेरिका तुरंत नौसैनिक ब्लॉकेड हटा देगा। ईरान 30 दिनों में होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही पहले जितनी कर देगा। ट्रंप ने कहा है कि यहाँ टोल-फ्री होगा, जबकि ईरान ने कहा है कि पर्यावरण और अन्य सेवाओं के लिए कुछ शुल्क लिया जाएगा।
- समयसीमा: MoU साइन होने के बाद दोनों देश 60 दिनों में मुख्य मुद्दों पर अंतिम समझौता करेंगे। इसे बढ़ाया भी जा सकता है। अंतिम समझौते को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बाध्यकारी प्रस्ताव के जरिए मंजूरी दी जाएगी।
इसी साल 40 दिनों की बमबारी के बाद 8 अप्रैल को अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर हो गया था। लेकिन लेबनान में इसराइल के सैनिक अभी भी मौजूद हैं और हिजबुल्लाह के साथ तनाव जारी है।
डोनाल्ड ट्रंप ने पहले ईरान में रिजीम चेंज की बात कही थी, लेकिन अब उन्होंने कहा है कि उन्हें रिजीम चेंज में विश्वास नहीं है, ईरान के पास सैकड़ों किलोग्राम समृद्ध यूरेनियम है। 2015 में ओबामा के समय हुए समझौते में भी ईरान ने बम न बनाने का वादा किया था, लेकिन ट्रंप ने 2018 में अमेरिका को उस समझौते से बाहर निकाल लिया था।
दोनों देशों के बीच विवाद के मुद्दे क्या?
- ईरान अपने फ्रोजन फंड तुरंत चाहता है और युद्ध के नुकसान की भरपाई भी मांग रहा है।
- अमेरिका कह रहा है कि सीधे पैसे नहीं भेजेगा, लेकिन लीक टेक्स्ट में फंड रिलीज और 300 अरब डॉलर के प्लान का ज़िक्र है।
- परमाणु संवर्धन को लेकर दोनों के बीच अभी भी बड़ा मतभेद है। ईरान इसे अपना अधिकार मानता है, जबकि अमेरिका शून्य संवर्धन चाहता है।
ईरानी राष्ट्रपति ने बताया, कैसे MoU हुआ
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने हाल ही में बताया है कि ईरान किस तरह इस समझौता ज्ञापन यानी MoU पर सहमत हुआ। उन्होंने एक दिन पहले ही एक्स पर लिखा, 'गंभीर बातचीत के बाद मजलिस के लगभग सभी सदस्यों ने समझौता ज्ञापन के मसौदे का समर्थन किया, ताकि ईरानी राष्ट्र के अधिकारों का सम्मान करने के अमेरिका के असली इरादे को असल में परखा जा सके।'
पेज़ेशकियन ने कहा कि ईरान के राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने वाली शर्तों को शामिल करने में सर्वोच्च नेता मुजतबा खामेनेई की सबसे बड़ी भूमिका रही। पेज़ेशकियन ने कहा कि यह MoU महीनों की 'बातचीत और लगातार फॉलो-अप' का नतीजा है, और यह युद्ध रोकने तथा बातचीत शुरू करने की दिशा में एक अहम कदम है। उन्होंने कहा कि ईरान ने सभी विकल्पों के लिए खुद को तैयार कर लिया है और अगर MoU की सभी शर्तों को लागू किया जाता है तो इसे 'देश के लिए गर्व का दस्तावेज़' माना जा सकता है।
बहरहाल, यह MoU दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने के लिए बेहद अहम क़दम माना जा रहा है। हालांकि, अंतिम समझौता होने तक कई चुनौतियाँ बाक़ी हैं। अभी यह लीक हुआ ड्राफ्ट है। आधिकारिक रूप से 19 जून को जिनेवा में दस्तख़त के बाद आगे की स्थिति ज़्यादा साफ़ होगी।