अमेरिका और इसराइल के हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत के बाद अब उनकी जगह कौन लेगा? ख़ामेनेई पिछले 37 साल से ज़्यादा समय से देश के सबसे ताक़तवर व्यक्ति थे। उनकी मौत अचानक और युद्ध के बीच हुई है, जिससे सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया पर बड़ा संकट है। ईरान के संविधान में उत्तराधिकार की व्यवस्था है, लेकिन इतने बड़े संकट में यह कितनी काम करेगी, यह सवाल बड़ा है।

ईरान में सर्वोच्च नेता का पद बेहद अहम है। वह सेना का कमांडर-इन-चीफ़ होता है, न्यायपालिका, मीडिया और सुरक्षा एजेंसियों के प्रमुख नियुक्त करता है। वह युद्ध-शांति का फ़ैसला करता है और विदेश नीति पर अंतिम अधिकार रखता है। यह पद 'वेलायत-ए-फकीह' यानी 'इस्लामी न्यायविद् की संरक्षकता' पर आधारित है। शिया मान्यता के अनुसार, 12वें इमाम यानी इमाम मेहदी ग़ैबत में यानी अभी छिपे हुए हैं। उनके आने तक समाज और सरकार की देखभाल और नेतृत्व एक योग्य, न्यायप्रिय और इस्लामी क़ानूनों का गहरा जानकार फ़क़ीह यानी इस्लामी न्यायशास्त्री या धर्मगुरु के हाथ में होना चाहिए। इसका मतलब है कि राज्य की सारी बड़ी राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक शक्तियाँ इस वली-ए-फ़क़ीह यानी सर्वोच्च नेता के पास होती हैं।

ईरान में 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद अयातुल्ला खुमैनी ने इस सिद्धांत को अपनाया और इसे देश की संविधान में जगह दी। वहाँ पहले खुमैनी, अब ख़ामेनेई के रूप में सुप्रीम लीडर इसी वेलायत-ए-फकीह के तहत सबसे ताक़तवर होता है। राष्ट्रपति और संसद भी हैं, लेकिन अंतिम फैसला वली-ए-फ़क़ीह का होता है।
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ईरान के संविधान के अनुसार, सर्वोच्च नेता एक वरिष्ठ शिया धर्मगुरु होना चाहिए। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अभी कोई भी व्यक्ति ख़ामेनेई जितनी ताक़त नहीं रखता। तो फिर उनकी जगह कौन लेगा? उनकी मौत के बाद सत्ता पर कब्जा करने के लिए कई नाम चर्चा में हैं-

मोजतबा ख़ामेनेई

ख़ामेनेई के बेटे मोजतबा ख़ामेनेई की उम्र करीब 56 साल है। विरासत से काफी प्रभावशाली हैं, पिता की संपत्ति और फ़ैसलों में भूमिका निभाते हैं। लेकिन बेटे को नेता बनाना विवादास्पद हो सकता है, क्योंकि यह राजशाही जैसा लगता है और 1979 की क्रांति राजशाही के ख़िलाफ़ थी। कई लोग इसे इस्लामी नियमों के खिलाफ मानते हैं।

हसन खुमैनी

हसन खुमैनी आयतुल्लाह खुमैनी के पोते हैं। वे ज्यादा उदारवादी माने जाते हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान की छवि सुधार सकते हैं। लेकिन वे सत्ता के अहम गलियारे से बाहर रहे हैं और कुछ समय पहले असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स चुनाव से अयोग्य घोषित किए गए थे।

पूर्व न्यायाधीश प्रमुख सादिक लारिजानी, मोहसिन अराकी, मोहम्मद मेहदी मीरबघेरी, अलिरेजा आरफी, वर्तमान न्यायाधीश प्रमुख गोलामहुसैन मोहसनी एजेई जैसे वरिष्ठ क्लेरिक के नाम भी प्रमुखता से लिए जा रहे हैं। 

ख़ामेनेई ने पिछले साल जून के इसराइल युद्ध के दौरान तीन संभावित उत्तराधिकारियों के नाम तय किए थे, लेकिन वे सार्वजनिक नहीं हैं।

अस्थायी व्यवस्था क्या है?

ईरान के सरकारी टीवी और मीडिया के अनुसार, ख़ामेनेई की मौत के बाद एक अस्थायी परिषद बनाई गई है। इसमें राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन, न्यायपालिका प्रमुख गोलामहुसैन मोहसनी एजेई और गार्जियन काउंसिल के एक सदस्य शामिल हैं। यह परिषद अंतरिम रूप से देश चलाएगी। 88 वरिष्ठ क्लेरिकों की चुनी हुई संस्था असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स जल्द से जल्द नया सर्वोच्च नेता चुन सकती है। असेंबली हर 8 साल में चुनी जाती है, लेकिन गार्जियन काउंसिल उम्मीदवारों को मंजूरी देती है।

रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स की क्या भूमिका होगी?

रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स यानी आईआरजीसी ईरान की सबसे ताक़तवर सेना है, जो सीधे सर्वोच्च नेता के अधीन होती है। सामान्य सेना रक्षा मंत्रालय के अधीन है, लेकिन आईआरजीसी राजनीति, अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय ऑपरेशंस में बहुत प्रभावशाली है। शनिवार के हमलों में आईआरजीसी कमांडर मोहम्मद पाकपोर की मौत की पुष्टि हुई है। इससे आईआरजीसी में भी बदलाव आ सकता है।
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आईआरजीसी के पास कुद्स फोर्स है, जो हिजबुल्लाह, हमास, हूती जैसे प्रॉक्सी गुटों को सपोर्ट करता है। बसिज मिलिशिया विरोध प्रदर्शनों को दबाने में इस्तेमाल होती है। कई विश्लेषकों का मानना है कि अगर क्लेरिक कमजोर पड़ें तो आईआरजीसी सत्ता पर कब्जा कर सकती है। सीआईए की रिपोर्टों में भी कहा गया है कि ख़ामेनेई की मौत के बाद आईआरजीसी के कट्टरपंथी तत्व सत्ता ले सकते हैं। इससे ईरान ज़्यादा आक्रामक हो सकता है, खासकर परमाणु कार्यक्रम पर।

ईरान में चुनाव क्यों होते हैं?

ईरान में क्लेरिक और चुने हुए प्रतिनिधि का शासन होता है। राष्ट्रपति और संसद के चुनाव हर 4 साल में होते हैं। लेकिन सर्वोच्च नेता का अंतिम नियंत्रण रहता है। मौजूदा राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन 2024 में चुने गए और वह अपेक्षाकृत उदारवादी माने जाते हैं। वह हमलों में सुरक्षित बताए गए हैं और वे अस्थायी परिषद में हैं।
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आगे चुनौती क्या है?

ईरान अब संकट में है। मौत के बाद 40 दिन का शोक है। लेकिन सत्ता संघर्ष तेज हो सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरानी लोगों से कहा है कि वे मौका देखकर सरकार बदलें। इसराइल भी ऐसा ही चाहता है। लेकिन मौजूदा नेतृत्व आईआरजीसी और क्लेरिक सिस्टम को बचाने की कोशिश करेगा। क्या ईरान में बदलाव आएगा, या कट्टरपंथी नियंत्रण मजबूत होगा, यह अगले कुछ दिनों में साफ होगा।