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हार कर जीतने वाले को नीतीश कुमार कहते हैं! 

नीतीश की याददाश्त में तब यह बात नहीं रही होगी कि 2010 में वह बीजेपी के साथ ही चुनाव लड़कर 200 से ज़्यादा सीटों के साथ मुख्यमंत्री बने थे और उससे पहले साल 2000 के वे सात दिन भी नीतीश को याद नहीं रहे जब बिना बहुमत के भी प्रधानमंत्री वाजपेयी ने उन्हें मुख्यमंत्री बनवा दिया था और फिर कुर्सी छोड़ने की मजबूरी के बाद केन्द्र में काबीना मंत्री बनाया। 
विजय त्रिवेदी
तो बिहार में एक बार फिर नीतीश कुमार मुख्यमंत्री होंगे, भले इस बार उनकी सीटें बीजेपी के मुक़ाबले बहुत कम हैं। बीजेपी ने सारी अटकलों को ख़ारिज करते हुये कहा है कि चुनाव नीतीश की अगुवाई में लड़ा गया और वही मुख्यमंत्री होंगे। इस मौक़े पर अनायास ही दिल्ली के ख़ान मार्केट के एक बुक स्टोर पर शेल्फ में रखी किताब ‘सिंगल मैन’ की याद हो आती है।
वरिष्ठ पत्रकार शंकर्शन ठाकुर की लिखी इस बायोग्राफी में एक जगह लिखा है कि “मैं सत्ता हासिल करने के लिए साम-दाम कुछ भी रास्ता अख्तियार कर सकता हूं, लेकिन सत्ता हासिल होने के बाद सिर्फ़ अच्छा काम करूंगा।” क़िताब का शीर्षक भले ही नीतीश कुमार के 'सिंगल मैन आर्मी' की राजनीति को ध्यान में रखकर लिखा गया होगा, लेकिन 2020 के विधानसभा चुनाव के नतीज़ों ने क्या उसे ज़्यादा मौज़ूं बना दिया?

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राजनीति के पेच

चालीस साल से ज़्यादा वक़्त से बिहार और केन्द्र की राजनीति में अपनी जगह बनाए रखने वाले समाजवादी छवि के नेता नीतीश कुमार मेरे ख्याल से किसी राज्य में सबसे ज़्यादा बार मुख्यमंत्री बनने वाले नेता होंगे।
सत्तर के दशक में जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन के साथ अपनी राजनीति की शुरुआत करने वाले कुमार ने राजनीति का शायद ही कोई पेच या समीकरण छोड़ा हो, जिसका इस्तेमाल उन्होंने खुद को बनाए रखने के लिए नहीं किया हो।
वक़्त और ज़रूरत के हिसाब से दोस्ती और दुश्मनी करते हुए वे आगे बढ़ने का रास्ता बनाते रहे हैं। महाभारत का 'अश्वत्थामा हतो हति' का प्रसंग नीतीश साहब को बेहतर तरीके से समझ आता है।  

राजनीतिक दोस्ती

जेपी, राम मनोहर लोहिया, सत्येन्द्र नारायण सिन्हा, कर्पूरी ठाकुर और विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ जनता दल की पारी खेलने वाले नीतीश कुमार कभी लालू यादव के साथ गले मिलते दिखते रहे तो कभी उन पर निजी हमले करने से भी बाज़ नहीं आए। इस चुनाव में तो उन्होंने  अपने पुराने मित्र लालू यादव के लिए जो कुछ कहा, वह खुद भी याद करके शर्मिंदा हो सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ भी दोस्ती मुंबई की बारिश की तरह रही है, कब हो जाए, कब टूट जाए, कुछ भरोसा नहीं।  

bihar chief minister nitish kumar profile - Satya Hindi
साल 2002 में गुजरात दंगों के वक़्त रेल मंत्री रहे नीतीश कुमार ने तब ना तो वाजपेयी सरकार को छोड़ा और ना ही गोधरा रेल दुर्घटना के बाद रेल मंत्री पद से इस्तीफ़ा दिया, जबकि 1999 में  गैसल रेल दुर्घटना की नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए उन्होंने रेलमंत्री की कुर्सी छोड़ दी थी।

बीजेपी- विरोध?

लेकिन वही नीतीश कुमार के सपने जब केन्द्र में प्रधानमंत्री बनने के लिए उड़ने लगे तो उन्होंने साल 2014 के चुनाव से पहले ना केवल बीजेपी का साथ इसलिए छोड़ दिया क्योंकि उन्होंने मोदी का नाम मंज़ूर नहीं था, बल्कि उनके बिहार में चुनाव प्रचार के लिए आने पर तक रोक लगा दी और सबको याद होगा कि साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में उन्होंने सीधा मुकाबला मोदी से ही रखा।

वाजपेयी ने बनाया मंत्री

नीतीश की शायद याददाश्त में तब यह बात नहीं रही होगी कि 2010 में वे बीजेपी के साथ ही चुनाव लड़कर 200 से ज़्यादा सीटों के साथ मुख्यमंत्री बने थे और उससे पहले साल 2000 के  वे सात दिन भी नीतीश को याद नहीं रहे जब बिना बहुमत के भी प्रधानमंत्री वाजपेयी ने उन्हें मुख्यमंत्री बनवा दिया था और फिर कुर्सी छोड़ने की मजबूरी के बाद केन्द्र में काबीना मंत्री बनाया।

बिहार की सड़कों पर दोनों तरफ आमने-सामने मोदी बनाम नीतीश कुमार के बड़े-बड़े होर्डिंग लगे थे, लेकिन दो साल बाद अचानक कुछ घंटों में यह राजनीतिक दुश्मनी पक्के दोस्ताना में बदल गई। 

मांझी पर भरोसा

साल 2014 के लोकसभा चुनावों में जनता दल युनाइटेड की करारी हार के बाद उन्होंने नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए 17 मई को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया और पिछड़े समुदाय के प्रति प्रेम भाव जाहिर करते हुए जीतन राम मांझी को कुर्सी पर बिठा दिया।
लेकिन यह मुहब्बत ज़्यादा दिन नहीं चल पाई और 2015 के चुनाव से पहले नीतीश कुमार फिर मुख्यमंत्री बन गए। उन्हीं मांझी साहब को 2020 के चुनावों में अपनी नैया पार लगाने के लिए फिर से साथ बिठा लिया।

महागठबंधन

2015 के चुनाव में जिस महागठबंधन को बनाकर नीतीश कुमार चुनाव जीते थे, उसे तोड़ते वक्त उन्हें शायद यह भी याद नहीं रहा कि उनके सहयोगी रहे राष्ट्रीय जनता दल ने उस चुनाव में उनसे  ज्यादा सीटें जीतने के बावजूद नीतीश कुमार को ही मुख्यमंत्री बनाया था और यह फ़ैसला उन लालू यादव ने किया था, जिनके ‘जंगलराज’ को वे इस चुनाव में भुनाने की कोशिश कर रहे थे।

इतना सब होने के बावजूद ज़्यादातर लोग इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि नीतीश कुमार लंबे राजनीतिक जीवन के बावजूद भ्रष्टाचार के दाग़ से बचे रहे और बिहार में विकास के बहुत से काम किए।

लोकप्रिय नेता

सड़कों के निर्माण, स्कूल और अस्पताल और बिजली की व्यवस्था को  सुधारने का काम किया। लड़कियों को साइकिल देने की उनकी योजना ने स्कूलों में लड़कियों की ड्रॉप आउट दर काफी कम हो गई। यह बात ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान से पहले की बात है। रेल टिकट बुक कराने के लिए आज आपको यदि रेलवे स्टेशन नहीं जाना पड़ता तो इसके लिए नीतीश कुमार का शुक्रिया अदा करना चाहिए। उन्होंने ही रेलवे में इंटरनेट बुकिंग और ‘तत्काल बुकिंग’ योजना शुरू की थी।

बीजेपी से दोस्ती की कीमत उन्हें चुकानी थी, इसलिए नागरिकता संशोधन क़ानून और बीजेपी के दूसरे मुद्दों पर उन्हें ना केवल साथ देना पड़ा, बल्कि 2015 चुनावों की रणनीति बनाने वाले प्रशांत किशोर और अपने सलाहकार रहे पवन वर्मा को छोड़ने में उन्हें कोई तकलीफ़ नहीं हुई। प्रशांत किशोर की कंपनी ने ही 'हर घर दस्तक' और 'डीएनए कैंपेन' बनाया था जो, उस चुनाव की जीत का बड़ा कारण बना। 

1994 में लालू प्रसाद से अलग होकर उन्होंने जनता दल युनाइटेड बनाया था, तब से वे ही इसके सबसे बड़े नेता हैं और सिंगल मैन आर्मी भी। उनके बाद अगली दस सीढ़ियों तक कोई दूसरा नेता नहीं है, यानी एक राजा की लोकतांत्रिक पार्टी-जनता दल युनाइटेड।

'अंत भला तो सब भला'

बिहार चुनाव के आखिरी चरण में चुनाव प्रचार के आखिरी दिन जब नीतीश कुमार नें अपने भाषण में कहा कि, "जान लीजिए, आज चुनाव का आखिरी दिन है। अब परसों चुनाव है। और यह मेरा अंतिम चुनाव है। अंत भला तो सब भला।" उनके इस बयान  को विपक्षी नेताओं ने लपकने में देर नहीं लगाई और नीतीश के रिटायरमेंट की खबरें तेज़ हो गईं और कहा जाने लगा कि नीतीश को भी लगने लगा है कि वे चुनाव हारने वाले हैं। 
उस नुक़सान से बचाने के लिए प्रधानमंत्री को आगे आना पड़ा और उन्होंने बिहार के मतदाताओं को चिट्ठी लिखकर कहा कि मुझे बिहार के विकास के लिए नीतीश कुमार की ज़रूरत है।
बहुत से लोग यह सवाल करने लगे हैं कि नीतीश कुमार यदि संन्यास लेते हैं तो? लेकिन अब चुनाव के नतीजे आने के बाद क्या उन्हे अपना बयान याद होगा? शायद नहीं!
भले ही आज कुछ राजनीतिक जानकार कहे कि नीतीश कुमार की हार ही बीजेपी की जीत है, क्योंकि उनका राजनीतिक दुश्मन आरजेडी नहीं जेडीयू है और अब पार्टी को बिहार में आगे बढ़ने में आसानी होगी। पर येलोग शायद यह नहीं जानते कि हार कर जीतने वाले को ही नीतीश कुमार कहते हैं।

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