बिहार के बाहुबली नेता अनंत सिंह की पुरजोर कोशिश के बाद भी जन सुराज पार्टी के विधान परिषद उम्मीदवार डॉ. अनुज सिंह की हार ने जेडीयू में आंतरिक रस्साकसी को सतह पर ला दिया है। अनंत सिंह लंबे समय से पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) में थे। बिहार विधान परिषद के चुनाव में वे बागी हो गए। उन्होंने पटना स्नातक सीट से जेडीयू के उम्मीदवार नीरज कुमार का खुलकर विरोध और चुनाव प्रबंधक से नेता बने प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज के उम्मीदवार डॉ. अनुज सिंह का समर्थन किया। पुराने विरोधी और तीन बार के विधायक नीरज कुमार को हराने के लिए अनंत ने पूरी ताकत झोंक दी। केंद्रीय मंत्री और जेडीयू के नेता ललन सिंह ने भी अनंत सिंह का समर्थन किया। आरोप है कि नीरज कुमार ने अनंत सिंह के अलावे ललन सिंह का भी चुनावों में विरोध किया था।
जेडीयू में रस्साकसी
अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच पुरानी दुश्मनी है। 2015 में जब अनंत सिंह जेल में थे तब जेडीयू ने उनके ख़िलाफ़ नीरज कुमार को विधानसभा का टिकट दे दिया था। जेल से निर्दलीय चुनाव लड़कर अनंत सिंह जीत गए लेकिन नीरज कुमार से उनकी ठन गयी। बाद में नीरज कुमार को एमएलसी बना दिया गया। इस बार जेडीयू ने जैसे ही नीरज कुमार को फिर टिकट देने का फैसला किया वैसे ही अनंत सिंह उनके विरोध में उतर आए। राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक ललन सिंह भी नीरज कुमार को टिकट देने के ख़िलाफ़ थे। स्थिति यहां तक आ गयी कि जेडीयू को अनंत सिंह को पार्टी से निकालना पड़ा।
अनंत सिंह की पूरी कोशिश के बाद भी नीरज चुनाव जीत गए। अनुज सिंह तीसरे नंबर पर रहे। चर्चा है कि बिहार में ललन सिंह का असर कम करने की कोशिश शुरू हो गयी है। पार्टी का एक बड़ा वर्ग अब नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को आगे करना चाहता है। ललन को बीजेपी के क़रीब बताया जाता है। एक वर्ग उन्हें पार्टी के लिए ख़तरा मान रहा है। अनुज सिंह के प्रचार में अनंत सिंह के उतरने के बाद प्रशांत किशोर ने अपने ही उम्मीदवार से दूरी बना ली थी फिर भी उन पर चुनाव में माफिया के साथ होने का दाग लग गया।
बगावत से परेशान बीजेपी
विधान परिषद के कुल आठ क्षेत्रों के चुनाव में बीजेपी को तीन और जेडीयू को एक सीट मिली। दो निर्दलीय जीते। उन्हें भी बीजेपी का बागी बताया जा रहा है। जन सुराज ने एक सीट जीतकर अपनी प्रतिष्ठा बचा ली। लेकिन आरजेडी को सिर्फ़ एक और कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली। कांग्रेस अपनी एक पुरानी सीट भी हार गयी। पटना शिक्षक क्षेत्र से आरजेडी के डॉ. संजीव कुमार ने बीजेपी के नवल किशोर यादव को 1,057 वोटों से हराया। नवल किशोर लंबे समय से एमएलसी थे। इस जीत से आरजेडी की प्रतिष्ठा बच गयी। चार स्नातक निर्वाचन में से दरभंगा और कोसी में बीजेपी और पटना में जेडीयू की जीत हुई लेकिन तिरहुत में निर्दलीय वंशीधर ब्रजवासी जीते। शिक्षक क्षेत्र की चार में से एक पर बीजेपी और एक पर आरजेडी को जीत हासिल हुई। दूसरी तरफ़ जन सुराज पार्टी ने एक नयी सीट पर जीत हासिल की तो एक पुरानी हार गयी। कुछ महीनों पहले बांकीपुर विधानसभा सीट से उप चुनाव जीत कर प्रशांत किशोर ने बिहार में पार्टी को एक नयी उम्मीद दी थी।
बीजेपी के सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद ये विधानसभा का पहला उप चुनाव था। यह सीट बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने ख़ाली की थी इसलिए यहां बीजेपी की हार को बड़ी हार माना गया था। शिक्षक क्षेत्र की एक सीट पर बीजेपी के बागी ने कब्जा जमाया है।
जन सुराज की प्रतिष्ठा बची
सारण शिक्षक क्षेत्र में बीजेपी ने राहुल राज को टिकट नहीं दिया तो वो निर्दलीय चुनाव में उतर गए। और जीत हासिल की। 2023 में इस सीट पर जन सुराज के समर्थन से निर्दलीय अफ़ाक़ अहमद जीते थे। एक तरह से ये जन सुराज की भी हार है क्योंकि अफ़ाक़ बाद में जन सुराज पार्टी में शामिल हो गए थे। लेकिन दरभंगा शिक्षक सीट से सुरेश प्रसाद राय की जीत से जन सुराज की प्रतिष्ठा बच गयी। राय ने कांग्रेस के मौजूदा एमएलसी मदन मोहन झा को हराया। कांग्रेस के लिए ये एक बड़ी हार है। सारण में हार के बाद ये चर्चा हो रही है कि बांकीपुर की हार से बीजेपी ने कोई सबक नहीं सीखा। बीजेपी पर बांकीपुर में कमजोर उम्मीदवार उतारने का आरोप लगा था। सारण की हार के बाद यही आरोप दुहराया जा रहा है। बीजेपी पर आरोप है कि सही उम्मीदवारों को टिकट नहीं दिया गया इसलिए पार्टी के कुछ अधिकृत उम्मीदवार हार गए और बागियों को जीत मिली। इन चुनावों से एक बात साफ़ है कि नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने का सीधा असर बीजेपी और जेडीयू गठबंधन पर पड़ रहा है।