पीएम मोदी शनिवार 5 सितंबर को दिल्ली के एसआरसीसी कॉलेज में
क्या अब तक बीजेपी का समर्थन करने वाले कुछ हिंदू मतदाताओं में धीरे-धीरे असंतोष बढ़ रहा है? क्या हिंदुत्ववादी नीतियों से उन्हें कोई ठोस और वास्तविक लाभ नहीं मिला, जिससे मोदी सरकार की लोकप्रियता में कमी आ रही है? क्या आरएसएस द्वारा बढ़ावा दिए गए धार्मिक और सांस्कृतिक एजेंडे पर आधारित मॉडल आर्थिक चुनौतियों के बढ़ने के साथ कम प्रभावी साबित हो रहा है? इसी संदर्भ में बीजेपी पर विपक्ष द्वारा एसआईआर प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग के साथ मिलकर मतदाता सूची में हेराफेरी के आरोप लगाए जा रहे हैं, और इन आरोपों का विरोध भी बढ़ रहा है। बीजेपी शासन काल में लंबे संघर्ष और सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद राम मंदिर का निर्माण हुआ। इसके बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की सीटें 303 से घटकर 240 रह गईं। अयोध्या वाले उत्तर प्रदेश में भी उसकी संसदीय सीटें 62 से घटकर 33 रह गईं। क्या इसका मतलब यह है कि इस उपलब्धि से हिंदू मतदाता पर्याप्त रूप से संतुष्ट नहीं हुए?
बीजेपी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा दिया, जबकि पूर्वोत्तर और कुछ पर्वतीय राज्यों में विशेष प्रावधान आज भी लागू हैं। इससे हिंदू समाज या देश को ठोस रूप से क्या मिला, यह चर्चा का विषय है। इसी तरह कॉमन सिविल कोड (यूसीसी) को बीजेपी, एनडीए शासित राज्यों में लागू करने की बात की जा रही है। इससे हिंदुओं को व्यावहारिक रूप से क्या लाभ होगा, यह भी स्पष्ट होना चाहिए। मोदी सरकार ने सीएए पास कर कुछ गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता का रास्ता खोला। कुछ लोग इसे धार्मिक आधार पर सकारात्मक मानते हैं। लेकिन कुछ आलोचक पूछते हैं कि क्या धार्मिक जुलूस, नारेबाजी, बुलडोजर कार्रवाई, मांस व्यापार पर प्रतिबंध, भीड़ द्वारा हिंसा के मामले, एनकाउंटर, या कुछ नेताओं के बयान जैसी सरकार की कुछ नीतियों और घटनाओं से हिंदू समाज को कोई वास्तविक आर्थिक, सामाजिक या सुरक्षा संबंधी लाभ हुआ है? या कुछ लोगों को केवल एक समुदाय के साथ हो रहे व्यवहार से मानसिक संतुष्टि मिल रही है, भले ही खुद का आर्थिक नुकसान हो? क्या गोदी मीडिया और सोशल मीडिया के प्रचार से कुछ वर्ग का ऐसा मानस बन गया है कि वे बीजेपी सरकार की उन नीतियों को भी सही मान लेते हैं, जो उनके अपने हितों के खिलाफ भी हो सकती हैं?
बेरोजगारी बढ़ी
एक सर्वे के अनुसार देश में 8 करोड़ से अधिक युवा ऐसे हैं जो न तो पढ़ रहे हैं और न ही पढ़ाई पूरी होने के बाद कोई ट्रेनिंग कर रहे हैं और न ही नौकरी तलाश कर रहे हैं। इन्होंने एक तरह से जॉब मिलने की उम्मीद भी छोड़ दी है। एनएसएसओ 2017-18 के आंकड़े बताते हैं कि उच्च शिक्षित बेरोजगारी बढ़कर 17 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। यह पिछले 45 साल की सबसे अधिक बेरोजगारी बताई जाती है। हालांकि 2025 में पीएलएफएस के आंकड़ों के अनुसार इसमें कुछ सुधार देखा गया जिससे यह आंकड़ा घटकर 11 प्रतिशत तक आ गया। लेकिन इस मामले में सिविल सोसायटी निष्पक्ष एजेंसियां और वर्ल्ड रैंकिंग में भारत सरकार के विभिन्न आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल भी उठने लगे हैं। इसके साथ ही विभिन्न न्यूट्रल एजेंसी के आंकड़े बताते हैं कि 2014 के बाद देश और विभिन्न राज्यों में अपराध महंगाई भुखमरी और भ्रष्टाचार का ग्राफ़ भी तेज़ी से बढ़ा है। जबकि सही रिपोर्ट नहीं होने से कई राज्यों में सच छिपाया भी जाता है।
2011 की जनगणना के अनुसार देश में हिंदुओं की आबादी लगभग 80 प्रतिशत थी। ज़ाहिर बात है कि अगर बेरोजगारी, महंगाई, अपराध और भ्रष्टाचार बढ़ रहा है तो इसका असर बड़ी आबादी पर उसके अनुपात में अधिक ही होगा। देश में सरकारी शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था की हालत भी अच्छी नहीं है जिससे सभी भारतीय परेशान हैं। भ्रष्टाचार की हालत तो यह है कि अब सत्ताधारी नेताओं और चुने हुए जनप्रतिनिधियों के कहने पर भी थाने, तहसील में बिना रिश्वत के कानूनी काम भी नहीं होते। सरकारी ठेकों में कमीशन पहले से बढ़ते जाने के आरोप ठेकेदार गाहे-ब-गाहे लगाते रहते हैं लेकिन कोई सुधार नहीं है। नए बने रोड, हाइवे, एक्सप्रेस वे और पुल आए दिन गिरते रहते हैं। सड़क दुर्घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं। 80 करोड़ से अधिक भारतीय सरकारी राशन में मिलने वाले फ्री पांच किलो अनाज पर गुज़ारा कर रहे हैं। किसानों की आय नहीं बढ़ने से वे रोज़ आत्महत्या करते हैं।
कहने का मतलब यह है कि जीडीपी के आँकड़े अर्थव्यवस्था का आकार और विश्वगुरु बनने के सरकारी दावों के बावजूद आम भारतीय परेशान है जिसमें हिंदुओं की संख्या ही सबसे अधिक है। इतना ही नहीं, दुनिया में प्रतिष्ठित विश्वसनीय और अपनी उच्चतम साख रखने वाली इंटरनेशनल एजेंसियों और देशों के वर्ल्ड फ्रीडम इंडेक्स (157/180), ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स (130/193), करप्शन परसेप्शन इंडेक्स (91/180), ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स (129/148), एनवायरमेंटल परफॉर्मेंस इंडेक्स (176), ग्लोबल पीस इंडेक्स (116/163), डेमोक्रेसी/फ्रीडम इंडिसेज, वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट और रुल ऑफ लॉ इंडेक्स में भारत 2014 के बाद से काफ़ी नीचे जा चुका है। जबकि ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स, सैन्य क्षमता, और एसडीजी इंडेक्स में हमारे देश ने पहले से कुछ बेहतर रैंक हासिल की है। इसके साथ ही नोटबंदी लॉकडाउन जीएसटी से आर्थिक नुकसान और कोरोना से जो लाखों मौतें हुईं उसका अधिक शिकार कौन हुआ? बिना किसी रिसर्च विचार विमर्श और 2023 से पहले बनी कारों के लिए भी 20 प्रतिशत एथेनॉल पेट्रोल में मिलाने से किस वर्ग का अधिक नुकसान हो रहा है? शेयर मार्केट और डॉलर के मुक़ाबले रुपए की क़ीमत लगातार गिरने से कौन लोग लाखों करोड़ का घाटा संख्या में अधिक झेल रहे हैं?
सवाल यह है कि बीजेपी जिन हिंदुओं की भलाई का दावा हिंदुत्ववादी नीतियों के तहत करती है, उससे आम हिंदू को ठोस रूप से क्या मिला है? क्या समुदाय के तौर पर हिंदुओं को गैर-हिंदुओं की तुलना में कोई विशेष अतिरिक्त और उल्लेखनीय लाभ हुआ है? कुछ क्षेत्रों में आर्थिक आधार पर पिछड़े वर्गों को सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ देने के आंकड़ों को लेकर यह दावा किया जाता है कि उनमें गैर-हिंदू लाभार्थियों की संख्या उनकी आबादी के अनुपात से अधिक है। उदाहरण के रूप में प्रधानमंत्री आवास योजना में मुस्लिम लाभार्थियों के आंकड़ों का जिक्र किया जाता है। निशुल्क अनाज वितरण और विधवा, वृद्धा पेंशन के बारे में भी ऐसे दावे सामने आते हैं, हालांकि सरकार ने हाल में इनके विस्तृत सामुदायिक आंकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं कराए हैं। जमीन पर देखें तो हर घर जल, आयुष्मान भारत और पीएम किसान जैसी योजनाओं का लाभ व्यापक रूप से विभिन्न वर्गों को मिल रहा है। दूसरी ओर, उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा में आगे होने के बावजूद कुछ हिंदू युवाओं को अपेक्षित रोजगार नहीं मिल पा रहा है। वहीं, कई पारंपरिक और कौशल आधारित व्यवसायों में विभिन्न समुदायों के लोग आजीविका कमा रहे हैं। इससे कुछ बीजेपी समर्थक हिंदुओं में निराशा होना स्वाभाविक हो सकता है।
लेकिन सौ टके का सवाल यह है कि जब तक निष्पक्ष और लेवल प्लेइंग फ़ील्ड पर ईमानदारी से चुनाव नहीं होंगे तब तक बीजेपी एंटी इनकंबेंसी और अपने समर्थक हिंदुओं की नाराज़गी के बाद भी सत्ता से हटेगी कैसे?