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बीजेपी का चार सौ सीटों का लक्ष्य कितना वास्तविक?

भाजपा बम बम कर रही है। उसके लिए सब कुछ अनुकूल होता आया है और राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह की जबरदस्त सफलता, जिसकी पटकथा खुद नरेंद्र मोदी ने लिखी थी, उसका सितारा बहुत ऊँचा कर दिया है। चुनावी गणित से देखें तो शायद पुलवामा-बालाकोट वाली घटना से भी ज़्यादा। अबकी गाँव गाँव, मुहल्ला मुहल्ला में रामलला के आने की धूम रही। सफाई-धुलाई से लेकर जनवरी में दिवाली मनाने तक का काम हुआ। और यह सारा पुरुषार्थ भाजपा का हो न हो लेकिन इसका राजनैतिक लाभ उसे मिलेगा। हिन्दू समाज और भारतीय समाज में इसने खास तरह के बदलाव किए हैं और कई पुरानी चीजों को बदला है लेकिन इसने शासन और राजनीति में भी बदलाव किया है, चुनावी राजनीति में भी प्रभाव डाला है और आगे और डालेगा। किसी और की तुलना में भाजपा और उसके सूत्रधार नरेंद्र मोदी को इसका पता है।

भाजपा हाल के विधानसभा चुनाव की अनपेक्षित जीत से भी बम बम कर रही है। इस लेखक जैसे लोगों को तब लग रहा था कि शिवराज, वसुंधरा और रमन सिंह जैसों की जगह मोदी जी अपना चेहरा क्यों विधानसभा चुनाव में दांव पर लगा रहे हैं। यह तो ब्रह्मास्त्र है, इसका इस्तेमाल उचित मौके पर होना चाहिए क्योंकि इसमें सफलता का तो कुछ नहीं पर असफलता का ज्यादा बड़ा मतलब हो जाएगा। पर ब्रांड मोदी और मोदी की गारंटी और बड़े रूप में सामने आए। 

भाजपा के पास कार्यकर्ताओं और साधनों का कैसा खजाना है इसकी चर्चा का खास मतलब नहीं है। और इसी आधार पर जब भाजपा और काफी हद तक उसकी तरफ़ झुके मीडिया की तरफ़ से विपक्षी गठबंधन से सीटों का बंटवारा या आपसी खटर-पटर को लेकर सवाल उठाते रहे हैं तब किसी ने नहीं पूछा कि भाजपा एनडीए के अपने साथी दलों को कब और किस तरह सीटें देगी। सबको लगता है कि आज की भाजपा के लिए यह सवाल बेमानी है और उसका कोई भी घटक दल ही नहीं अपने अंदर का गुट, समूह या नेता आज के नेतृत्व पर सवाल उठाने की स्थिति में नहीं है। आखिर वसुंधरा, शिवराज सिंह और रमन सिंह की तरफ़ से कहां कोई सवाल उठा जब नेतृत्व ने बड़ी आसानी से उनको दरकिनार कर दिया।

पर यह कहना शायद बहुतों को हजम नहीं होगा कि यह सब ऊपर की बातें हैं। और अगर भाजपा के लोग अगले चुनाव में चार सौ पार की बात कर रहे हैं तो उसके अनुरूप मेहनत कर रहे हैं, रणनीति बना रहे हैं। भाजपा नेतृत्व असल में बहुत सावधानी से चुनावी तैयारी कर रहा है और वह किसी भी बड़ी राजनैतिक पार्टी की तुलना में ज्यादा सावधान, सचेत, सुविचारित और साफ रणनीति के अनुरूप तैयारी कर रही है। 

कहना न होगा कि आपसी एकता के सवाल पर खटर पटर से जूझ रहे इंडिया गठबंधन में अभी मुद्दों और रणनीति की चर्चा तो बहुत दूर की चीज लगती है। भाजपा को साफ पता है कि उसकी चुनौतियां क्या हैं, कमजोरियां कहां कहां हैं। 
पहले बीजेपी ने देश की करीब 160 सीटों को अपने लिए कमजोर गिना था। अब उसकी नई गिनती 240 सीटों की है।

उसने इस गिनती के साथ तीन-तीन, चार-चार चुनाव क्षेत्रों का क्लस्टर बनाकर एक एक नेता को उसका जिम्मा सौंपा है जिन्हें इन मुश्किल सीटें निकालने के लिए हर संभव काम करने की आजादी भी दी गई है, साधन की तो कोई बात ही नहीं है। इन क्लस्टर प्रभारियों और करीब तीन सौ नेताओं के साथ भाजपा अध्यक्ष जय प्रकाश नड्डा की बड़ी बैठकें हो चुकी हैं।

लेकिन उस सांगठानिक मूल्यांकन, तैयारी और संसाधनों से बड़ा काम खुद नरेंद्र मोदी कर रहे हैं। राम मंदिर निर्माण का काम देख रहे पूर्व नौकरशाह नृपेन्द्र मिश्र एक चैनल को बता रहे थे कि मंदिर की वास्तुकला की कल्पना और इंजीनियरिंग की तैयारियों में बदलाव करके किस तरह मोदी जी ने उसे भविषयोन्मुख बनाया। और इसी क्रम में निषाद राज, शबरी और जटायु को ज्यादा भाव देना और चुनाव तक सीता, लक्ष्मण और हनुमान को भी भुलाए रखना (उनके स्थान दूसरी मंजिल पर बनने वाले हैं) तय हुआ। संभवत: इसी आधार पर राम की बनी तीन मूर्तियों में से कर्नाटक के मूर्तिकार सोमपुरा की बनाई श्याम प्रतिमा का चुनाव किया गया। उनकी साज सज्जा भी काफी कुछ दक्षिण के देवों वाली है। इसी हिसाब से प्रधानमंत्री दक्षिण भारत के उन मंदिरों की यात्रा कर रहे हैं जिनका कोई संबंध राम से माना जाता है या जो रामानंद/रामानुज संप्रदाय के हैं। सनातन और राम नाम का शोर दक्षिण की राजनीति में भाजपा को खड़ा करता है या नहीं यह देखने की चीज होगी। यह उल्लेखनीय है कि भाजपा ने पिछले चुनाव में कर्नाटक की लगभग सारी सीटें जीती थीं और केरल में संघ की शाखाएं सबसे व्यवस्थित रूप में चलती हैं।

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पर यह मानने की गलती मत करिए भाजपा इतने पर रुक गई है। अयोध्या के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में जिस एकमात्र गैर भाजपाई बड़े नेता का चेहरा दिखाई दिया वे तेलगू देशम के नेता चंद्रबाबू नायडू थे। अमित शाह की मुलाकात चंद्रशेखर राव से हो चुकी है। यह भी उल्लेखनीय है कि भाजपा खुद को सिर्फ दक्षिण में ही कमजोर नहीं मान रही है। वह उस बिहार को भी अपना कमजोर इलाका माना रही है जहां जदयू के साथ उसने चालीस में से उनचालीस सीटें जीती थीं। सो अब भी नीतीश कुमार के लिए भ्रम बनाने से लेकर उनको लाने की कोशिशें बंद नहीं हुई हैं। वह खुद को बंगाल में भी कमजोर मान रही है जहां उसका मत प्रतिशत पंचायत चुनाव में बाईस फीसदी पर आ गया था जो पिछले लोकसभा चुनाव से लगभग बीस फीसदी कम है। ऐसे सारे कमजोर इलाकों में लाभार्थियों के लिए बड़े पैमाने पर ‘संगमम’ आयोजित करके केंद्र की योजनाओं से लाभान्वित लोगों को गोलबंद करने की तैयारी है। जब तक हम यह आलेख लिख रहे हैं तब तक मध्य प्रदेश के यादव मुख्यमंत्री को लालू-तेजस्वी के गढ़ में घुमाया जा चुका है। बूथ-स्तर की तैयारियों से लेकर शीर्ष स्तर तक की तैयारियां का यह सिर्फ एक छोटा और ‘बाहरी’ पत्रकार का आकलन है। पर चार सौ सीटों का लक्ष्य दूर का नहीं लगता।

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अरविंद मोहन
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